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- Shekhar Gupta Column: Trumps 3 Years Will Be Tumultuous For Global Politics
2 घंटे पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
आज की भू-राजनीति में जो खेल चल रहा है, उसे ताकत बढ़ाने और समय हासिल करने का खेल कहा जा सकता है। यह एक बनाम दूसरे की होड़ नहीं है। इसमें ऐसा नहीं है कि एक की ताकत बढ़े तो दूसरे की घट जाए, बल्कि ऐसा है कि एक की ताकत बढ़ती है तो दूसरे की उससे भी ज्यादा बढ़ जाती है। आपकी जितनी ताकत है, आपमें फायदा उठाने की जितनी क्षमता है, उतना ही समय आपके हाथ में होता है। अब भारत इस समीकरण में कहां है, यह आगे पता चलेगा।
जरा लेसोथो के बारे में सोचिए। सिर्फ 23 लाख की आबादी वाला यह पहाड़ी देश चारों तरफ से दक्षिण अफ्रीका से घिरा है। बहुत गरीबी से जूझ रहे इस देश में एड्स से पीड़ित लोगों का प्रतिशत सबसे ज्यादा है और इसकी प्रति व्यक्ति आय पाकिस्तान की प्रति व्यक्ति आय से आधी है। लेकिन इसके पास एक खास औद्योगिक ताकत है।
इसे दुनिया का ‘जीन्स केंद्र’ कहा जाता है। यहां सबसे ज्यादा रोजगार गारमेंट्स उद्योग देता है, जिसमें 50,000 लोग काम करते हैं। यह सबसे ज्यादा निर्यात अमेरिका को करता है। उसके निर्यात का मूल्य उसकी जीडीपी के 10% के बराबर है। उसे यह ताकत ‘अफ्रीकन ग्रोथ एंड अपॉर्चूनिटी एक्ट’ के तहत अमेरिका में बिना शुल्क के व्यापार करने की सुविधा से मिली।
लेकिन 2025 में जब ट्रम्प आए, तो इस एक्ट को हटा दिया गया। उल्टे लेसोथो पर 50% का ‘लिबरेशन डे’ टैरिफ लगा दिया गया, जिससे उसकी हालत बहुत खराब हो गई। हालांकि, बाद में टैरिफ घटाकर 15% कर दिया गया, लेकिन अब लेसोथो भारत, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे उत्पादकों से मुकाबला नहीं कर सकता। उसने ‘आपदा काल’ घोषित कर दिया है।
हम लेसोथो को ऐसे देशों का उदाहरण मान सकते हैं, जिनके पास न ताकत है और न समय। उसकी अर्थव्यवस्था ट्रम्प के हटने के लिए तीन साल इंतजार नहीं कर सकती। इसके बाद सबसे ज्यादा ताकत और समय वाले देश चीन को देखें।
व्यापार में यह विक्रेता (बहुत जरूरी खनिज और चुम्बक) और खरीदार (सोयाबीन, मक्का) दोनों के रूप में मजबूत स्थिति में है। सैन्य ताकत के मामले में यह अमेरिका के बराबर पहुंच रहा है। जब अमेरिका का ध्यान कहीं और है और रणनीतिक दबाव कम है, तो इस दौरान चीन अपनी ताकत इतनी बढ़ा सकता है कि ट्रम्प के बाद आने वाला कोई भी नेता उसकी बराबरी नहीं कर पाएगा।
अगर हमारे पैमाने पर लेसोथो सबसे नीचे और चीन सबसे ऊपर है, तो बाकी देशों का क्या? यूरोप के संकट और लेसोथो के संकट को एक साथ तौलना अजीब लग सकता है, लेकिन ऐसा है नहीं। यूरोप को इसका अहसास म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में हुआ, जब उसे लगा कि उसकी ताकत कम है और वह सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर है।
अब वे सुरक्षा पर खर्च बढ़ाएंगे, लेकिन खुद को सुरक्षित महसूस करने में उन्हें कई साल लगेंगे। हथियार प्रणालियों- जैसे लड़ाकू विमान, पनडुब्बी, मिसाइल और 155-मिमी तोप को आप हैमलेज या अमेजन से ऑर्डर करके नहीं खरीद सकते। इसके अलावा आपको लड़ने के लिए नागरिक भी तैयार करने पड़ते हैं। जब पुतिन आपके दरवाजे पर खड़े हों, तब आपके पास वक्त नहीं बचता।
क्या हम चीन को अमेरिका से ऊपर रख सकते हैं? चीन के मुकाबले अमेरिका की ताकत अभी भी ज्यादा है, लेकिन उसके पास समय सिर्फ ट्रम्प के तीन साल तक का है। यह दुनिया के निर्यात के लिए सबसे बड़ा बाजार है और इसके पास टैरिफ की ताकत है।
इसकी सेना सबसे मजबूत है और उसके सहयोगी पिछले 80 साल से उसके साथ हैं। यूरोप, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान उस पर निर्भर हैं। भारत जैसे उसके रणनीतिक सहयोगियों को भी चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका की जरूरत है।
टेक्नोलॉजी की बड़ी कंपनियां, एआई में आगे रहने की ताकत और दुनिया की रिजर्व करेंसी डॉलर उसके पास है, लेकिन ट्रम्प इनमें निवेश करने के बजाय इन्हें खर्च कर रहे हैं। इससे अमेरिका की ताकत घट रही है और समय हाथ से निकल रहा है।
तीन साल बाद वह शायद एक अलग तरह का सुपरपावर होगा। तब क्या वह चीन से पीछे रह जाएगा? क्या उसके सहयोगी उस पर भरोसा करेंगे? एक नाम याद रखिए- ग्रीनलैंड। अमेरिका के सहयोगियों को चिंता होगी कि अगर भविष्य में कोई और अप्रत्याशित नेता आ गया तो क्या होगा।
वैसे, अमेरिका के पास समय सिर्फ तीन साल का ही नहीं, बल्कि अगले चुनाव तक का है, या सिर्फ 10 महीने भी हो सकता है, अगर मध्यावधि चुनाव ने ट्रम्प को कमजोर कर दिया। यह एक महत्वपूर्ण बात दिखाता है- लोकतांत्रिक देशों के पास समय की सीमा होती है। अगले एक से पांच साल में इन सभी देशों में चुनाव होंगे।
इजराइल को बढ़त हासिल है। यह एशिया और अफ्रीका के किनारे स्थित एक पश्चिमी लोकतंत्र है और अमेरिका, यूरोप और भारत का महत्वपूर्ण सहयोगी है, लेकिन चुनाव या अदालत के फैसले के बाद नेतन्याहू को जाना पड़ सकता है। उनके बाद अलग तरह का इजराइल सामने आ सकता है।
समय की सीमा लोकतंत्र की खासियत है। लेकिन यह सीमा जिनपिंग, पुतिन और मुनीर जैसों पर लागू नहीं होती। उत्तर कोरिया जैसी पूरी तानाशाही हो या पाकिस्तान जैसी मिश्रित तानाशाही, वहां समय की सीमा नहीं होती। हालांकि, ऐसे देशों में अचानक बदलाव भी हो सकते हैं।
अब हर देश यह खेल सीख रहा है। कुछ देश नए सहयोगी खोज रहे हैं और कुछ उन देशों को महत्व दे रहे हैं, जिन्हें पहले नजरअंदाज करते थे। भारत और यूरोप इसका बड़ा उदाहरण हैं। इस बदली दुनिया ने भारत को ज्यादा खुले और प्रतिस्पर्धी बाजार के फायदे देखने के लिए मजबूर किया है।
रूस, ईरान, तुर्किये, सऊदी अरब और यूएई जैसे देश भी खुद को इस प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर रहे हैं। ताकत और समय के पैमाने पर हम कहां हैं? हमारी ताकत अभी सीमित है। इसका अंदाजा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान लगा, जब हमारे 32 रणनीतिक सहयोगियों में से बहुत कम हमारे साथ खड़े दिखे। लेकिन भारत की सीमित ताकत उसकी अर्थव्यवस्था और बाजार के आकार से जुड़ी है और इसे बढ़ाने का तरीका है- जीडीपी बढ़ाना, आर्थिक सुधार करना और बाजार खोलना।
हमने रणनीति बदली है और समझौतों की तैयारी दिखाई है ट्रम्प का कार्यकाल हमारे धैर्य और फैसले लेने की क्षमता की परीक्षा होगा। ऐसे में भारत ने रणनीति बदली है, व्यापार समझौते किए हैं, आर्थिक सुधार किए हैं और रक्षा बजट बढ़ाया है। लंबे समय से रुकी खरीद भी शुरू हुई है। इसे ही ताकत बढ़ाना और समय जुटाना कहा जाता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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