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“कब प्रेग्नेंट होओगी तुम? एज का तो ध्यान है ना? करियर तो तुम्हारा ठीक ही चल रहा है, फिर फैमिली कब बनाओगी? इतनी पतली हो, बच्चा कैसे होगा?’ समाज को प्रेग्नेंसी पसंद है। या बेहतर हो अगर कहें, समाज को प्रेग्नेंसी से बढ़कर उसका आइडिया पसंद है- उसका अमूर्त स्वरूप, उसकी घोषणा, हार्ट इमोजी के साथ वॉट्सएप ग्रुप में भेजी जाने वाली अल्ट्रासाउंड की फोटो। जैसे ही किसी स्त्री का विवाह होता है, उस पर दबाव बनाया जाने लगता है- गुड न्यूज कब दे रही हो? डॉक्टर उसे इशारों में बार-बार याद दिलाते हैं, इर्द-गिर्द मंडराते रिश्तेदार पूछताछ करने लगते हैं। पूरा समाज तय डेडलाइन वाले किसी पब्लिक-प्रोजेक्ट की तरह उसे बताता रहता है कि जल्दी से प्रेग्नेंट हो जाओ। और इसके बावजूद, जैसे ही प्रेग्नेंसी दिखने लगती है- असली, शारीरिक तौर पर फैलती हुई- तो हम असहज हो जाते हैं। दिल्ली में सोनम कपूर की प्रेग्नेंसी ड्रेसिंग को लेकर हुए विवाद से यह फिर सामने आया। सामने एक गर्भवती स्त्री थी, जो अपने आराम, आत्मविश्वास या शायद खुशी के लिए कपड़े पहने हुए थी। और अचानक से समाज के सुर बदल गए- शालीन रहो, इसे ढककर रखो, एक होने वाली मां को ऐसा नहीं दिखना चाहिए…। महिलाओं को ऐसे ही विरोधाभास में फंसाया गया है। उनसे मां बनने की उम्मीद तो की जाती है, लेकिन जैसे ही वे मां बनीं, समाज उनसे अपनी हस्ती को ही मिटाने की मांग करने लग जाता है। हम मातृत्व को आदर्श मनाते हैं, लेकिन असल मातृत्व आकार लेने लगे तो हम उस पर लोक-लाज के पहरे बैठा देते हैं। हमें कोख चाहिए, स्त्री नहीं। त्याग चाहिए, व्यक्ति नहीं। बच्चा चाहिए, लेकिन उस शरीर की हमें परवाह नहीं है- जिसने दर्द, फैलाव और बदलावों को झेलकर उसे जन्म दिया। गर्भवती देह अपने स्वरूप को लेकर शर्मिंदगी महसूस नहीं करे तो यह बात हमें बेचैन करती है। वह फैलती है, नजरों में आती है और अपने लिए आराम, खाना और ध्यान मांगती है। वह शांत नहीं रहती। इसीलिए समाज उसे अनुशासित करने दौड़ पड़ता है- कभी सलाह या निर्णय के नाम पर तो कभी नैतिकता का बोझ डालकर। कोई गर्भवती महिला अपनी खुशी के लिए कपड़े पहने तो यह हमें याद दिलाता है कि मातृत्व का अर्थ अपनी इच्छाओं, आत्मसम्मान या पहचान को खत्म कर देना नहीं होता। गर्भवती महिला पूरी तरह एक जीवित मनुष्य है, दमकती हुई, किंतु थोड़ी-सी जटिल। लेकिन समाज नहीं जानता कि बिना किसी घबराहट इसे कैसे स्वीकारा जाए। हमें मातृत्व का एक साफ-सुथरा, आदर्श रूप पसंद है- पवित्र, काम-भावना से रहित और हमेशा दानी बना रहने वाला। लेकिन जैसे ही कोई महिला खुद को देखकर कहती है कि मुझे अब भी अपने जैसा ही दिखना है तो खतरे की घंटी बज उठती है। यह कि- तुम इसे एंजॉय कैसे कर सकती हो? तुम अब भी पहले जैसी दिखने के बारे में कैसे सोच सकती हो? गर्भावस्था महिलाओं को छोटा नहीं बनाती, बल्कि वह उन्हें और अधिक दृश्यमान बना देती है। यही विजिबिलिटी उनके लिए खतरा है। हम उन्हें शर्मिंदा करते हैं, उन पर टिप्पणी करते हैं, उन्हें निर्देश देते हैं और इस उम्मीद में उन पर नियंत्रण की कोशिश करते हैं कि वे फिर से स्वीकार्य अदृश्यता में चली जाएं। अगर हम सच में ही होने वाली मांओं का सम्मान करते, तो हम उन्हें नजर आने देते। उन्हें आराम, खुशी और आत्मविश्वास के लिए अपनी पसंद के कपड़े पहनने देते। उन्हें खूबसूरत महसूस करने देते। गर्भावस्था शर्मिंदगी की चीज नहीं है। यदि समाज इतनी शिद्दत से बच्चे चाहता है तो उसे यह भी सीखना होगा कि उन्हें जन्म देने वाली महिलाओं को कैसे देखा जाए- बिना उनसे नजरें फेरे। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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मेघना पंत का कॉलम: जन्म देने वाली महिलाओं को कैसे देखें-बिना उनसे नजरें फेरे?

