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2 घंटे पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
राजा और साधु में विवाद के कई प्रसंग शास्त्रों में आए हैं। जो सांसारिक दृष्टि से सफल हो और निजी दृष्टि से संतुष्ट- वो साधु है। हमारे यहां तीन लोगों को महाराज कहा जाता है। साधु, राजा और रसोई बनाने वाले को और ये तीनों ही जीवन में बड़े महत्वपूर्ण हैं।
संसार जब साधु और राजा को उलझते देखता है, तो चिंतित हो जाता है। साधु और राजा जब भी विवाद करेंगे, साधु का वर्तमान बिगड़ेगा और राजा का भविष्य। एक कथा आती है कि वशिष्ठ के पुत्र शक्ति एक बार पुल पार कर रहे थे और वहां से एक राजा आ रहे थे कलमाशपदा।
दोनों इस पर उलझ गए कि पीछे कौन हटेगा, क्योंकि पुल संकरा था और कोई एक ही गुजर सकता है। राजा को पद का अहंकार था, साधु को तप का। साधु ने राजा को राक्षस होने का शाप दिया। राजा राक्षस हुआ और साधु को खा गया।
दोनों खत्म हो गए। कहानी यह समझा गई कि अपने-अपने रास्ते ठीक से चलो, क्यों किसी का रास्ता रोकते हो? साधु का अपना मार्ग है, राजा का अपना राजपथ है।
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: अपने रास्ते ठीक से चलें, किसी का रास्ता क्यों रोकें


