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ग्लोबल साउथ के एक बड़े हिस्से के लिए एनर्जी ट्रांसिशन को अकसर जलवायु के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन करोड़ों लोग इसे मुख्यतः अवसरों के विस्तार, अफोर्डेबिलिटी और सेवाओं की डिलीवरी के नजरिये से देखते हैं। यही कारण है कि क्लीन-एनर्जी क्रांति का अगला चरण उन देशों के नेतृत्व में आगे बढ़ेगा, जो न केवल अधिक से अधिक सोलर पेनल स्थापित करेंगे, बल्कि अपने ग्रिड, बाजारों और संस्थागत ढांचे का ठीक से आधुनिकीकरण भी करेंगे। पुराना मॉडल सरल था : विद्युत संयंत्र बिजली पैदा करते थे और ग्रिड उसे सीधे व्यवसायों तथा घरेलू उपभोक्ताओं तक पहुंचाता था। नया मॉडल अलग है। बिजली व्यवस्था विकेंद्रीकृत हो रही है, क्योंकि घर, खेत और निजी उद्यम रूफटॉप सोलर, बैटरी स्टोरेज प्रणालियां और बिजली से चलने वाले उपकरण अपना रहे हैं। अब नागरिक केवल निष्क्रिय उपभोक्ता नहीं रहे; वे ‘प्रोस्यूमर’ बन रहे हैं। यह शब्द प्रोड्यूसर और कंज्यूमर को मिलाकर बनाया गया है। यानी अब लोग बिजली का उपभोग भी करते हैं और उत्पादन भी। देखें तो विकेंद्रीकरण और रिन्यूएबल्स जटिलताओं को जन्म देते हैं। कारण, निरंतर और गुणवत्तापूर्ण सेवा की अपेक्षाएं बनी रहती हैं, जबकि सौर-पवन ऊर्जा परिवर्तनशील होती हैं और ऐसी ऊर्जा प्रणालियों की परिसम्पत्तियां व्यापक रूप से बिखरी होती हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए क्लीन-ग्रिड्स को साझा डिजिटल बुनियादी ढांचे की जरूरत होगी- ठीक इंटरनेट की तरह- जहां एसेट्स खुले ढांचे पर संवाद कर सकें। दरअसल, रियल-टाइम के डेटा और क्षमताओं पर आधारित और डिजिटल ढांचों पर निर्मित एआई-सक्षम ग्रिड ग्लोबल साउथ के विकास के लिए उतने ही निर्णायक होंगे, जितने कि सड़क और बंदरगाह जैसे पारम्परिक बुनियादी ढांचे रहे हैं। ऊर्जा आपूर्ति में एआई एप्लिकेशंस का उपयोग करना एक स्वाभाविक कदम है। यह तकनीक मांग के पूर्वानुमान को बेहतर बनाने और खरीद और डिलीवरी प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए उपयुक्त है। पहले ही यह संभावित खराबियों का पूर्वानुमान लगाकर मेंटेनेंस में मदद देने लगी है, ताकि बिजली कटौती रोकी जा सके और बिलिंग और वसूली प्रक्रियाओं को सुगम बनाया जा सके।
भारत के डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का उदाहरण देखें। इसका उद्देश्य नए प्रतिस्पर्धी इको-सिस्टम का निर्माण करना है। देश के सार्वजनिक प्लेटफॉर्म स्टार्टअप्स और सेवा प्रदाताओं को इनोवेशंस को आगे बढ़ाने की सुविधा देते हैं, ताकि उन्हें शून्य से शुरुआत नहीं करनी पड़े। साथ ही वे उन्हें मॉड्यूलर-समाधान भी उपलब्ध कराते हैं, जिससे वे किसी एक विक्रेता पर निर्भरता के जाल में न फंसें। इसका मकसद मौजूदा प्रणालियों को सुदृढ़ बनाना है, न कि संपूर्ण ढांचे को जड़ से बदल देना। वास्तव में, भारत ग्लोबल साउथ के लिए एक मॉडल प्रस्तुत करता है। विकासशील देश अपने बाजारों की बुनियादी संरचना के बारे में जिस प्रकार सोचते हैं, वही तय करेगा कि वे डिजिटल क्रांति के अगले चरण में सीधे प्रवेश कर पाएंगे या दूसरों पर डिजिटल रूप से निर्भर बने रहेंगे। यकीनन, अल्प-विकसित और छोटे देश अनेक बाधाओं का सामना करते हैं- खंडित बाजारों और नाजुक अर्थव्यवस्थाओं से लेकर सीमित बजट तक। लेकिन अंतरराष्ट्रीय सोलर गठबंधन इन अवरोधों को पार करने में सहायक हो सकता है। सौर ऊर्जा के विस्तार पर सहयोग के लिए प्रतिबद्ध 125 सदस्य देशों को साथ लेकर यह गठबंधन ऊर्जा के लिए एआई पर एक वैश्विक मिशन के माध्यम से, एआई-संचालित और नागरिक-केंद्रित ग्रिड रूपांतरणों का वैश्विक इंजन बनने की क्षमता रखता है। ग्लोबल साउथ पहले भी इस समस्या का सामना कर चुका है, विशेषकर डिजिटल बुनियादी ढांचे के विस्तार के दौरान। उस अनुभव ने सिखाया था कि परस्पर-तालमेल के बिना किया गया आधुनिकीकरण रिजिड-सिस्टम्स में जकड़ सकता है, जिन्हें उन्नत करना महंगा होता है। यही कारण है कि एनर्जी के क्षेत्र में एआई का समुचित उपयोग करना केवल एक तकनीकी चुनौती ही नहीं, रणनीतिक अनिवार्यता भी है। क्लीन-एनर्जी ट्रांसिशन अब अपने प्लेटफॉर्म युग में प्रवेश कर रहा है। ग्लोबल साउथ को पुराने ग्रिड मॉडल की नकल करने की आवश्यकता नहीं है- जिनका समृद्ध देश भारी लागत पर आधुनिकीकरण कर रहे हैं। वह रिन्यूएबल एनर्जी को एआई और डिजिटल बुनियादी ढांचे से जोड़कर सीधे अगले चरण में छलांग लगा सकता है। भारत इस दिशा में मार्ग दिखा रहा है। भारत ग्लोबल साउथ के लिए एक मॉडल प्रस्तुत करता है। विकासशील देश अपने बाजारों की बुनियादी संरचना के बारे में जिस प्रकार सोचते हैं, वही तय करेगा कि वे डिजिटल क्रांति के अगले चरण में सीधे प्रवेश करेंगे या नहीं।
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट। इस लेख के सहलेखक इंटरनेशनल सोलर एलायंस के महानिदेशक आशीष खन्ना हैं)
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नंदन नीलेकणी का कॉलम: एनर्जी में ग्लोबल साउथ को एक दिशा दे सकते हैं हम

