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हाल के दिनों में जापान से ‘पंच’ नामक एक बंदर के वीडियो लगातार वायरल हुए हैं। यह 7 महीने का मकाक बंदर है, जिसे एक चिड़ियाघर में रखा गया है। उसकी मां ने उसे त्याग दिया था और अन्य बंदर उसे तंग कर रहे थे। उसको दु:खी देखकर चिड़ियाघर संचालक ने उसे एक सॉफ्ट टॉय दे दिया। फिर तो, ‘पंच’ उस सॉफ्ट टॉय को ही सीने से लगाए घूमता रहा, मानो उसकी खामोश मौजूदगी में अपने लिए सुकून खोज रहा हो। यह दृश्य संवेदनशील भी था और असहज करने वाला भी। एक सामाजिक प्राणी- जिसे प्रकृति ने दूसरों के संग-साथ के लिए तैयार किया था- वह अपनी भावनात्मक जरूरतों के लिए एक खिलौने का सहारा ले रहा था। एक डॉक्टर और पैरेंटिंग व बाल-विकास के क्षेत्र से जुड़ा व्यक्ति होने के नाते वह दृश्य मुझे दो गहरी सच्चाइयों की याद दिलाता है। पहली, सुकून, स्पर्श और भावनात्मक सुरक्षा की जरूरत हमारे जैविक ढांचे में गहराई से निहित है। दूसरी, खिलौने- चाहे वे इंसान के बच्चे हों या बंदर के- भावनाओं को संतुलित करने और बाल विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। सॉफ्ट टॉय्ज विकासात्मक मनोविज्ञान में ट्रांजिशनल ऑब्जेक्ट कहे जाते हैं। टेडी बियर या कोई डॉल बच्चे को निर्भरता और स्वतंत्रता के बीच की दूरी पाटने में मदद करती है। जब कोई बच्चा सोते समय अपने टेडी को गले लगाता है, तो वह कमजोरी नहीं दिखा रहा होता; आत्म-सांत्वना का अभ्यास कर रहा होता है। वह सीख रहा होता है कि माता-पिता की अनुपस्थिति में भी सुरक्षा की भावना भीतर कैसे बनाई रखी जाए। भारतीय माता-पिता बाल विकास में अकसर दो चरम सीमाओं पर रहते हैं। एक ओर तो हम बच्चों के बेहद करीब रहते हैं- कई वर्षों तक साथ सुलाना, हर गतिविधि पर नजर रखना, समस्या आने से पहले ही समाधान दे देना। दूसरी ओर, कभी-कभी हम बच्चे के खिलौनों से भावनात्मक लगाव को बचकाना कहकर जल्दी छुड़ाने की कोशिश करते हैं। दोनों ही सही नहीं हैं। यदि उम्र के अनुरूप और संतुलित तरीके से इस्तेमाल करें, तो खिलौने बाल विकास का सशक्त साधन हैं। एक वर्ष तक के शिशुओं के लिए खिलौने संवेदनात्मक अनुभव का विकास करते हैं। एक से तीन वर्ष में वे उसकी कल्पनाशीलता के साथी बन जाते हैं। बच्चा उन्हें खाना खिलाता है, सुलाता है, डांटता है तो अपने ही अनुभवों को दोहरा रहा होता है। तीन से छह वर्ष की उम्र में गुड़िया, कठपुतली और कहानी आधारित पात्र भावनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम बन जाते हैं। जब बच्चा कहता है टेडी उदास है, तो वह अपनी ही उदासी व्यक्त कर रहा होता है। ऐसे में संवेदनशील संवाद उसकी भावनात्मक समझ को मजबूत करता है। लेकिन ‘पंच’ की कहानी का दूसरा पक्ष भी है। खिलौने सुकून दे सकते हैं, पर वे वास्तविक सामाजिक संबंधों और जीवन की चुनौतियों का स्थान नहीं ले सकते। भारतीय पैरेंटिंग में यही चूक दिखती है। प्यार और चिंता के चलते हम बच्चों को जरूरत से ज्यादा सुरक्षा देने लगते हैं। हर जगह साथ जाना, हर विवाद में हस्तक्षेप करना, हर छोटी असुविधा को तुरंत दूर करना- इससे बच्चों की निर्णय लेने की क्षमता देरी से विकसित हो पाती है। जबकि कई पश्चिमी समाजों में स्वायत्तता जल्दी दी जाती है- खुद अपने काम करना, जेब खर्च संभालना, दोस्तों के मतभेद सुलझाना। दोनों मॉडल पूर्ण नहीं हैं। भावनात्मक आधार के बिना अत्यधिक स्वतंत्रता उपेक्षा बन सकती है और चुनौतियों के बिना अत्यधिक संरक्षण दुर्बलता पैदा कर सकता है। बच्चे कठिनाइयों को हटाने से नहीं, छोटी-छोटी चुनौतियों का सामना करके परिपक्व होते हैं। बाल-विकास के शोध बताते हैं कि असली विकास कठिन परिस्थितियों में होता है। मंच पर बोलना, परीक्षा की घबराहट झेलना- इन सबमें बच्चे को स्वयं कोशिश करने देना जरूरी है। अभिभावकों के लिए संदेश साफ है : कृत्रिम कठिनाइयां पैदा न करें, न ही स्नेह कम करें, बल्कि संतुलन बनाएं। यदि कोई प्रिय टेडी बच्चे को सुकून देता है, तो समझें कि वह बच्चे के भावनात्मक विकास का साथी है। साथ ही बच्चों के अनुभवों का दायरा बढ़ाएं। स्कूल बैग खुद पैक करने दें। खेल में हार का हल्का-सा दुख महसूस करने दें। ‘पंच’ ने हमें याद दिलाया है कि सामाजिक जरूरतें अधूरी रह जाएं तो क्या होता है। माता-पिता के रूप में हमारा काम बचपन से ही असुविधाओं को पूरी तरह से हटाना नहीं है। बल्कि हमारा काम बच्चों को एक ऐसा सुरक्षित आधार देना है, जहां से बच्चा बाहर जाए, ठोकर खाए, सीखे और फिर लौट आए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम: अपने बच्चों को सुरक्षा जरूर दें लेकिन चुनौतियों से डरें नहीं

