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पिछले महीने मेरी मुलाकात मुम्बई के एक सर्जन मित्र से हुई। वे अपने क्षेत्र में जाने-माने हैं और लो-प्रोफाइल रहते हैं। पिछले दो वर्षों में उन्होंने लगभग दस किलो वजन कम किया। उनका वजन पहले भी बहुत अधिक नहीं था, लेकिन अब 5 फीट 9 इंच की लंबाई पर उनका वजन करीब 60 किलो है। बातचीत में पता चला कि उन्होंने यह संयमित खानपान, नियमित शारीरिक गतिविधि और पर्याप्त नींद लेकर किया। वे मुस्कराते हुए बता रहे थे कि कई लोग उन्हें देखकर चिंतित हो जाते हैं- इतना वजन कैसे घट गया? लेकिन वे पहले से ज्यादा तरोताजा, ऊर्जावान और आत्मविश्वासी महसूस करते हैं। इधर वजन घटाने वाली दवाओं का जबर्दस्त प्रचार देखने को मिला है। आने वाले महीनों में वजन घटाने की कुछ और दवाएं पेटेंट से बाहर होंगी तो उनके प्रचार में भी तेजी आएगी। हमारे देश में दवाओं का विज्ञापन करना कानूनी नहीं है, लेकिन कंपनियां रास्ते निकाल लेती हैं। जैसे तम्बाकू या शराब के मामले में सरोगेट मार्केटिंग होती है- उसी नाम से कोई और उत्पाद लॉन्च कर दिया जाता है और उसका प्रचार शुरू हो जाता है। लेकिन मोटापे की जड़ कहीं और है। आज हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड न केवल आसानी से उपलब्ध हैं, बल्कि वे संयमित भोजन से सस्ते भी पड़ते हैं। उन पर भारी-भरकम विज्ञापन किए जाते हैं और वे 24 घंटे उपलब्ध रहते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि हमारा शरीर बार-बार खाते रहने के लिए बना ही नहीं है। अगर हम इतिहास में बहुत पीछे न भी जाएं, तो करीब 200 साल पहले तक अधिकांश लोग दिन में दो ही बार कुछ खाते थे। उससे भी पहले, आदि मानव को जब भोजन मिलता था, तभी वह कुछ खाता था। लेकिन आज हम लगभग हर दो-तीन घंटे में कुछ न कुछ खा लेते हैं। इससे शरीर में इंसुलिन का स्तर ऊंचा बना रहता है। धीरे-धीरे मस्तिष्क का तृप्ति केंद्र कम संवेदनशील हो जाता है। हमें असली भूख की पहचान नहीं रह जाती है। मोटापा उसी का परिणाम है। फिर उसी मोटापे के इलाज के लिए दवाएं बाजार में लाई जाती हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि वजन घटाने वाली दवाओं की कुछ खास चिकित्सकीय स्थितियों में भूमिका जरूर हो सकती है। लेकिन जीवनशैली को ठीक किए बिना वे स्थायी स्वास्थ्य नहीं दे सकतीं। आहार और जीवनशैली में बदलाव से वजन घटाने का असर गहरा और टिकाऊ होता है। जब हम धीरे-धीरे वजन कम करते हैं, तो मांसपेशियां सुरक्षित रहती हैं, शरीर का मेटाबॉलिज्म संतुलित होता है और ऊर्जा का स्तर बेहतर होता है। शरीर को नए संतुलन के साथ ढलने का समय मिलता है। यही असली और समग्र तरीका है। स्वास्थ्य का मूल मंत्र है- संयम। हमें अपने शरीर और मन दोनों को कम खाने की आदत डलवानी होगी। यह कठिन नहीं है, बस नियमितता चाहिए। भोजन की आवृत्ति कम करें। हर समय कुछ न कुछ खाते रहने की आदत छोड़ें। पैकेटबंद और अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड की जगह घर का सादा भोजन चुनें। रोज कम से कम 30-40 मिनट पैदल चलें। लिफ्ट की जगह सीढ़ियां लें। पर्याप्त नींद लें, क्योंकि नींद की कमी भी वजन बढ़ाती है। यह समझें कि भोजन के बीच हल्की भूख लगना कोई आपात-स्थिति नहीं है। इसके लिए हमें तुरंत कुछ खा लेने की जरूरत नहीं होती। कई बार यह संकेत होता है कि शरीर का मेटाबॉलिज्म संतुलित हो रहा है। हर भूख असली भूख नहीं होती; कई बार वह सिर्फ आदत होती है। आने वाले समय में वजन घटाने वाली दवाओं और क्विक फिक्स समाधानों का प्रचार बढ़ेगा। लेकिन यह हमें तय करना है कि हम तेज नतीजों के पीछे भागेंगे या टिकाऊ सेहत को चुनेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम: हमारा शरीर बार-बार कुछ न कुछ खाते रहने के लिए नहीं बना है

