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ईरान, अमेरिका और इजराइल का टकराव अब एक खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुका है। ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के साथ ही कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और आईआरजीसी कमांडरों के मारे जाने की खबरें बताती हैं कि मामला अब बहुत तूल पकड़ने जा रहा है। लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल अब भी बरकरार है कि क्या ईरान के सर्वोच्च नेता को मार देना वहां की हुकूमत को भी खत्म कर देने के बराबर है? यकीनन, सैन्य और खुफिया दृष्टिकोण से अमेरिका-इजराइल का साझा अभियान एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। नेतृत्व के ठिकानों की पहचान करना, कमांड नेटवर्क में प्रवेश करना और सटीक हमलों को अंजाम देना पुख्ता निगरानी और खुफिया पहुंच को दर्शाता है। ईरान के सत्ता-कुलीनों के लिए संदेश स्पष्ट है- आज कोई भी जगह अमेरिका की पहुंच से दूर नहीं है। लेकिन राज्यसत्ताएं किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द निर्मित नहीं होतीं। वे संस्थाओं, सुरक्षा-संरचनाओं और वैचारिक आस्थाओं पर टिकी होती हैं। नेतृत्व को हुई क्षति के बावजूद इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स एक शक्तिशाली संगठन बना हुआ है। ईरान की सत्ता-व्यवस्था के पास उत्तराधिकार का औपचारिक तंत्र भी मौजूद है। विरोध-प्रदर्शनों के बावजूद ईरानी समाज का एक हिस्सा अब भी मौजूदा व्यवस्था को अपने देश की सम्प्रभुता की रक्षक के रूप में ही देखता है। वॉशिंगटन और तेल अवीव के पास यकीनन इसके बाद अब एक मोमेंटम है। लेकिन अगर वे ऑपरेशन की सफलता को व्यवस्था-परिवर्तन की दिशा में ले जाने की कोशिश करेंगे तो यह इतना आसान नहीं होने जा रहा है। इतिहास बताता है कि बाहरी हमलों के दौरान देश टूटने के बजाय और सुदृढ़ हो जाते हैं। राष्ट्रवादी और धार्मिक भावनाएं आंतरिक असहमतियों पर भारी पड़ने लगती हैं। ईरान लगभग 9 करोड़ की आबादी वाला देश है, जिसकी एक सशक्त सभ्यतागत पहचान रही है। मौजूदा संघर्ष की स्थिति उसके राजनीतिक संकल्प को और मजबूत बना सकती है। ऐसे में यह एक लंबे और कठिन संघर्ष का रूप ले सकता है, जिसके साथ व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रभाव भी जुड़ा होगा। यों भी, हवाई हमलों के जरिए शासन-परिवर्तन ऐतिहासिक रूप से कठिन सिद्ध हुआ है। हवाई हमलों से बुनियादी ढांचे को क्षति पहुंचाई जा सकती है और नेताओं को रास्ते से हटाया जा सकता है, लेकिन वे गहरी जड़ें जमाए वैचारिक तंत्रों को विरले ही ध्वस्त कर पाते हैं। इराक और लीबिया इसके उदाहरण हैं। सैन्य श्रेष्ठता, सत्ताबदल सुनिश्चित नहीं करती है। मौजूदा स्थिति में टकराव कई दिशाओं में आगे बढ़ सकता है। एक संभावना तो यह है कि ईरान युद्ध को आगे बढ़ाने से बचते हुए प्रतीकात्मक किंतु सीमित प्रतिक्रिया देता रहे। दूसरी संभावना यह है कि दोनों तरफ से लंबे समय तक मिसाइल और ड्रोन हमले जारी रहें और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जाता रहे। यह सीमित युद्ध के दायरे में होगा, हालांकि इसके क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरे प्रभाव होंगे। ईरान के पास प्रॉक्सी नेटवर्क सक्रिय करने या समुद्री मार्गों को निशाना बनाने की क्षमता बनी हुई है। इजराइल की सीमाओं के आसपास दबाव बढ़ाना या होर्मुज की खाड़ी में व्यवधान उत्पन्न करना संघर्ष के क्षेत्र को व्यापक बना सकता है और वैश्विक बाजारों पर दबाव डाल सकता है। लेकिन अगर ईरान किसी प्रमुख अमेरिकी या इजराइली ठिकाने पर गम्भीर प्रहार कर देता है और किसी हाई वैल्यू टारगेट- जैसे विमानवाहक पोत या हेलीकॉप्टर वाहक को सीमित क्षति भी पहुंचती है तो यह उनकी ओर से कड़े प्रतिशोध को उकसा सकता है। इस संघर्ष में भारत का भी बहुत कुछ दांव पर है। पश्चिम एशिया में लगभग 95 लाख भारतीय काम करते हैं और हर साल करीब 50 अरब डॉलर घर भेजते हैं। भारत के ऊर्जा आयात का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। अगर हालात लंबे समय तक बिगड़े, तो तेल की कीमतें, शिपिंग लागत और आर्थिक वृद्धि- तीनों पर असर पड़ेगा। इसलिए पश्चिम एशिया की स्थिरता कोई दूर की कूटनीतिक चिंता नहीं, बल्कि इससे भारत के प्रत्यक्ष राष्ट्रीय हित जुड़े हैं। यदि बड़े पैमाने पर संघर्ष हुआ, तो अपने नागरिकों की सुरक्षित निकासी अपने आप में बड़ी चुनौती होगी। शुरुआती बढ़त अक्सर अति-आत्मविश्वास पैदा करती है। इस समय दोनों पक्षों के सामने अपने-अपने प्रलोभन हैं- एक के लिए दूसरे को पूरी तरह से ध्वस्त कर देने का, दूसरे के लिए प्रतिशोध लेकर अपने वजूद को साबित करने का। ऐसे माहौल में शांति की बात आदर्शवादी लग सकती है। लेकिन रणनीतिक संयम कई बार अनियंत्रित एस्केलेशन से बेहतर साबित होता है। पश्चिम एशिया में लगभग 95 लाख भारतीय काम करते हैं और हर साल करीब 50 अरब डॉलर घर भेजते हैं। भारत के ऊर्जा आयात का 60% हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। अगर हालात बिगड़े तो भारत पर भी असर पड़ेगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम: क्या खामेनेई की मौत ईरान को तोड़ने के लिए काफी है?

