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15 मिनट पहले
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एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु
‘मैं सिर्फ सैटरडे, संडे और वीकडेज में नहीं पीता, बाकी दिन मैं कुछ भी पी लेता हूं।’ जब से मैंने शराब वाली पार्टियों में जाना शुरू किया तो दशकों से मेरा यही डायलॉग है। मेरी पत्नी को मेरा यह डायलॉग तब याद आया, जब हम शनिवार रात को फिल्म ‘इक्कीस’ देख रहे थे। उसमें नायक अगस्त्य नंदा (अमिताभ बच्चन के ग्रैंड सन) अपने उन दोस्तों से बात कर रहे थे, जो खेल में जीत के बाद शराब पार्टी में शामिल नहीं होने से नाराज थे।
उन्होंने कहा कि ‘अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो जीत के बाद मैं भी मजे करता और वही करता जो तुम सबने किया। लेकिन अफसोस, मैं तुम्हारी जगह नहीं हूं। सॉरी।’ मेरी पत्नी तुरंत बोलीं कि ‘20 साल के किसी लड़के में ऐसी प्रतिबद्धता दुर्लभ है।’
मैंने कहा कि जेन-जी ही शराब को ‘ना’ नहीं कह रही है, बल्कि स्कूल भी फिर से बच्चों में वैल्यू सिस्टम डालने के लिए सक्रिय हो रहे हैं। उनमें से एक है प्रभावी ‘हाउस सिस्टम।’ सोच रहे हैं कि यह सिस्टम क्या है और इसे कौन चला रहा है? तो यहां समझिए।
‘हाउस सिस्टम’ कुछ और नहीं, बल्कि एक बड़े स्कूल को छोटे, किन्तु फैमिलियिर समूहों में बांटना है। नदियों, रंगों या किरदारों पर इनके नाम रखे जा सकते हैं- जैसे ‘ब्लू हाउस’ या ‘रेड हाउस।’ बच्चा महज 5वीं कक्षा का छात्र होने के बजाय पूरी स्कूल अवधि के लिए ‘रेड हाउस’ या ‘गंगा हाउस’ का मेम्बर बन जाता है। यह काम कैसे करता है? हर हाउस में कक्षा 1 से 12वीं तक के छात्र होते हैं। हाउस मास्टर या मिस्ट्रेस के तौर पर एक टीचर हर हाउस का हेड होता है। छात्र नेताओं को हाउस कैप्टन्स कहते हैं।
ज्यादा छात्रों को मौका देने के लिए कुछ और पद भी होते हैं। ऐसे में, टीचिंग सिर्फ अकादमिक कंटेंट तक सीमित नहीं रहती। शिक्षक मेंटर बन जाते हैं और अक्सर पैरेंट्स जैसा सपोर्ट और देखभाल देने के लिए गाइड की तरह काम करते हैं। उनका उद्देश्य बच्चे की शारीरिक फिटनेस के साथ सामाजिक, भावनात्मक और नैतिक- यानी समग्र विकास होता है। वे इन्स्ट्रक्टर बनकर स्कूली गतिविधियों के जरिए छुपी प्रतिभाओं को पहचानते हैं और नेतृत्व क्षमता विकसित करते हैं।
एक मजबूत हाउस सिस्टम के लिए जो स्कूल यह प्रक्रिया अपना रहे हैं, वे इसमें हाई-एनर्जी फिजिकल कॉम्पिटिशन, रचनात्मक सहयोग और एकेडमिक टीमवर्क का संयोजन करते हैं। मकसद होता है कि एथलीट से आर्टिस्ट तक हर बच्चा महसूस करे कि उसने अपने हाउस की सफलता में योगदान दिया है।
ये शब्दावली स्कूली वातावरण के संरचनात्मक और व्यावहारिक स्तंभों को दर्शाती है, जो अक्सर साथ मिलकर छात्रों में सामुदायिक और पर्सनल ग्रोथ की भावना को बढ़ाती है। हर हाउस खेल, वाद-विवाद, कला और पढ़ाई में अंकों के लिए प्रतिस्पर्धा करता है।
अंत में विजेता हाउस को ट्रॉफी दी जाती है। इससे परिवार जैसा माहौल बनता है, क्योंकि 12वीं का छात्र पहली कक्षा के छात्र का ध्यान रखता है, ताकि वह प्रतियोगिता जीत सके। कभी वाद-विवाद प्रतिस्पर्धा में 12वीं का छात्र छठी के छात्र के ज्ञान और भागीदारी पर निर्भर होता है।
हाउस को शिष्ट व्यवहार और चरित्र के लिए भी अंक मिलते हैं, जैसे पीछे आने वाले के लिए दरवाजा खुला रखना या दिन में पहली बार मिलने पर अभिवादन करना। ब्रिटिश स्कूलों में आमतौर पर यह सिस्टम प्रचलित है और अब उन भारतीय पैरेंट्स में भी पॉपुलर हो रहा है, जो चाहते हैं कि उनके बच्चे अनुशासित और चरित्रवान बनें।
फंडा यह है कि सिद्धांतों पर अडिग रहना हमेशा अंकों, मोनोटोनी और हालात के साथ सामने आने वाली कई चीजों पर बढ़त दिलाता है। यकीन मानिए, अगर आप सिद्धांतवादी हैं तो कभी चलन से बाहर नहीं होंगे।
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एन. रघुरामन का कॉलम: अनुशासन फैशन से बाहर हो सकता है, चलन से नहीं



