शशि थरूर का कॉलम: अंतरिक्ष के क्षेत्र में हमारे पैर मजबूती से टिके रहने चाहिए Politics & News

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3 घंटे पहले

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शशि थरूर पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद

दशकों से इसरो देश की वैज्ञानिक प्रतिष्ठा का आधार रहा है। मंगलयान के साथ भारत पहले ही प्रयास में मंगल की कक्षा में पहुंचने वाला पहला देश बना था तो चंद्रयान-3 के जरिए उसने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर रोवर उतारने का ऐतिहासिक कीर्तिमान भी स्थापित किया।

यह सब इतने बजट में किया गया, जितने में हॉलीवुड की किसी स्पेस-एपिक के प्रमोशन का खर्च भी मुश्किल से कवर हो पाता। लेकिन पिछले एक वर्ष में इसरो के गौरवशाली रिकॉर्ड पर तीन प्रमुख मिशन विफलताओं की छाया पड़ गई है, जिनमें पीएसएलवी के लगातार दो विफल प्रक्षेपण भी शामिल हैं। ‘किफायती इनोवेशन’ और ‘अडिग विश्वसनीयता’- इन दो स्तंभों पर खड़े कार्यक्रम के लिए यह केवल तकनीकी झटका भर नहीं है; साख का संकट भी है।

पीएसएलवी लगभग 30 वर्षों से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का मुख्य आधार रहा है। इसी ने भारत को चंद्रमा और मंगल तक पहुंचाया और लगभग 400 विदेशी उपग्रहों को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित कर वैश्विक प्रक्षेपण परिदृश्य में भारत को एक मुकाम दिलाया। लेकिन हाल में पीएसएलवी-सी61 (मई 2025) और पीएसएलवी-सी62 (जनवरी 2026) अभियानों के दौरान तीसरे चरण में आई गड़बड़ियों के कारण अर्थ-ऑब्जर्वेशन और सामरिक महत्व के उपग्रहों का नुकसान हुआ है। ये दुर्घटनाएं इसरो और उसके मूल उद्देश्य के बीच बढ़ती दूरी को दर्शाती हैं।

अपने प्रारंभिक चरण में भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम जनता की आवश्यकताओं पर आधारित था। तर्क यह था कि यदि उपग्रह-तकनीक को विकास का साधन बनाया जाए, तो यह जीवन बदल सकती है, अर्थव्यवस्था को शक्ति दे सकती है और विश्व में भारत की स्थिति को नए सिरे से परिभाषित कर सकती है। इसरो ने इस विजन को साकार किया। उसने उपग्रहों की एक सुदृढ़ प्रणाली विकसित की, जो लाखों लोगों के लिए जीवनरेखा बनी।

भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली और उसके बाद जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट शृंखला ने दूरदराज के गांवों तक कनेक्टिविटी पहुंचाई। इससे वंचित आबादी के लिए टेलीमेडिसिन संभव हुई और उन छात्रों के लिए दूरस्थ शिक्षा के अवसर खुले, जो अन्यथा पीछे छूट सकते थे।

पंजाब और तमिलनाडु के खेतों में किसान रिसोर्ससैट जैसे अर्थ-ऑब्जर्वेशन उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग फसलों के स्वास्थ्य की निगरानी और जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए करते हैं। चक्रवात के मौसम में इसरो के उपग्रहों से मिलने वाली प्रारंभिक चेतावनियां संवेदनशील समुदायों की समय रहते निकासी सुनिश्चित करती हैं और जीवन बचाती हैं। यह वैसी अंतरिक्ष तकनीक है, जिसके पैर रोजमर्रा के जीवन की जमीन पर मजबूती से टिके हुए हैं।

लेकिन हाल की घटनाएं संकेत देती हैं कि इसरो की बढ़ती महत्वाकांक्षा गुणवत्ता नियंत्रण और आपूर्ति शृंखलाओं पर दबाव डाल रही है। समस्या संसाधनों की भी है। जिस सीमित बजट के साथ भारत ने अपनी पिछली उपलब्धियां हासिल की थीं, वही उसकी सबसे बड़ी बाधा भी था और उसी के कारण वे उपलब्धियां प्रभावी लगती थीं।

आज भारत अंतरिक्ष पर प्रतिवर्ष लगभग 2 अरब डॉलर खर्च करता है, जबकि चीन का व्यय लगभग 16 अरब डॉलर और अमेरिका का लगभग 25 अरब डॉलर है। और जहां भारत वर्तमान में लगभग 21 सक्रिय ऑब्जर्वेशन-सैटेलाइट्स संचालित कर रहा है, वहीं चीन 1,000 से अधिक उपग्रहों का संचालन करता है, जिनमें से 250 डिफेंस के लिए समर्पित हैं।

हमें याद रखना चाहिए कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम कोई लग्जरी नहीं है; यह हमारे विकास का एक महत्वपूर्ण साधन, इनोवेशंस का उत्प्रेरक, सुरक्षा का स्तंभ और राष्ट्रीय गौरव का स्रोत है। सौभाग्य से, इसरो पहले भी चुनौतियों पर विजय पा चुका है और उसकी तकनीकी क्षमताएं असंदिग्ध हैं।

अब जब अंतरिक्ष, वैज्ञानिक जिज्ञासा से आगे बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा का रणनीतिक क्षेत्र बनता जा रहा है, तो संसाधनों के संकट को अनदेखा करना कठिन हो गया है। इस दिशा में एक स्ट्रैटेजिक-रीसेट हमारे लिए जरूरी है।

(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

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