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- Maharashtra Political Churn: Ajit Pawar Death & Sharad Pawars Fading Influence
2 घंटे पहले
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नीरजा चौधरी वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार
अजित पवार की आकस्मिक मृत्यु और उसके बाद की घटनाओं ने महाराष्ट्र में राजनीतिक समीकरणों को ऐसे बदल दिया है, जिसकी उम्मीद नहीं थी। फिलहाल तो इसने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के दोनों धड़ों की विलय की प्रक्रिया को रोक दिया है। इस पर काम चल रहा था और 12 फरवरी को इसकी घोषणा होने वाली थी।
हालांकि किसी ने भी यह सार्वजनिक नहीं किया था कि इसकी शर्तें क्या होतीं। क्या अविभाजित एनसीपी एनडीए के साथ रहती? शरद पवार ने बार-बार कहा है कि वे भाजपा के साथ नहीं जाएंगे। और यह मुश्किल ही था कि अजित पवार या उनकी पार्टी के वे लोग जो मुम्बई में सरकार में हैं, या जिनके सिर पर ईडी/सीबीआई की तलवार लटक रही थी, वे महायुति से अलग होना चाहते।
यह सम्भव था कि अविभाजित एनसीपी एनडीए के साथ बनी रहती, जिसमें सुप्रिया सुले को बड़ी भूमिका दी जाती और सीनियर पवार रिटायर हो जाते। लेकिन अजित पवार के धड़े वाली एनसीपी के सीनियर नेताओं- प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे, छगन भुजबल और धनंजय मुंडे- जो सभी गैर-मराठा हैं- ने मीटिंग को पहले ही टाल दिया।
अजित पवार के धड़े वाली एनसीपी के नेता मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सम्पर्क में थे और वे सुनेत्रा पवार को उप मुख्यमत्री के तौर पर तुरंत शपथ दिलाने के लिए मान गए थे। सच यह है कि न तो अजित पवार का करीबी परिवार और न ही उनके सीनियर साथी पार्टी को शरद पवार को सौंपना चाहते थे, क्योंकि उन्हें डर था कि शरद पवार पार्टी का कंट्रोल वापस पा सकते हैं।
अजित दादा की मौजूदगी और पार्टी पर उनकी पकड़ के बिना वे कमजोर महसूस कर रहे थे। लेकिन एनसीपी को अजित पवार की मृत्यु के बाद मिली हमदर्दी का फायदा मिला। क्योंकि इसके बाद हुए जिला परिषद् चुनावों में पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया, वहीं शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी का प्रदर्शन खराब रहा। 2024 के राज्य विधानसभा चुनावों में भी अजित दादा की एनसीपी शरद पवार की एनसीपी से ज्यादा ताकतवर साबित हुई थी।
इधर एक और महत्वपूर्ण घटना यह घटी कि भाजपा ने रितु तावड़े को बृहन्मुम्बई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में मेयर के रूप में नियुक्त कर दिया। शिवसेना के संजय घाड़ी डिप्टी मेयर बने। एकनाथ शिंदे मेयर पद के लिए कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्हें यहां भी नंबर दो की पोजिशन से ही संतोष करना पड़ा।
महाराष्ट्र की राजनीति में आज चल रहे इस मंथन से किसे फायदा होगा? एनसीपी के टूटने, अजित पवार की असामयिक मृत्यु, शरद पवार के कमजोर पड़ने और कांग्रेस की लगातार गिरावट के साथ मराठा खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं।
मराठा वोटों (35%) पर कब्जा करने की होड़ लगी है। एनसीपी के दोनों गुटों के अलावा एकनाथ शिंदे- जो खुद मराठा हैं और जिन्हें ठाणे जैसे शहरी इलाकों से बड़ा समर्थन मिलता है- अजित दादा की मृत्यु के बाद मराठों के साथ नए तरीके से खड़े हो सकते हैं। ऐसे में क्या कांग्रेस फिर से खुद को मजबूत कर पाएगी? अभी तक तो हालात देवेंद्र फडणवीस के हित में रहे हैं और संघ फडणवीस के हाथ मजबूत करने के लिए भाजपा के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है।
फडणवीस ने बिना समय गंवाए सुनेत्रा पवार को अपनी सरकार में शामिल कर लिया और जाहिर है कि उन्हें इसके लिए दिल्ली से भी मंजूरी मिल गई थी। इससे उन्हें एकनाथ शिंदे के दबाव को कम करने में मदद मिली।
फडणवीस ने वित्त विभाग अपने पास ही रखा है, जो पहले अजित दादा के पास था। इसे किसी भी ऐसे कद्दावर नेता के लिए रिजर्व में रखा जा सकता है, जो शरद पवार की एनसीपी से एनडीए में आने का फैसला कर सकता है।
जिस सूझबूझ से फडणवीस ने हाल के घटनाक्रमों को संभाला, उसने उन्हें मोदी के बाद के दौर के लिए तैयार हो रहे नेताओं की सूची में एक पायदान ऊपर पहुंचा दिया है। क्या 6 बार के डिप्टी सीएम अजित दादा की मौत और 85 साल के शरद पवार की घटती ताकत महाराष्ट्र की राजनीति के उस पवार साम्राज्य के कमजोर होने का संकेत है, जिसने आधी सदी तक राज्य पर राज किया या उस पर असर डाला?
पवार युग 1977 में शरद पवार के उदय के साथ शुरू हुआ, जो तीन बार मुख्यमंत्री बने और केंद्र सरकार में रक्षा मंत्री और कृषि मंत्री के पदों तक पहुंचे। वे चाहें सत्ता में हों या बाहर, उन्हें दरकिनार नहीं जा सकता था। उन्हें अब भी एक ऐसे निष्णात राजनेता के तौर पर देखा जाता है, जो राज्य को बखूबी जानते हैं और स्टेट की मशीनरी कैसे काम करती है, इसकी बारीकियों से भलीभांति परिचित हैं।
क्या 6 बार के डिप्टी सीएम अजित दादा की मृत्यु और 85 साल के शरद पवार की घटती ताकत महाराष्ट्र की राजनीति के उस पवार साम्राज्य के कमजोर होने का संकेत है, जिसने आधी सदी तक उसकी सियासत पर असर डाला?
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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