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दिल्ली तीन पहाड़ियों से घिरी है। ये कोई साधारण पहाड़ियां नहीं हैं। ये कभी कचरा डम्प करने के लिए उपयोग किए जाने वाले लैंडफिल हुआ करते थे। अब कचरे के ये पहाड़ हर वर्ष और ऊंचे होते जा रहे हैं। आसपास रहने वाले लोगों के लिए ये गंभीर स्वास्थ्य जोखिम हैं। गाजीपुर लैंडफिल तो लगभग कुतुब मीनार जितना ऊंचा हो चुका है और 70 एकड़ में फैले कचरे के क्षेत्र पर स्थित है। भलसावा और ओखला के लैंडफिल इससे कुछ मीटर कम ऊंचे हैं, लेकिन गाजीपुर की तरह वे भी कचरे से लबालब भरे हैं, विषैली गैसें उत्सर्जित करते हैं और कम-से-कम 500 मीटर के दायरे में भूजल को प्रदूषित कर चुके हैं। विकसित बनने के अपने स्वप्न को साकार करते समय कचरा प्रबंधन भारत के समक्ष उपस्थित बड़ी चुनौतियों में से एक है। कचरा एक वैश्विक समस्या है। पाठक यह जानकर आश्चर्यचकित होंगे कि प्रति व्यक्ति कचरा उत्पादन आर्थिक वृद्धि का एक सशक्त मापदंड है। यह उपभोक्ता क्रय-शक्ति और औद्योगिक गतिविधि का प्रतिनिधि इंडिकेटर है। कुछ शहर और देश अन्य की तुलना में कचरे का कहीं अधिक दक्षता से प्रबंधन करते हैं। रिसाइकलिंग और पैकेजिंग की हमारी संस्कृति के कारण, भारत में प्रति व्यक्ति कचरा उत्पादन अनेक देशों की तुलना में कम है। फिर भी, दिल्ली की कचरा-पहाड़ियों से स्पष्ट है कि यदि प्रभावी प्रबंधन न हो तो कचरा जहरीले ढेर में परिवर्तित हो सकता है। जिस प्रकार कचरा उत्पादन आर्थिक वृद्धि का माप है, उसी प्रकार कचरे का प्रभावी प्रबंधन विकास का माप है। यह मैंने हाल ही में जापान की अपनी यात्राओं के दौरान सीखा। जापान में संभवतः विश्व की सबसे व्यापक कचरा-संग्रह प्रणाली है। वहां का समाज तरह-तरह के रिसाइकलेबल पदार्थों और बायो व नॉन बायो-डिग्रेडेबल कचरे को अलग-अलग करने को लेकर पूर्णतः शिक्षित है। टोक्यो के एक मैकडॉनल्ड्स में मैंने स्क्रीन के माध्यम से ऑर्डर दिया और भोजन तैयार होने पर उसे पिकअप किया। इस पूरी प्रक्रिया में मनुष्यों से बहुत कम संपर्क हुआ। किंतु ट्रे को डिस्पोज करते समय एक कर्मचारी उपस्थित था, जिसने ट्रे लेकर कचरे को सही डिब्बों में डाला। टोक्यो के अनेक फास्ट-फूड रेस्तरां में यही व्यवस्था देखने को मिली। शहर में कचरा-संग्रह के मानक इतने कठोर हैं कि ग्राहकों पर कचरे के निपटारे की जिम्मेदारी नहीं छोड़ी जा सकती। टोक्यो में मैं कई ब्लॉकों तक एक कागजी गिलास फेंकने के लिए कूड़ेदान तलाशती रही, पर सफल नहीं हुई। एक सेमिनार में मैंने छात्रों के एक समूह से पूछा : आप अपने कचरे का क्या करते हैं? एक ने उत्तर दिया, हमें बचपन से सिखाया गया है कि कचरा घर लेकर जाएं, बाहर न छोड़ें। दूसरे ने कहा, हममें से अधिकांश ऐसी वस्तुएं नहीं खरीदते, जो कचरा उत्पन्न करें और हम कचरा रखने के लिए एक छोटा थैला साथ रखते हैं। भारत में कचरा निपटाने के मानक भिन्न हैं। कभी सार्वजनिक स्थलों पर कूड़ेदान ढूंढना कठिन होता था; हम जहां मन हुआ, कचरा फेंक देते थे। अब कम-से-कम हवाई अड्डों और अस्पतालों में कूड़ेदान मिल जाते हैं, किंतु हम उन्हें खाली करना भूल जाते हैं। बिहार के पूर्णिया में एक फील्ड-विजिट के दौरान तब मेरी निराशा का ठिकाना नहीं रहा, जब एक राहगीर ने मुझे बताया कि बिहार में कूड़ेदान नहीं हैं। सड़क किनारे कचरा छोड़ देना यहां स्वीकार्य है। जब मेरे सहयोगी ने कुछ स्कूली बच्चों से कहा कि वे अपनी चॉकलेट के रैपर कूड़ेदान में डालें तो एक समूह ने दोहराया, हमारे यहां कूड़ेदान नहीं हैं। हम सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छता के प्रति अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने का प्रयास किए बिना स्वच्छ राष्ट्र नहीं बन सकते। यदि हम अपने कचरे के पहाड़ों को समतल करना चाहते हैं, तो हमें स्कूल से ही बच्चों को गार्बेज-डिस्पोजल पर सबक सिखाने होंगे। हम सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छता के प्रति अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने का प्रयास किए बिना स्वच्छ राष्ट्र नहीं बन सकते। यदि कचरे के पहाड़ों को समतल करना है, तो हमें स्कूल से ही बच्चों को सबक सिखाने होंगे।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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नीरज कौशल का कॉलम: स्कूल से ही कचरे से निपटने के सबक हमें सिखाने होंगे

