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फरीदाबाद के तिलपत गांव में होली सिर्फ रंगों का नहीं बल्कि आस्था और परंपरा का उत्सव है. 100 साल पुरानी बाबा सूरदास की परिक्रमा 35 से 40 किमी की यात्रा के साथ 17 से 18 गांवों से गुजरती है. लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं. तिलपत की यह ऐतिहासिक होली भक्ति, विश्वास और एकता की अनोखी मिसाल है.
फरीदाबाद: फरीदाबाद के तिलपत गांव की होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है इसमें आस्था, परंपरा और भरोसे की एक गहरी कहानी छुपी है. जब बाकी देश होली की तैयारियों में रंगीन हो रहा होता है तिलपत की गलियों में उस समय बाबा सूरदास की भक्ति की गूंज सुनाई देती है. गांव में 100 साल से भी पुरानी ये परंपरा आज भी वैसे ही जोश के साथ निभाई जाती है जैसे पहले निभाई जाती थी. नई-पुरानी पीढ़ियां एक-साथ इस उत्सव का हिस्सा बनती हैं.
अनोखी होली- बाबा की भव्य परिक्रमा
Local18 से बातचीत में मंदिर के पुजारी रवि शास्त्री बताते हैं कि वो चार साल से इस मंदिर में सेवा कर रहे हैं लेकिन जितनी खास होली यहां देखी है उतनी फरीदाबाद के और किसी हिस्से में नहीं होती हैं. उनके लिए इस उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण है बाबा की भव्य परिक्रमा. इस साल 1 मार्च को सुबह 7:15 बजे बाबा सूरदास की पालकी के साथ ये यात्रा शुरू होगी. ये कोई छोटी यात्रा नहीं होती करीब 35 से 40 किलोमीटर लंबा रास्ता है जो 17 से 18 गांवों और कई मंदिरों से होकर गुजरता है. पुजारी जी कहते हैं लाखों की तादाद में लोग दूर-दूर से इस परिक्रमा में शामिल होने पहुंचते हैं.
कैसे मनाई जाती है होली
मंदिर प्रबंधन ने इस बारे के कार्यक्रम भी खास बनाए हैं. 1 मार्च को सुबह से बाबा सूरदास की पालकी और लंबी परिक्रमा होगी. 2 मार्च को मंदिर में पारंपरिक होलिका दहन होगा. 3 मार्च को चंद्र ग्रहण के चलते सुबह की आरती के बाद मंदिर बंद रहेगा और शाम 6:47 पर ग्रहण खत्म होते ही मंदिर एक घंटे के लिए खुलेगा जब विशेष श्रृंगार होगा. 4 मार्च को असली रंगों वाली होली होगी जहां बाबा के भक्त अबीर-गुलाल के साथ उत्सव मनाएंगे.
क्या है मान्यताएं
तिलपत की होली के पीछे एक दिल छू लेने वाली कहानी है. पुजारी रवि शास्त्री बताते हैं कि कभी गांव पर बहुत बड़ी मुसीबत आई थी. अचानक मौतें होने लगीं महिलाएं विधवा हो रही थीं डर इतना बढ़ गया कि लोग गांव छोड़ने लगे. उस समय बाबा सूरदास गांव आए. उन्होंने लोगों को हिम्मत दी उनका मनोबल बढ़ाया और गांव छोड़ने से रोका. बाबा के आशीर्वाद से गांव की परेशानियां दूर हो गईं और फिर से रौनक लौट आई। कहा जाता है बाबा सूरदास ने ही गांव की खुशहाली के लिए इस परिक्रमा की शुरुआत की थी और आज भी लोग उसी श्रद्धा से इस परंपरा को निभा रहे हैं.
क्या है इसका उद्देश्य
पुजारी रवि शास्त्री कहते हैं बाबा की महिमा का बखान करना आसान नहीं है. ये परिक्रमा सिर्फ पैदल चलना नहीं बल्कि बाबा के उस एहसान को याद करना है जिसने गांव को उजड़ने से बचा लिया था. आज आलम ये है कि तिलपत की इस अलग तरह की होली को देखने और बाबा का आशीर्वाद लेने के लिए लोग महीनों पहले से तैयारी शुरू कर देते हैं. अगर आप फरीदाबाद या आस-पास के इलाकों में रहते हैं तो तिलपत की ऐतिहासिक परिक्रमा और वहां की होली ज़रूर देखिए ये अनुभव हमेशा याद रहेगा.
About the Author
विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें
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