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जून 2019 में वह उस कंपनी में बिजनेस डेवलपमेंट एसोसिएट के रूप में जुड़ा। कॉलेज से निकलते ही वह सीधे ऐसी कंपनी में गया, जिसे हमारे देश के बच्चों वाले कई परिवार जानते हैं। सेल्स का काम आसान था। बैकएंड टीम बताती थी कि किसके यहां विजिट करनी है। जिसके पास भी कंपनी का एप था और वह उसे कभी-कभार भी यूज करता था तो उसको एक कोर्स बेचना होता था। चूंकि सारी बातचीत बच्चे के भविष्य के बारे में होती थी तो पैरेंट्स उसे पूरे ध्यान से सुनते थे। वे उसे पानी, जूस और नाश्ता तक ऑफर करते। वह उनके घर बैठता, खाता-पीता और बच्चे को परीक्षा पास कराने के लिए पूरे कोर्स मटैरियल से प्री-लोडेड एक टैबलेट बेच देता। टैबलेट देने से पहले वह एक छोटी-सी रकम लेता और एग्रीमेंट साइन कराता, जिसके तहत पैरेंट्स ऋण देने वाली कंपनी को मासिक किश्त चुकाने को रजामंद हो जाते। हर सुबह शुरू में वह खुद को ‘टार्गेट्स’ और ‘कन्वर्जन रेट्स’ की भाषा में समझाने की कोशिश करता। यह शानदार भी लगता था, क्योंकि लोग उसे सेल्समैन नहीं, बल्कि एक ‘रक्षक’ के तौर पर देखते थे- जिसके हाथों में उनके बच्चों को गरीबी से बचाने की कुंजी है। ये पैरेंट्स फैक्ट्रियों और छोटी दुकानों में ओवरटाइम करते थे। एक दिन उसने एक पिता की आंखों में देखा, जो यह हिसाब लगा रहे थे कि 8 हजार रुपए ‘डाउन पेमेंट’ के लिए उन्हें कितने वक्त का खाना छोड़ना पड़ेगा। उसे लगा कि जैसे वह एक लाचार बाप देख रहा है। उसके भीतर चुभन भी हुई, लेकिन फिर भी उसने उस रकम से दस गुना ज्यादा राशि का लोन एग्रीमेंट उसे दे दिया। पहली बार उसे लगा कि वह कोई चीज बेच नहीं रहा, बल्कि धीमी लूट कर रहा है। उसे लगा कि वह झूठे वादों की बुनियाद पर करियर बना रहा है। जहां उसके सीनियर्स ‘क्रशिंग द नंबर्स’ का जश्न मना रहे थे, वहीं हर बिक्री उसकी चेतना पर एक दाग छोड़ रही थी। वह किसी की उम्मीदों को कोई वस्तु बनाने के खेल में शामिल नहीं होना चाहता था। वह भी दूसरे युवाओं की तरह शादी और बच्चों के सपने देखता था। लेकिन सपने में देखता कि उसका बच्चा भी किसी कंपनी के लिए महज एक लीड और पिता के तौर पर वह खुद एक ‘वॉलेट’ जैसा बन रहा है। उस दिन उसे लगा कि उसने कुछ हजार रुपए और एक बिजनेस कार्ड टाइटल के लिए ईमानदारी का सौदा कर लिया। छह हफ्ते बाद, जुलाई के मध्य में उसे लगा कि ‘रोजी-रोटी कमाना’ और ‘जिंदगी को लूटना’ दो अलग बातें हैं। अपने पिताजी से सलाह लेकर उसने तुरंत इस्तीफा दिया। इसलिए नहीं कि वह काम नहीं कर पा रहा था, बल्कि वह उस इंसान के साथ नहीं जी सकता था, जो वह बनता जा रहा था। वह आज भी सेल्स में है और बहुत बेहतर कर रहा है, क्योंकि वह लोगों को वास्तविक जरूरत की चीजें बेचता है। उसने रिज्यूमे से उस अनुभव को भी हटा दिया। छह हफ्तों का वह काम किसी को पता नहीं। वह लोगों से कहता है, ‘पास होने के बाद मैं तीन महीने बेरोजगार रहा, फिर नौकरी मिली।’ लेकिन वह जानता है कि वह उसका सबसे स्याह रूप था। आज यह कहानी बताने की वजह है, क्योंकि कैम्पस रिक्रूटमेंट चल रहे हैं। कंपनियां विश्वविद्यालयों से उत्कृष्ट प्रतिभाएं चुन रही हैं। मैं आपको ऊंची तनख्वाह वाली नौकरी पाने के लिए गुड लक कहूंगा, लेकिन यह गुजारिश भी करूंगा कि आप भी अपने लिए उत्कृष्ट कंपनी चुने- यानी एथिक्स वाली कंपनी। ताकि आपको वो दर्द न झेलना पड़े, जो उपरोक्त कर्मचारी ने महसूस किया। फंडा यह है कि कोई भी करियर माइलस्टोन स्वच्छ अंतरात्मा के बराबर कीमत का नहीं होता। कोई भी तनख्वाह इतनी नहीं कि वह किसी के सपने छीनने के अपराध-बोध की भरपाई कर दे। और इस बात को कठिनाई पाकर न समझें।
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एन. रघुरामन का कॉलम: ईमानदारी ऐसी मुद्रा है, जिसका मूल्य कभी नहीं घटता

