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मार्च में बार्सीलोना में होने जा रही मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस में नए प्रोडक्ट-लॉन्चों और बड़ी-बड़ी बातों के बीच हर किसी के मन में एक ही सवाल होगा कि 6जी की दौड़ में दुनिया का नेतृत्व कौन करने जा रहा है? मोबाइल टेक्नोलॉजी की अगली पीढ़ी यह तय करेगी कि उस महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर पर किसका नियंत्रण होगा, जिस पर आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं, सुरक्षा तंत्रों और लोकतांत्रिक सरकारों की निर्भरता बढ़ती जा रही है। 6जी के तकनीकी स्टैंडर्ड अभी से तय किए जाने लगे हैं। 2028 तक इसकी रूपरेखा बन सकती है और 2030 के आसपास इसे लागू कर दिया जाएगा। जो भी इस क्षेत्र में लीड करेगा, वही आने वाले दशकों तक आर्थिक और सामरिक वर्चस्व की स्थिति में रहेगा।
वास्तव में 6जी की दौड़ 5जी की तुलना में ज्यादा पहले शुरू हो रही है- और कहीं अधिक गहराई तक जा रही है। 5जी को लेकर होने वाली राजनीति इस प्रश्न पर केंद्रित थी कि क्या हुआवेइ जैसे चीनी विक्रेताओं पर राष्ट्रीय नेटवर्क बनाने के लिए भरोसा किया जा सकता है। पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों के दबाव ने हुआवेइ को स्वयं में बदलाव लाने के लिए बाध्य किया। प्रमुख पश्चिमी बाजारों से कट जाने के बाद उसने अपनी आपूर्ति शृंखलाओं का पुनर्गठन किया, घरेलू इनोवेशन को बढ़ाया और राज्यसत्ता के समर्थन से चीनी सरकार के सामरिक उद्देश्यों के अधिक अनुरूप होकर उभरी। लेकिन 6जी को लेकर संघर्ष सप्लायर्स का नहीं, तकनीकी ब्लूप्रिंट का है। 6जी सेल्युलर टेक्नोलॉजी से अपेक्षा है कि वे एआई और एडवांस्ड कम्प्यूटिंग को सीधे नेटवर्क संरचना में जोड़ेंगी, जिससे बड़े पैमाने पर ऑटोमेशन संभव होगा। लेकिन जब अरबों डिवाइसेस आपस में जुड़ी होंगी और नेटवर्क खुद ही सेंसर और एआई लेयर के रूप में काम करेगा, तो डिजाइन में मौजूद किसी भी तरह की कमजोरी के व्यापक परिणाम भी हो सकते हैं। डिजिटल सम्प्रभुता बुनियादी ढांचे पर निर्भर है। अगले दशक में निर्मित होने वाले नेटवर्क उसी डेटा को कैरी करेंगे, जिनसे अस्पताल, बिजली ग्रिड, सैन्य प्रणालियां और चुनाव प्रणालियां संचालित होती हैं। वर्तमान में इस दौड़ में तीन ताकतें अग्रणी हैं। एक है चीन, जिसके पास भरपूर सामर्थ्य है। दुनिया के 6जी-संबंधी पेटेंट आवेदनों का 40% से अधिक हिस्सा उसके पास है और उसकी सरकार ने रिसर्च को बढ़ाने के लिए पूरी क्षमता झोंक रखी है। 5जी को लेकर हुए टकराव से कमजोर होने के बजाय और मजबूत होकर उभरी हुआवेइ इसके केंद्र में है। राज्यसत्ता की पूरी शह के चलते वह इस स्थिति में है कि समानांतर प्रणालियां भी संचालित कर सकती है। चीन ने अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण के संस्थानों में भी भारी निवेश किया है और बुनियादी ढांचा सम्बंधी कूटनीति के जरिए वह ग्लोबल साउथ के देशों को साधने का प्रयास कर रहा है।
अमेरिका 6जी को एक अलग पोजिशन से देखता है। उसकी टेक कम्पनियां कनेक्टिविटी से उत्पन्न वैल्यू का बड़ा हिस्सा अर्जित करती हैं, भले ही वे रेडियो नेटवर्क का निर्माण न करती हों। फिर भी, अमेरिका मुख्य हार्डवेयर के लिए गैर-अमेरिकी विक्रेताओं- विशेष रूप से एरिकसन और नोकिया पर निर्भर बना हुआ है। ओपन रेडियो एक्सेस नेटवर्क के जरिए बाजार को नया आकार देने के प्रयासों का अब तक कोई खास असर नहीं पड़ा है, हालांकि 6जी के निकट आने के साथ ऐसी कोशिशों के पुनः उभरने की संभावना है। इस बीच, अमेरिका कनेक्टिविटी पर अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं- जिनमें सैटेलाइट और सॉफ्टवेयर-आधारित प्रणालियां शामिल हैं- को भी प्रोत्साहित कर सकता है। क्लाउड और एआई सेवाओं में पहले ही अमेरिकी प्रभुत्व स्थापित है। इसे नेटवर्क लेयर तक बढ़ाना उस पर दुनिया की मौजूदा निर्भरताओं को और गहराएगा ही। इससे उन देशों के सामने नई सामरिक चुनौतियां पैदा होंगी, जो पहले ही अमेरिकी प्लेटफॉर्म और सेवाओं पर निर्भर हैं। यूरोप का मामला तो और अजीब है। वह अनेक डिजिटल क्षेत्रों में पिछड़ा हुआ है, किंतु टेलीकॉम के क्षेत्र में अब भी ग्लोबल लीडर है। एरिकसन और नोकिया उन गिनी-चुनी कंपनियों में हैं, जो व्यापक पैमाने पर पूर्ण रेडियो एक्सेस नेटवर्क प्रदान करने में सक्षम हैं। यह औद्योगिक आधार यूरोप को ऐसा प्रभाव देता है, जो बहुत कम क्षेत्रों के पास है। किंतु यही स्थिति तनाव का कारण भी बन सकती है। चूंकि यूरोपीय टेलीकॉम कंपनियां अमेरिकी आपूर्ति शृंखलाओं और बाजारों से गहराई से जुड़ी हुई हैं, इसलिए ईयू की रणनीति तैयार करने वालों के लिए यह मान लेना सम्भव नहीं है कि उनकी भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और कॉर्पोरेट प्रोत्साहन हमेशा एक-दूसरे के अनुरूप बने रहेंगे। आज 6जी की दौड़ में तीन ताकतें आगे हैं। चीन, जिसके पास भरपूर सामर्थ्य है। अमेरिका, जिसकी टेक कम्पनियां कनेक्टिविटी से उत्पन्न वैल्यू का बड़ा हिस्सा अर्जित करती हैं। और यूरोप, जो टेलीकॉम में ग्लोबल लीडर है। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)
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ब्योर्न फैगर्स्टन का कॉलम: जो देश 6जी की दौड़ में आगे, दुनिया पर उसी का दबदबा

