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कभी-कभी कुछ घटनाएं हमसे विशेष प्रतिक्रिया की मांग करती हैं। विश्व युद्धों, परमाणु हथियारों की ईजाद और शीत युद्ध के समय ऐसा ही हुआ था। जनरेटिव एआई को भी मैं इसी श्रेणी में रखता हूं। और इसके बावजूद एआई पर होने वाली चर्चाएं अकसर अलग-अलग खांचों में बंटी रहती हैं। तकनीकविद् इस बिंदु पर तो यकीनन सही हैं कि एआई सब कुछ बदल देगा- और तेजी से बदलेगा- और पारम्परिक नीतिगत ढांचा उसके साथ कदम नहीं मिला पा रहा है। किंतु जैसे युद्ध को केवल जनरलों पर नहीं छोड़ा जा सकता, वैसे ही एआई को भी उसके आविष्कारकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता- चाहे वे कितने ही प्रतिभाशाली क्यों न हों। अधिकांश एआई तकनीकविद् और आंत्रप्रेन्योर अत्यंत आशावादी हैं। वे चिकित्सा में क्रांतिकारी प्रगति, शारीरिक श्रम के उन्मूलन, उत्पादकता में तीव्र वृद्धि और वैश्विक समृद्धि की कल्पना करते हैं। वे ऐसे परिणामों की अपेक्षा इसलिए करते हैं, क्योंकि इसमें उन्हें लाभ की संभावना है। किंतु साथ ही इसलिए भी, क्योंकि टेक्नोलॉजी की क्षमताओं में उनका विश्वास अडिग है। हाल ही में मैंने एक प्रतिभाशाली युवा सीईओ से बातचीत की, जिनका एआई स्टार्टअप पहले ही कई अरब डॉलर के वैल्यूएशन तक पहुंच चुका है। जब उनसे पूछा गया कि एआई डीपफेक और गलत सूचनाओं की समस्या उन्हें चिंतित करती है या नहीं तो उन्होंने उत्तर दिया : “बिल्कुल नहीं। आपको बस यह वेरिफाई करना है कि कोई चीज विश्वसनीय स्रोत से आई है।’ लेकिन क्या ऐसा सम्भव है? जब उन्हें कोई तस्वीर, दस्तावेज, ऑडियो रिकॉर्डिंग या वीडियो भेजा जाएगा, तो ये तथाकथित विश्वसनीय स्रोत यह कैसे जानेंगे कि क्या वास्तविक है? और जब ऐसे फोटो या वीडियो हजारों की तादाद में आएंगे, जिनमें से प्रत्येक दूसरे का खंडन कर रहा होगा, तब वे क्या करेंगे? हम कैसे जानेंगे कि सोशल मीडिया पर प्रकाशित कोई सामग्री वास्तविक है या नहीं? और जब समाचारों के स्रोतों को भी हर सामग्री की वास्तविकता की श्रमसाध्य जांच करनी पड़ेगी तो वो कैसे समसामयिक और लाभप्रद बने रहेंगे? सटीक भविष्यवाणियां करने में मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों का रिकॉर्ड भी निराशाजनक रहा है। उन्होंने ही बड़े विश्वास से हमें बताया था कि वैश्वीकरण से सभी को लाभ होगा; कि रेगुलेशंस कम करने से वित्तीय संकट उत्पन्न नहीं होगा; कि विकास का अर्थशास्त्र अफ्रीका की समस्याएं सुलझा देगा; और हमें एकाधिकारों को लेकर चिंतित होने की जरूरत नहीं है। फिर भ्रष्टाचार संबंधी समस्या भी है। इन वर्षों में अनेक प्रमुख अर्थशास्त्रियों की आय का बड़ा हिस्सा कॉर्पोरेट भुगतान से आया है। यकीनन, कुछ अपवाद भी हैं। एन्थ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई ने एआई के अवसरों और उसके खतरों- दोनों के बारे में सूझबूझ और ईमानदारी दिखाई है। अर्थशास्त्र में नोबेल विजेता साइमन जॉनसन ने एक लेख में बताया था कि किस प्रकार अमेरिकी वित्तीय उद्योग ने फेडरल पॉलिसी को कब्जे में लेकर मंदी को जन्म दिया था। किंतु अर्थशास्त्रियों का ओवरऑल रिकॉर्ड विश्वास नहीं जगाता, खासतौर पर तब, जब अनेक अर्थशास्त्री इस टेक्नोलॉजी के सम्भावित लाभों और खतरों- दोनों को कम करके आंकते प्रतीत होते हैं।
मैंने एक खास बात नोटिस की है। मैं जितने भी श्रेष्ठ एआई फाउंडर्स से मिला हूं, उनमें से अनेक ग्रैजुएट या यहां तक कि अंडरग्रैजुएट स्तर पर भी पढ़ाई छोड़ चुके हैं (वास्तव में, 200,000 डॉलर की थेइल फेलोशिप के लिए तो यह शर्त है कि इसके प्राप्तकर्ताओं के पास विश्वविद्यालय की डिग्री न हो!) इसके विपरीत, पारम्परिक नीति-निर्माण एक जड़, नौकरशाही तंत्र पर निर्भर करता है, जिसकी चरमराती मशीनरी एआई के सामने कहीं नहीं ठहरती। यकीनन, हम विश्वविद्यालयों, थिंक टैंकों या सरकारी नीति-निर्माण के तंत्र को तो समाप्त नहीं कर सकते। किंतु असाधारण परिस्थितियां असाधारण प्रतिक्रियाओं की मांग करती हैं। अनेक नीतिगत मुद्दों पर धीमी और पारम्परिक प्रक्रिया भले स्वीकार्य हो- एआई के मामले में ऐसा नहीं किया जा सकता।
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)
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