एन. रघुरामन का कॉलम: हमें रॉ डेटा को मथ कर बिजनेस के लिए स्वर्णिम मौके बनाने होंगे Politics & News

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मंगलवार को मैं मुंबई के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की पवई शाखा में खड़ा था। ऑपरेशन मैनेजर के सामने कतार में दूसरे नंबर पर खड़े हुए मैंने एक लॉजिस्टिक नाकामी देखी। मेरे आगे खड़ा व्यक्ति तीस मिनट इंतजार करके थक चुका था। वह अजीब-सी परेशानी में था। पांच दिन पहले उसने ब्रांच की ऑटोमेटेड मशीन में चेक जमा कराया था। सबूत के तौर पर उसके पास फोटोग्राफिक रसीद भी थी। फिर भी, बैंक वो फिजिकल डॉक्यूमेंट नहीं ढूंढ पा रहा था। क्या उसे मशीन निगल गई? कोई नहीं जानता। खुद मेरा धैर्य भी टूटने लगा था कि ब्रांच मैनेजर ने आकर मेरी मदद की। प्रशासनिक गैर-जिम्मेदारी के बीच फंसा वो बेचैन व्यक्ति वहीं रहा और मैं बाहर आ गया। मेरा अगला ठिकाना एक प्रमुख अस्पताल था, जहां मुझे एक पखवाड़े से भर्ती रिश्तेदार को डिस्चार्ज कराना था। भीड़भाड़ वाली इस जगह में एक बेड के लिए भी अकसर ऊंची सिफारिश लगवानी पड़ती है। यहां भी मैंने एक चौंकाने वाला पैटर्न देखा। कोई भी मरीज ऐसा नहीं था, जिसके पास कागज न हों। सभी के हाथ में एक जैसे रंग के फोल्डर थे, जिनमें हाथ से लिखे अपॉइंटमेंट और प्रिंटेड लैब रिजल्ट भरे थे। चूंकि प्रोवाइडर अकसर डिजिटल फाइलों का ट्रैक खो बैठते हैं तो अनावश्यक बार-बार जांचें कराई जाती हैं। यह ऐसा ही है, जैसे वे उस शातिर चिकनगुनिया वायरस को खोज रहे हों, जो शुरुआती जांच में पकड़ नहीं आता। एआई के दौर में जीने के बावजूद हमारा हेल्थकेयर सिस्टम 19वीं सदी में ही अटका है। ये अजीब-सा डिजिटल-एनालॉग हाइब्रिड है, जहां गलियारों में आज भी फैक्स मशीनें चलती हैं और डॉक्टर वॉट्सएप पर संवेदनशील मेडिकल डेटा साझा करते हैं। अस्पताल के हर फ्लोर पर सैकड़ों कंप्यूटर हैं, प्रत्येक में सूचनाओं का पूरा समुद्र है। हर जगह डेटा है, फिर भी डॉक्टर और मरीज कागज से चिपके हैं। मुझे नाविकों की एक पुरानी पंक्ति याद आती है- ‘वॉटर-वॉटर एवरीवेयर, नॉट एनी ड्रॉप टु ड्रिंक’। इस आधुनिक युग में हम भी रॉ डेटा में डूबे पड़े हैं, लेकिन इस्तेमाल योग्य, व्यवस्थित जानकारी के प्यासे ही हैं। बुनियादी तौर पर यह समस्या टेक्नोलॉजी की नहीं, बल्कि कल्चर की नाकामी है। व्यवस्था की यह अपंगता मुम्बई या भारत तक सीमित नहीं, विकसित देश भी इससे जूझ रहे हैं। शुरुआती तकनीकी बाधा है- इंटरऑपरेबिलिटी, यानी अलग-अलग सिस्टम्स की एक-दूसरे से बातचीत करने की क्षमता। क्या इसका समाधान है? बिलकुल है, अगर सच में समाधान की इच्छा हो। बड़े डेटा सेट को खंगालकर विश्लेषण की क्षमता पर आधारित एआई जैसे-जैसे मुख्यधारा में आ रहा है तो हम पाषाण युग जैसे दौर में अटके नहीं रह सकते। डेटा के लिए स्पष्ट और यूनिवर्सल स्टैंडर्ड बनाना जरूरी है और यह सिर्फ बैंक या क्लिनिक में ग्राहक अनुभव सुधारने के लिए ही नहीं, बल्कि रिसर्च, इनोवेशन और अलग-अलग इंडस्ट्री में एआई के विस्तार की बुनियादी शर्त है। महज लागत में कमी लाने से बढ़कर यह यूजर्स सेफ्टी और राष्ट्रीय डेटा की संप्रभुता का मुद्दा है। हमारे जैसे बड़े देश में स्वास्थ्य डेटा एक कीमती संसाधन है, जिसे संभालना और प्रभावी तरीके से इस्तेमाल करना होगा। फिलहाल, ज्यादातर हेल्थकेयर कर्मचारी किसी न किसी रूप में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड रखते हैं, लेकिन छोटा-सा हिस्सा ही मरीज को दिया जाता है। पंद्रह दिन बाद अस्पताल से जाते व्यक्ति के पास पूरी ट्रीटमेंट हिस्ट्री नहीं, सिर्फ डिस्चार्ज समरी होती है। नतीजतन, ​​नए अस्पताल या शहर में नए डॉक्टर को फिर से नई जांचें करानी पड़ती हैं। महज खर्चा ही नहीं, उस मरीज का दर्द भी समझिए, जिसे ​फिर से शरीर में सुइयां लगवानी पड़ेंगी। फंडा यह है कि डेटा हर मॉडर्न बिजनेस की क्रीम है। हालांकि समाज के तौर पर हम उस क्रीम को मथ कर बटर और सेहतमंद, स्वादिष्ट घी बनाने में नाकाम रहे हैं- जो उपभोक्ता और बिजनेस दोनों के लिए फायदेमंद है। आगे बढ़ने के लिए हमें यह दूरी पाटनी होगी।

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एन. रघुरामन का कॉलम: हमें रॉ डेटा को मथ कर बिजनेस के लिए स्वर्णिम मौके बनाने होंगे