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- Arvind Subramanian Column: Oil Import Dependence Reduction Now Essential
2 घंटे पहले
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अरविंद सुब्रमण्यन भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार
2021 में भारत का रूस से तेल आयात उसके कुल तेल आयात का 2% था। 2024 में यह बढ़कर 30-36% तक पहुंच गया- मुख्यतः रूसी तेल पर भारी छूट के कारण। अब भारत पर रूस से तेल लेना बंद करने का दबाव बनाया जा रहा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमने रूसी तेल आयात पूरी तरह बंद कर दिया है। आंकड़े बताते हैं कि रूसी क्रूड का हिस्सा पहले की तुलना में कुछ ही कम हुआ है- दिसंबर 2025 में यह 31.5 % था, जो पिछले वर्ष के 36.5% से घटा है। वहीं अमेरिका से तेल आयात बढ़ रहा है।
सरकार ने साफ किया है कि ऊर्जा सुरक्षा और उपलब्धता उसकी प्राथमिकता है और यों भी उसकी नीति विविधता की दिशा में बढ़ने की है, किसी एक स्रोत पर निर्भर रहने की नहीं। विदेश सचिव का कहना है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों, मूल्य और बाजार-स्थितियों के आधार पर ही ऊर्जा स्रोतों का चयन करेगा। इसके संकेत भी मिल रहे हैं कि भारत ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण की दिशा में कदम उठा रहा है।
आर्थिक गतिशीलता और बढ़ती समृद्धि ने जहां भारत को ऊर्जा के मामले में और अधिक आयात-निर्भर बना दिया है, वहीं भारत के लिए यह और आवश्यक हो गया है कि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को अधिकतम करने के लिए इस निर्भरता को घटाए।
एक विकल्प यह हो सकता है कि हम अमेरिका की तरह हाइड्रोकार्बन उत्पादन और निवेश को बढ़ाएं। दूसरा, और संभवतः अधिक दूरदर्शी विकल्प है चीन की राह अपनाना और स्वयं को एक रिन्यूएबल एनर्जी आधारित इलेक्ट्रो-स्टेट में रूपांतरित करना।
ऊर्जा के सूर्य और पवन जैसे स्रोत अधिकांश देशों में उपलब्ध हैं और भारत में तो विशेष रूप से प्रचुर मात्रा में हैं। इन स्रोतों पर अधिक निर्भरता न केवल आयात-निर्भरता को घटाएगी, बल्कि व्यापक विद्युतीकरण को भी प्रोत्साहित करेगी- जो भविष्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है : डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन, ड्रोन, एआई और अन्य उभरती तकनीकें।
इसके अलावा, भारत के पास हाइड्रोकार्बन से रिन्यूएबल एनर्जी की ओर रणनीतिक रूपांतरण के दो और ठोस कारण हैं। पहला है- प्रदूषण। कोयला और तेल जलाने की घरेलू सामाजिक लागत विनाशकारी रही है, जैसा कि विश्व बैंक के एक हालिया अध्ययन से स्पष्ट होता है।
नई दिल्ली को अकसर एक गैस चैम्बर कहा जाता है- यह हमें याद दिलाता है कि हाइड्रोकार्बन पर निर्भरता बढ़ाने के क्या परिणाम हो सकते हैं। ऐसे में कोयले के उपयोग को और बढ़ाना विवेकपूर्ण नहीं है- विशेषकर तब, जब 40-60 अरब डॉलर के थर्मल पावर निवेश पहले ही फंसे हुए हैं या जोखिम में हैं। नए कोयला संयंत्र इस वित्तीय बोझ को और बढ़ाएंगे।
बेशक, रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ना एक नए प्रकार की निर्भरता का जोखिम भी पैदा करता है। तेल पर निर्भरता घटाने की कोशिश कहीं तकनीकी पर निर्भरता में न बदल जाए- क्योंकि सोलर मैन्युफैक्चरिंग का 80% से अधिक नियंत्रण चीन के पास है और बैटरी आपूर्ति शृंखलाओं पर भी उसका दबदबा है।
लेकिन यही हमें दूसरे, और कहीं अधिक निर्णायक कारण की ओर भी ले जाता है- सस्ती बिजली। यदि भारत को मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को पुनर्जीवित करने का अवसर साधना है, तो उसे सस्ती और विश्वसनीय बिजली की आवश्यकता होगी।
भारत के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को बिजली की ऊंची लागत ने गंभीर रूप से बाधित किया है। भारत में बिजली की लागत जितनी होनी चाहिए थी, उससे लगभग दोगुनी रही है- और प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में भी लगभग दो गुना अधिक है। इस महंगी बिजली के कारण ही भारतीय कारखाने वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ते रहे हैं।
हाल में हुए व्यापार समझौते भारत को चाइना प्लस वन अवसर का लाभ उठाने का मौका दे सकते हैं- यानी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा चीन से बाहर उत्पादन का विविधीकरण। लेकिन इसके लिए पहले घरेलू सुधारों की आवश्यकता होगी- विशेषकर बिजली क्षेत्र में संरचनात्मक सुधार, जो सस्ती, स्थिर और स्वच्छ ऊर्जा सुनिश्चित कर सकें। रणनीतिक स्वायत्तता, औद्योगिक पुनरुत्थान और पर्यावरणीय संतुलन- इन तीनों को साधने के लिए ऊर्जा नीति केंद्र में होनी चाहिए।
यदि हमें अपनी ऊर्जा निर्भरता पर काबू पाना है, तो हमें स्वयं को एक इलेक्ट्रो-स्टेट में रूपांतरित करने की प्रक्रिया को तेज करना होगा। केंद्र सरकार सही दिशा में कदम उठा रही है, लेकिन केवल नीतिगत घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट। इस लेख के सहलेखक एनर्जी इकोनॉमिस्ट नवनीरज शर्मा हैं।)
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अरविंद सुब्रमण्यन का कॉलम: तेल पर निर्भरता को कम करना अब जरूरी हो गया है


