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- Bangladesh Stability Benefits India | Lt Gen Syed Ata Hasnain Column
1 घंटे पहले
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर
बांग्लादेश चुनाव ने एक निर्णायक नतीजा दिया है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को मिला दो-तिहाई बहुमत महज चुनावी जीत नहीं, बल्कि साल भर की अस्थिरता, वैचारिक टकराव और संस्थागत अनिश्चितता के बाद राजनीतिक स्थिरता का संकेत है।
यह चुनाव एक सामान्य संसदीय प्रक्रिया से ज्यादा इस बात पर राष्ट्रीय निर्णय जैसा है कि शेख हसीना की रवानगी और उथल–पुथल के बाद देश अब कैसे आगे बढ़ना चाहता है। एक सकारात्मक संकेत तत्काल दिखता है।
जमात-ए-इस्लामी का कमजोर प्रदर्शन बताता है कि मतदाता कट्टरपंथी शासन को लेकर सतर्क हैं। भले समाज के कुछ हिस्सों में इस्लामवादी बयानबाजी का प्रभाव हो, लेकिन वोटरों ने कट्टरपंथी ताकतों को सत्ता सौंपने से गुरेज किया है। यह घटना स्थिरता देने वाली है।
फिर भी ऐसा मान लेना जल्दबाजी होगी कि जमात का असर खत्म हो गया। उसका नेटवर्क, सामाजिक प्रभाव, और लोगों को सड़कों पर जुटाने की क्षमता कायम है। उसकी सियासी ताकत घट सकती है, लेकिन वैचारिक प्रभाव बना रहेगा।
इसी सच्चाई से निपटना बीएनपी की पहली बड़ी परीक्षा होगी। बीएनपी को स्पष्ट बहुमत भारत के लिए स्वागत योग्य है। इससे गठबंधन की कमजोरियां घटेंगी और नीतिगत जड़ता का जोखिम कम होगा। यह बहुमत तारिक रहमान और उनकी टीम को वैधानिकता के साथ ही जिम्मेदारी भी देता है।
अस्थिरता का बहाना अब नहीं चल पाएगा। शासन, आर्थिक पुनरुद्धार और संस्थागत सुधारों को प्राथमिकता देनी होगी। बांग्लादेशी युवाओं ने गरिमा, जवाबदेही और अवसरों की मांग की थी। बीएनपी सरकार की विश्वसनीयता अब इस पर निर्भर करेगी कि वह कैसे प्रशासनिक दक्षता बहाल करती है, निवेशकों का भरोसा लौटाती है और अल्पसंख्यकों को कैसे आश्वस्त करती है।
आवामी लीग को भी अनिश्चितकाल के लिए अनदेखा नहीं कर सकते। किसी बड़े राजनीतिक दल को स्थायी रूप से बाहर कर देना संरचनात्मक असंतुलन पैदा करता है। भले तत्काल प्रतिबंध हटाना संभव न हो, लेकिन राजनीतिक हालात सामान्य करने की राह खुली रहनी चाहिए।
बांग्लादेश में स्थायी स्थिरता के लिए टकराव के बजाय समावेशन जरूरी है। शेख हसीना का भारत में रहना एक फैक्टर बना रहेगा, लेकिन सिर्फ यही द्विपक्षीय रिश्तों की धुरी नहीं होनी चाहिए। दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक और आर्थिक एजेंडे पर निजी या कानूनी मसले भारी नहीं पड़ने चाहिए।
न तो बांग्लादेश का भविष्य किसी एक व्यक्ति के भाग्य से परिभाषित होना चाहिए, न ही भारत–बांग्लादेश संबंध उसी एक मुद्दे तक सीमित होने चाहिए। बांग्लादेश के सामने एक बड़ी चुनौती वैचारिक कट्टरता के आकर्षण से बचना भी है। कट्टरपंथ थोड़े समय के लिए जनसमर्थन तो जुटा सकता है, लेकिन टिकाऊ शासन या आर्थिक मजबूती शायद ही दे पाए।
बांग्लादेश में सेना की भूमिका भी उल्लेखनीय रही है। हाल की अस्थिरता में वह काफी हद तक पेशेवर और संस्थागत बनी रही। जब तक राजनीतिक संक्रमण मजबूती ले, उसका ऐसे ही स्थिर रहना जरूरी होगा।
भारत के लिए यह समय संतुलित जुड़ाव रखने का है। बीते वर्ष भारत का संयम उल्लेखनीय रहा। वह तनाव बढ़ाने वाली बयानबाजी से दूर रहा। यही दृष्टिकोण जारी रहना चाहिए। न सार्वजनिक दिखावा, न टिप्पणी, न संवेदनशील मुद्दों को अनावश्यक फिर से खोलना। संयमित सुरों में कूटनीति बेहतर कारगर होती है।
रिश्तों को री–सेट करने के लिए अब सांकेतिक पहल उपयोगी हो सकती है। मंत्री स्तर की पहल हो या सही भावना से दिया कोई निमंत्रण, ऐसा कोई भी उच्च स्तरीय जुड़ाव सद्भाव का संकेत दे सकता है। पिछले दिनों ही शोक के क्षणों में सम्मानजनक कूटनीतिक जुड़ाव ने बताया कि कैसे प्रतीकात्मक कदम सिद्धांतों को बदले बिना भी भरोसा बढ़ा सकते हैं।
आर्थिक तौर पर पारस्परिक निर्भरता ही स्थिरता का सबसे मजबूत फैक्टर है। कनेक्टिविटी,ऊर्जा व्यापार, सप्लाई चेन और ‘पीपल टू पीपल’ रिश्ते राजनीति से ऊपर उठ कर दोनों देशों को आपस में जोड़ते हैं। एक स्थिर पूर्वी पड़ोसी से भारत की उन्नति को भी लाभ होगा। यही पारस्परिकता नीति का मार्गदर्शक सिद्धांत होनी चाहिए।
एक स्थिर बांग्लादेश बाहरी हस्तक्षेप की गुंजाइश घटाता है, जबकि अस्थिर बांग्लादेश इसे बढ़ाता है। म्यांमार को लेकर अनिश्चितता और बंगाल की खाड़ी में बढ़ती क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के बीच बांग्लादेश में रणनीतिक सामंजस्य बने रहना न केवल राष्ट्रीय, बल्कि क्षेत्रीय हितों को भी साधता है।
शेख हसीना का भारत में रहना एक फैक्टर बना रहेगा, लेकिन सिर्फ यही द्विपक्षीय रिश्तों की धुरी नहीं होनी चाहिए। दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक और आर्थिक एजेंडे पर निजी या कानूनी मसले भारी नहीं पड़ने चाहिए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम: स्थिर बांग्लादेश भारत की उन्नति के लिए भी लाभदायक


