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फरीदाबाद: जिले के 79 साल के गोपाल सिंह मेहरा इन दिनों अपनी उम्र से ज्यादा परेशानियों का बोझ उठा रहे हैं. पहले हर महीने मिलने वाली बुजुर्ग पेंशन ही उनका और उनकी 73 साल की पत्नी का सहारा थी. अब वो भी दो-तीन महीने से बंद है. जिस पेंशन के भरोसे दवाई, राशन और छोटे-मोटे खर्च चलते थे, अब उसी के लिए उन्हें दफ्तरों और बैंकों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं.
गोपाल सिंह ने Local18 से बात करते हुए अपनी परेशानी खुलकर बताई. उन्होंने कहा, ‘मैं यहीं फरीदाबाद का रहने वाला हूं, उम्र 79 साल है. दिसंबर की पेंशन जनवरी में आनी थी. जनवरी से फरवरी हो गई, लेकिन पेंशन अब तक नहीं आई. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. 2011 से लगातार पेंशन मिल रही थी, लेकिन अब पिछले कुछ महीनों से बहुत दिक्कत हो रही है.’
बैंक वालों ने खाते से किया इनकार
उन्होंने बताया कि उनका खाता पहले सेक्टर-14 के बैंक में था. वहीं से आराम से पेंशन निकाल लेते थे. बाद में बैंक ने खाता सेक्टर-31 में ट्रांसफर कर दिया. तीन साल सब ठीक चला, फिर अचानक पेंशन वापस सेक्टर-14 के बैंक में भेज दी गई. जब पैसे निकालने पहुंचे, तो बैंक वालों ने साफ कह दिया कि यहां आपका खाता नहीं है. वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि IFSC कोड गलत है. गोपाल सिंह ने कोड भी ठीक करवा लिया, फिर भी पेंशन नहीं आई.
गोपाल सिंह को सबसे ज्यादा चिंता अपनी पत्नी की है. उनकी पत्नी का हाल ऐसा है कि उनके घुटनों का ऑपरेशन हुआ है और दवाइयों का खर्च लगातार चल रहा है. खुद गोपाल सिंह की कमर में भी तकलीफ है. वो कहते हैं कि दवाई लेने के पैसे भी नहीं हैं. पेंशन ही एक आस है. आजकल बच्चे किसके काम आते हैं?
बेटे ने भी पैसे देने से किया इनकार
उन्होंने बताया कि उनका एक बेटा है, लेकिन वो भी अपनी तंगी का हवाला देता है. गोपाल सिंह बताते हैं कि बेटे से 10 रुपये भी मांगो, तो पूछता है किस लिए चाहिए. उसके पास पैसे हैं, लेकिन बच्चों की शादी के लिए रखे हैं, हमें कौन देगा?
पति-पत्नी दोनों को हर महीने 3000-3000 रुपये पेंशन मिलती थी. कुल 6000 में ही जैसे-तैसे घर चलता था. गोपाल सिंह बताते हैं कि उन्होंने नौकरी 164 रुपये महीने से शुरू की थी, जो बाद में 9000 रुपये तक पहुंची. आज के दौर में 9000 भी कुछ नहीं है. अब नौकरी नहीं करता, बस पेंशन के भरोसे हूं.
सिर्फ आश्वासन, कोई गारंटी नहीं
बुढ़े शख्स ने कहा कि पेंशन ऑफिस में भी बस आश्वासन ही मिल रहा है. वहां से सिर्फ इतना कहा गया कि शायद एक महीने की पेंशन मिले, बाकी कोई गारंटी नहीं है. ये सुनकर उनकी चिंता और बढ़ गई. उम्र हो चली गई, मुश्किल से 80-81 तक जिऊंगा. आखिरी समय में पेंशन बंद मत करो, वो हाथ जोड़कर सरकार से गुहार लगाते हैं.
अब हालात ये हैं कि जो बुजुर्ग कभी आत्मसम्मान के साथ पेंशन लेकर घर लौटते थे, वही अब बैंकों और दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं. सोचने वाली बात यह है कि अगर बुजुर्गों को पेंशन वक्त पर न मिले, तो उनका सहारा आखिर कौन बनेगा?
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