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द न्यू यॉर्क टाइम्स. रस्टिन डॉड7 मिनट पहले
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स्कीयर मथिल्डे ग्रेमौड ने ओलिंपिक गोल्ड मेडल हासिल करने के बाद कहा, ‘मुझे लगा जैसे अब कुछ बचा ही नहीं है। मैं अंदर से बिल्कुल खाली महसूस कर रही थी।’
चार साल पहले बीजिंग की बर्फीली चोटियों पर स्विट्जरलैंड की फ्रीस्टाइल स्कीयर मथिल्डे ग्रेमौड ने वह हासिल किया जो हर खिलाड़ी का सपना होता है- ओलिंपिक गोल्ड मेडल। पोडियम पर खड़े होकर मुस्कुराते हुए उन्होंने फूलों का गुलदस्ता हवा में लहराया, लेकिन ठीक एक महीने बाद, वह मुस्कान गायब थी।
मथिल्डे कहती हैं, ‘मुझे लगा जैसे अब कुछ बचा ही नहीं है। मैं अंदर से बिल्कुल खाली महसूस कर रही थी।’ यह केवल मथिल्डे की कहानी नहीं है। महान तैराक माइकल फेल्प्स, एनबीए चैम्पियन केविन डुरेंट और महानतम अमेरिकी फुटबॉलर टॉम ब्रेडी जैसे दिग्गज भी इसी ‘खालीपन’ से गुजर चुके हैं। पिछले 40 वर्षों के शोध बताते हैं कि ब्रॉन्ज मेडलिस्ट अक्सर सिल्वर मेडल विजेताओं से ज्यादा खुश होते हैं।
गोल्ड भी स्थाई संतुष्टि नहीं दे पाता
दरअसल, कई ओलिंपियन ‘पोस्ट-ओलिंपिक ब्लूज’ यानी प्रतियोगिता के बाद भावनात्मक गिरावट का शिकार होते हैं और कई खिलाड़ियों को गोल्ड मेडल भी स्थाई संतुष्टि नहीं दे पाता। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, इंसान इस बात का अंदाजा लगाने में बहुत खराब है कि भविष्य की कौन सी घटना उसे कितनी खुशी देगी।
क्या है ‘अफेक्टिव फोरकास्टिंग’
हार्वर्ड के मनोविज्ञान प्रोफेसर डैनियल गिल्बर्ट ने 1990 के दशक में इस पर शोध शुरू किया। उन्होंने पाया कि लोग अपनी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं की तीव्रता को हमेशा बढ़ा-चढ़ाकर देखते हैं। उन्होंने इसे ‘अफेक्टिव फोरकास्टिंग’ का नाम दिया। उनके शोध के अनुसार, लोग सोचते हैं कि कोई बड़ी उपलब्धि उन्हें लंबे समय तक खुश रखेगी, लेकिन असल में ऐसा नहीं होता।
कल्पना और वास्तविक अनुभव के बीच अंतर
लोग सोचते हैं कि कोई नकारात्मक घटना उन्हें हमेशा के लिए दुखी कर देगी, जबकि वे उम्मीद से कहीं जल्दी संभल जाते हैं। इसे ‘इम्पैक्ट बायस’ कहा जाता है यानी हमारी कल्पना और वास्तविक अनुभव के बीच का बड़ा अंतर। लेखक ताल बेन-शाहर ने इसे ‘अराइवल फैलेसी’ कहा है। यह एक गलत धारणा है कि किसी खास मुकाम (जैसे गोल्ड मेडल) पर पहुंचने के बाद हमें स्थाई सुख मिल जाएगा, लेकिन ऐसा होता नहीं है।
खेल के अलावा अन्य शौक भी रखें
मनोवैज्ञानिक करेन हॉवेल्स ने ओलिंपिक के बाद होने वाले डिप्रेशन पर शोध किया। उन्होंने पाया कि जिन खिलाड़ियों की पूरी पहचान सिर्फ उनके खेल से जुड़ी होती है, वे सबसे ज्यादा दुखी होते हैं। इसका समाधान यह है कि सफल खिलाड़ियों के पास खेल के अलावा अन्य शौक और रुचियां होनी चाहिए। जिन खिलाड़ियों की पहचान बहुआयामी होती है यानी खेल के अलावा भी शौक और रिश्ते होते हैं, वे बेहतर संतुलन बनाए रखते हैं।
खुशी हमेशा सफलता पर निर्भर नहीं करती
डॉक्टर हैप्पीनेस कहे जाने वाले मनोवैज्ञानिक एड डाइनर ने एक चौंकाने वाली बात बताई। उन्होंने कहा कि आपकी खुशी इस पर निर्भर नहीं करती कि आपकी सफलता कितनी बड़ी है, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि आप कितनी बार अच्छा महसूस करते हैं। एक बड़ा मेडल जीतने से बेहतर है कि दिन भर में एक दर्जन छोटी-छोटी अच्छी चीजें आपके साथ हों।
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