एन. रघुरामन का कॉलम: हमें बच्चों को ‘फंक्शनल इलिटरेट’ बनने से रोकना चाहिए Politics & News

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इसी वर्ष 15 जनवरी को कॉग्निटिव न्यूरोसाइंटिस्ट व एजुकेटर डॉ. जेरेड कूनी होरवाथ ने अमेरिकी सीनेट की कॉमर्स, साइंस एंड ट्रांसपोर्टेशन कमेटी के सामने बताया कि बीती एक सदी से ज्यादा समय में जेन-जी पहली ऐसी पीढ़ी है, जिसकी कॉग्निटिव क्षमताओं में गिरावट दिखी है। खासकर अटेंशन, मेमोरी, लिटरेसी व आईक्यू में। उन्होंने चौंकाने वाली बात बताई कि आज के बच्चे संज्ञानात्मक तौर पर पिछली पीढ़ियों से कम सक्षम हैं। 19वीं सदी के अंत में ऐसा ट्रेंड नहीं देखा गया। वे इसका कारण शिक्षा में स्क्रीन्स की मौजूदगी को मानते हैं। उन्होंने कहा, आधुनिक इतिहास में पहली बार जेन-जी एग्जीक्यूटिव कार्यों समेत कई अहम कॉग्निटिव मापदंडों पर पुरानी पीढ़ियों से पीछे है। कक्षाओं में टेक्नोलॉजी व स्क्रीन्स को तेजी से, बिना सोचे-समझे शामिल करने से सीखने की परंपरागत प्रक्रिया बाधित हुई है। इसीलिए कॉग्निटिव ग्रोथ घटी है। तभी से उनका वीडियो वायरल है। मैं आग्रह करता हूं कि सभी पैरेंट्स को वो वीडियो देखना चाहिए। दो दिन पहले मैंने पढ़ा कि कैसे स्वीडन में स्टॉकहोम के बंधागेन स्कूल ने टेक्स्ट बुक्स के पन्ने प्रिंट करने शुरू किए और छात्रों ने किताब के तौर पर उनकी बाइंडिंग शुरू कर दी है। ये स्वीडन के उन स्कूलों में से एक है, जिसने किताबें छोड़कर 21वीं सदी में लैपटॉप्स अपना लिए थे। तब विचार था कि बच्चों को डिजिटल वर्ल्ड के लिए तैयार किया जाए। स्कूल को लगा था कि नए दौर की नई जरूरतें हैं और किताबें आवश्यक नहीं। 2012 में रीडिंग स्टैंडर्ड्स तेजी से गिरे। 15 वर्ष के बच्चों में रीडिंग, गणित और विज्ञान की समझ को मापने वाला स्वीडन का पीसा स्कोर्स सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। 2022 में स्वीडन में हर चार में से एक बच्चा सेकंडरी स्कूल छोड़ते वक्त ‘फंक्शनली इलिटरेट’ था। यानी रोजमर्रा की स्थितियों से निपटने में सक्षम नहीं था। तभी शिक्षकों और अधिकारियों को महसूस हुआ कि इसकी वजह स्क्रीन्स पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता थी। अब स्वीडिश अधिकारियों ने रास्ता बदला है और कक्षाओं में फिर किताबें पढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। उन्होंने दस साल के बच्चों के लिए राष्ट्रीय रीडिंग चैलेंज शुरू किया है। सबसे ज्यादा किताबें पढ़ने वाले स्कूल, कक्षाएं पुरस्कार जीतते हैं। टेक्स्ट बुक और टीचर्स गाइड खरीदने के लिए 62 मिलियन यूरो निवेश किए गए हैं। इनमें फिक्शन और नॉन फिक्शन, दोनों किताबें हैं। पुस्तकालयों में फिर से रौनक है। हाल ही, उनके मंत्रालय ने छोटे बच्चों के लिए डिजिटल उपकरणों पर रोक लगाने और बड़े बच्चों के लिए इनके सीमित उपयोग की घोषणा की है। अब हर पीरियड से पहले छात्र लाइब्रेरी से पसंद की किताब लेकर पांच मिनट पढ़ते हैं। टाइम टेबल में किताब पढ़ने के लिए रीडिंग ब्रेक दिए गए हैं। वे केवल राष्ट्रीय रीडिंग चैलेंज की तैयारी ही नहीं करते, बल्कि सभी स्कूल व इलाकों में खुद के स्तर पर ऐसे आयोजन हो रहे हैं। हर दूसरे हफ्ते स्कूल लाइब्रेरियन हर कक्षा में बच्चों से मिल कर किताबों के सुझाव देते हैं। लाइब्रेरियन सर्वाधिक वेतन वाले स्कॉलर्स में से एक हैं। आज छात्रों का लंच टाइम में किताबें लाना और उन पर दोस्ताें से चर्चा करना आम है। स्कूल पैरेंट्स को ‘रीडिंग ब्रेकफास्ट’ के लिए बुलाते हैं, जहां वे बच्चों के साथ बैठकर किताबें पढ़ते हैं। इस देश ने एक योजना बनाई है, जिसमें 2028 से सभी शिक्षकों का प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाएगा– ताकि वे बच्चों को तयशुदा तरीकों से पढ़ना सिखा सकें। आज वहां ज्यादातर छात्र टैबलेट से ज्यादा किताबें लेकर चलते हैं। यदि बच्चे कम्युनिकेट करने में भी संघर्ष करते रहें तो उन्हें हमारे समय से भी ज्यादा साल तक स्कूल भेजने का क्या फायदा? रीडिंग क्राइसिस- यानी किताबें न पढ़कर डिजिटल स्क्रीन पर अटके रहना, सरसरी त पढ़ना, यही बच्चों को ‘फंक्शनल इलिटरेट’ बना सकता है। हमें माता-पिता के रूप में तय करना है कि बच्चों को क्या बनाना चाहते हैं। फंडा यह है कि बच्चों से पहले हमें खुद पढ़ना शुरू करना होगा। उनके साथ किताबों और उनके विषय पर चर्चा करें। इससे उनमें किताब पढ़ने की आदत आएगी। इसी से वह कम्युनिकेशन में बेहतर होंगे। हमारे स्कूलों और माता-पिता, दोनों के लिए यह बड़ी सीख है।

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एन. रघुरामन का कॉलम: हमें बच्चों को ‘फंक्शनल इलिटरेट’ बनने से रोकना चाहिए