राजदीप सरदेसाई का कॉलम: असम की राजनीति में क्या चल रहा है? Politics & News

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3 घंटे पहले

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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार

सोशल मीडिया के पहले ही नैतिक रूप से चिंतनीय मानकों के बावजूद असम भाजपा ने जो वीडियो शेयर किया था, वह तो पतन की एक नई सीमा को छूने वाला था। इस विवादास्पद वीडियो (जिसे अब हटा दिया गया है) में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को ‘पॉइंट ब्लैंक’ रेंज से एयर राइफल चलाते दिखाया गया था।

उनके निशाने पर दो व्यक्ति थे- एक टोपीधारी, एक दाढ़ीधारी। वीडियो में दावा किया गया था कि यह बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ और असमिया अस्मिता की रक्षा के पक्ष में है। लेकिन वीडियो से प्रकट होने वाली हिंसक, साम्प्रदायिक छवि खुले तौर पर द्वेषपूर्ण थी। किसी राज्य का मुख्यमंत्री- एक संवैधानिक रूप से निर्वाचित नेता- किसी समुदाय की तरफ इस तरह खुलकर बंदूक ताने- यह संवैधानिक दायित्वों के उल्लंघन का अत्यंत गंभीर उदाहरण है।

अलबत्ता बाद में सरमा ने दावा किया कि उन्हें ऐसे किसी वीडियो की जानकारी नहीं है। लेकिन इस तरह की सफाई अब कोई मायने नहीं रखती, क्योंकि उस वीडियो को असम भाजपा के आधिकारिक एक्स हैंडल से साझा किया गया था। हटाए जाने से पहले इसे दस लाख से अधिक बार देखा जा चुका था। और यह अपने तरह की इकलौती घटना भी नहीं थी।

कई महीनों से सरमा ‘मियां’ शब्द का उपयोग करते हुए एक टॉक्सिक प्रचार-अभियान चला रहे हैं। यह असम में बंगाली-भाषी मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला अपमानजनक संबोधन है। सरमा ने ‘मियांओं’ के आर्थिक बहिष्कार तक की अपील की है- चाहे वे दुकानदार हों, सब्जी विक्रेता हों या ऑटो-रिक्शा चालक। अपने रुख पर खेद जताने के बजाय, सरमा ने उलटे अपने बयानों को असम की सांस्कृतिक-सभ्यतागत पहचान की रक्षा के लिए ‘आवश्यक’ बताया है।

जाहिर है कि सरमा को अपने इस तरह के बयानों में चुनावी लाभ की संभावना दिखती है। आज जब सरमा और उनके परिवार पर बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे हैं, तब साम्प्रदायिक बयानबाजी जरूरी मसलों से ध्यान भटकाने के साथ ही समाज को ध्रुवीकृत करने का भी उपकरण बन जाती है।

‘बाहरी’ लोगों के प्रति गुस्सा दशकों से असम के जटिल जातीय परिदृश्य का हिस्सा रहा है। इस कारण से राज्य में मुसलमानों की आबादी लगभग 38 प्रतिशत होने के अनुमान के बावजूद, डेमोग्राफी में बदलाव और सांस्कृतिक क्षरण को लेकर आशंकाओं को भड़काना आसान हो जाता है।

यही कारण है कि जो बात असम के बाहर प्रथम दृष्टया हेट-स्पीच मानी जाएगी, उसे राज्य के भीतर स्थानीय आबादी के ऐतिहासिक, भाषाई, सांस्कृतिक और आर्थिक अधिकारों की रक्षा के रूप में पेश किया जा रहा है।

भाजपा नेतृत्व भी इस आपत्तिजनक वीडियो पर चुप्पी साधे हुए है। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ के नारे के बावजूद असम के चुनावों को देखते हुए वहां साम्प्रदायिक माहौल को गर्म बनाए रखने में राजनीतिक लाभ देखा जाता है। भाजपा के नेतागण भी ‘घुसपैठियों’ के कथित खतरे का उल्लेख करना नहीं भूलते। जबकि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की निगरानी केंद्रीय बलों की जिम्मेदारी होती है।

अधिक चिंता की बात यह है कि आज स्वयं को ‘सेकुलर’ कहने वाला वर्ग भी बहुसंख्यकवादी राजनीति के विजयरथ के सामने लगभग निरुत्तर और निरुपाय दिखाई देता है। कुछ नागरिकों ने जरूर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर उपरोक्त वीडियो के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है, लेकिन व्यापक राजनीतिक वर्ग ने सरमा की साम्प्रदायिकता का सीधा सामना करने को लेकर हिचकिचाहट दिखाई है। उन्हें अंदेशा है कि इससे हिंदू मतदाता उनसे और दूर हो सकते हैं।

एक समय था जब कांग्रेस जैसी पार्टियों पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाया जाता था; लेकिन आज बहुसंख्यक हिंदू वोटों के लिए होड़ लगी है। यदि असदुद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद में सरमा के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है, तो इसका कारण यह है कि वे हिंदू वोटों पर निर्भर नहीं हैं।

और शायद यही कारण है कि सरमा इतनी बेबाकी से हेट-स्पीच कर पाते हैं। लंबे समय तक कांग्रेस में रहे एक नेता का भाजपा का पोस्टर-बॉय बन जाना भी समकालीन राजनीति में अवसरवादी पालाबदल की नायाब मिसाल है।

असम के मुख्यमंत्री ने 2015 में चर्चित रूप से दावा किया था कि उन्होंने कांग्रेस इसलिए छोड़ी क्योंकि राहुल गांधी ने एक निजी बैठक में उनका ‘अपमान’ किया था। यह कि राहुल ने असम के मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय अपने पालतू कुत्ते को बिस्कुट खिलाना अधिक महत्वपूर्ण समझा था।

जबकि सच्चाई यह है कि जब कांग्रेस में उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को महत्व नहीं मिला तो भाजपा उनके लिए एक सुरक्षित और अनुकूल विकल्प बन गई। तब, यह तथ्य भी भुला दिया गया कि भाजपा ने ही कभी सरमा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। पर उनके पाला बदलते ही उनके खिलाफ सभी मामले या तो वापस ले लिए गए हैं या उनकी चाल सुस्त कर दी गई है।

57 वर्षीय सरमा आज भाजपा की नई पीढ़ी की अग्रिम पंक्ति में खड़े नेता हैं। यह वो पीढ़ी है, जो राजनीतिक शुचिता, नैतिक संयम या संवैधानिक मूल्यों की उन सीमाओं से बंधी नहीं दिखती, जिनसे अटल-आडवाणी युग के भाजपा नेता किसी हद तक बंधे थे। यह पीढ़ी सबसे बढ़कर राजनीतिक सत्ता हासिल करने की तीव्र आकांक्षा से संचालित होती है।

यही कारण है कि उत्तर-पूर्व में पार्टी के प्रमुख चेहरे, कुशल चुनाव प्रबंधक और संकटमोचक के रूप में सरमा को आज एक अमूल्य ‘एसेट’ माना जाता है। लेकिन राजनीति से इससे बेहतर की अपेक्षा रखने वाले नागरिक सरमा के रवैये से जरूर विचलित होंगे।

पुनश्च : जब हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस छोड़ने की घोषणा की थी तो एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने कथित रूप से पार्टी नेतृत्व को आगाह किया था कि ‘वे भविष्य के नेता हैं, हम उनके जैसे नेता को मिस करेंगे।’ आज एक दशक बाद वह ‘भविष्य का चेहरा’ क्या उन्हें किसी स्याह वर्तमान का हिस्सा लगता होगा?

आज बहुसंख्यक हिंदू वोटों के लिए लगी हुई है होड़… एक समय था जब कांग्रेस जैसी पार्टियों पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाया जाता था; लेकिन आज भारतीय राजनीति में बहुसंख्यक हिंदू वोटों के लिए होड़ लगी है। शायद यही कारण है कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इतनी बेबाकी से विवादित बयान दे पाते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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