नवनीत गुर्जर का कॉलम: ट्रम्प, टैरिफ और ककनूसी कांग्रेस Politics & News

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ट्रम्प और टैरिफ। जमाना हैरान है। भारत भी। बात यह है कि अमेरिका इन दिनों दुनिया में अपनी थानेदारी का रौब जमाना चाहता है। बल्कि जमा रहा है। 1919 से 39 की दुनिया में ब्रिटेन एक महाशक्ति था, लेकिन निर्द्वंद्व नहीं। उसके बाजू में फ्रांस था, जर्मनी और इटली थे, सोवियत संघ था। ग्लास्तनोस्त ने सोवियत संघ के पलीते निकाल दिए और उसके तमाम राज्य टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गए। आपस में लड़ते रहे और अब भी लड़ाइयां जारी हैं। आज अमेरिका है और कोई नहीं है। सिर्फ इसलिए डोनाल्ड ट्रम्प दुनियाभर में अपनी मनमानी करना चाहते हैं। जैसे किसी जमाने में जापान ने मंचूरिया, इटली ने एबीसीनिया और जर्मनी ने ऑस्ट्रिया व चेकोस्लोवाकिया पर हमला करके उन्हें दबोच लिया था, ट्रम्प भी सोच रहे हैं कि वे भी उसी तरह दुनियाभर पर अपनी मनमानी का टैरिफ लाद देंगे और शीत युद्ध के दिनों में प्राय: असहाय रहने वाला संयुक्त राष्ट्र संघ, इस बार भी पुरानी लीग ऑफ नेशंस की तरह छटपटाता रहेगा। भारत में भी इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग तरह के बयान, आरोप-प्रत्यारोप लग रहे हैं। क्या पक्ष, क्या विपक्ष सब के सब एक-दूसरे पर आक्रामक हैं। गुरु गोरखनाथ और उनके योगियों की, भारतभर में कई कहानियां हैं। आज गोरखपुर में जो गोरखनाथ मंदिर है, वहां पहले घनी झाड़ियां थीं। एक कथा यूं है कि एक नेपाली सुंदरी ने गुरु गोरखनाथ को भोजन पर बुलाया। जानती थी योगी सिर्फ खिचड़ी खाते हैं। उसने पकवानों के थालों की तरह खिचड़ी के थाल परोसे। दूर बैठे गुरु गोरखनाथ को सुंदरी के मन में खोट नजर आई। वे गोरखपुर के पास घनी झाड़ियों में ध्यान लगाकर बैठ गए। सुंदरी इंतजार करते-करते थक गई। रोज खिचड़ी पकाती, परोसती… पर गोरख नहीं आते। खिचड़ी पकाते-पकाते पत्थरों के बीच वह खुद भी पत्थर हो गई, पर गोरख नहीं आए। उस सुंदरी का इंतहा दर्द उन पत्थरों में एक गरम पानी का चश्मा बनकर बह निकला, जहां आज भी खिचड़ी की देगें पकती हैं। भारत में भी सत्ता सुंदरी खिचड़ी पका रही है। या ये कहें कि सत्ता के लिए खिचड़ी पकाई जा रही है। कांग्रेस कह रही है कि प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रम्प के दबाव में भारत के किसानों को एक तरह से गिरवी रख दिया है। तमाम डेटा भी लगभग शेयर कर दिया है। यह धोखा है। फरेब है। लेकिन कांग्रेस की इस बात को कोई वजन नहीं दे रहा है। तवज्जो नहीं दे रहा है। दरअसल, कांग्रेस की इतनी निगेटिव पब्लिसिटी हो चुकी है कि लोग उसे सुनने को तैयार नहीं हैं। एक जमाना था जब कहा जाता था कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर खेत की मिट्टी में कांग्रेस रची-बसी है। अब लगता है कांग्रेस उन्हीं खेतों की मिट्टी में खप गई है। समय-समय की बात है! हो सकता है कांग्रेस के भी दिन फिरेंगे! इसलिए क्योंकि कांग्रेस को कभी ककनूसी नस्ल वाली पार्टी कहा जाता था। ककनूस दरअसल, एक कल्पित पक्षी है, जो अपनी ही राख में से फिर जन्मता है। कहा जाता है कि ककनूस या कुकनू वह विशालकाय पक्षी है, जिसकी चोंच काफी लम्बी होती है और उसमें छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। जब उसे लगता है कि उम्र पूरी होने को है, वह सूरज की ओर जाता है और भस्म हो जाता है। कुछ कहानियों में कहा गया है कि यह पक्षी उम्रदराज होने पर कुछ लकड़ियां इकट्ठी करता है और लकड़ी के उस ढेर पर बैठकर सुंदर स्वर-लहरियां छेड़ता है। तभी उसकी चोंच के छिद्रों से चिनगारियां फूटती हैं और वह लकड़ी का ढेर जिस पर वह बैठा होता है, आग पकड़ लेता है। पक्षी उसी आग में जलकर भस्म हो जाता है। स्वाति नक्षत्र में बारिश की बूंद जब उस राख के ढेर पर पड़ती है तो नए ककनूस का जन्म होता है। कथा का सार सिर्फ इतना है कि अपने ही संघर्ष की आग में तपने के बाद अपनी ही राख से फिर पैदा होने वाले हर जीव की नस्ल ककनूस की तरह होती है। माना जा सकता है कि कांग्रेस भी ककनूसी नस्ल की है। कई बार संकट आए, लेकिन हर संकट से उबरी। उठी और दौड़ने लगी। हो सकता है आगे भी ऐसा ही हो! कम से कम इस तरह की आशा तो की ही जा सकती है। ये बात और है कि राजनीतिक क्षितिज पर फिलहाल इस तरह की कोई सम्भावना दिखाई नहीं दे रही है। अब तो विपक्ष भी यह कहने लगा है कि सामूहिक प्रयास होने चाहिए। नेता के मुखौटे से ज्यादा कोई मतलब नहीं है। अखिलेश यादव के इस तरह के बयान का इशारा निश्चित तौर पर राहुल गांधी के नेतृत्व की तरफ ही रहा होगा। संघर्ष की आग में तपने के बाद
अपने ही संघर्ष की आग में तपने के बाद अपनी ही राख से फिर पैदा होने वाले हर जीव की नस्ल ककनूस की तरह होती है। माना जा सकता है कि कांग्रेस भी ककनूसी नस्ल की है। कम से कम इस तरह की आशा तो की ही जा सकती है।

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नवनीत गुर्जर का कॉलम: ट्रम्प, टैरिफ और ककनूसी कांग्रेस