आना पलासियो का कॉलम: लेन-देन की कूटनीति से आगे नहीं सोच पाते हैं ट्रम्प Politics & News

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3 घंटे पहले

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आना पलासियो स्पेन की पूर्व विदेश मंत्री और वर्ल्ड बैंक ग्रुप की पूर्व सीनियर वीपी

दुनिया में रूस की भूमिका को अमेरिका किस तरह देखता है और दो देशों के रिश्तों की रूपरेखा कैसी हो सकती है- इस पर वॉशिंगटन की सोच अब स्पष्ट होने लगी है। ट्रम्प की अधिकांश विदेश नीतियों की तरह यह दृष्टि भी मुख्यतः व्यावसायिक हिसाब-किताब से परिभाषित दिखती है।

पाकिस्तान से लेकर खाड़ी देशों तक व्यापारिक सौदे करने की चाह में मानवाधिकारों या कानून के शासन जैसे मुद्दों को दरकिनार करने की ट्रम्प की तत्परता भले ही कसावट भरी भू-राजनीति लगे, लेकिन उनके लेन-देन आधारित नजरिये को यथार्थवाद समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।

इसका कारण यह है कि जहां यथार्थवादी विदेश नीति अपनी सीमाओं, शक्ति-संतुलन और दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखती है, वहीं लेन-देन की राजनीति अंतरराष्ट्रीय संबंधों को संकीर्ण सौदेबाजी के दायरे में घसीट लाती है।

जहां यथार्थवादी नीति मानदंडों, गठबंधनों और संस्थानों का अधिकतम उपयोग करती है, वहीं लेन-देनवाद उनसे बचने, उन्हें कमजोर या नष्ट करने की ओर बढ़ता है। आज जब विश्व-व्यवस्था बिखरती हुई नजर आ रही है, तब यथार्थवादी अवधारणा आदर्शवादी लग सकती है और लेन-देन आधारित दृष्टि व्यावहारिक। लेकिन आने वाले समय में इसके अच्छे परिणाम मिलने की संभावना कम है।

रूस को लेकर अमेरिका की जो रणनीति उभरकर सामने आ रही है, उसके मामले में तो यह आकलन लगभग निश्चित रूप से सही बैठता है। ट्रम्प प्रशासन यूक्रेन में जारी युद्ध की समाप्ति को क्रेमलिन के साथ आर्थिक और भू-राजनीतिक संबंधों को नए सिरे से गढ़ने के अवसर के रूप में देखता है।

अमेरिका चाहता है कि युद्ध समाप्त होने के बाद प्रतिबंधों, तकनीकी पाबंदियों और बाजार-अवरोधों को धीरे-धीरे हटाया जाएगा, जिससे अमेरिका अपनी इच्छानुसार परिणामों को प्रभावित करता रहे। लेकिन समस्या यह है कि अमेरिका इन बदलावों को मनमाने ढंग से लागू करना चाहता है और विभिन्न पक्षों को अलग-अलग समझौतों पर बातचीत के लिए मजबूर करता है। अमेरिका का यह ‘पे-टु-प्ले’ दृष्टिकोण आर्थिक कूटनीति नहीं कहला सकता। इसके कारगर होने की संभावना भी कम है।

ट्रम्प के लिए अपने व्यावसायिक हित ही सबसे ज्यादा मायने रखते हैं। किन्तु भूलवश वे यह मान लेते हैं कि पुतिन जैसे नेताओं की भी यही सोच होगी। अपनी इसी धारणा के आधार पर ट्रम्प यह मान बैठते हैं कि राजनीतिक समझौते तब अधिक टिकाऊ होते हैं, जब उन्हें व्यावसायिक अनुबंधों में पिरोया जा सके।

ट्रम्प की इसी सोच के चलते उनका प्रशासन भी यह धारणा बना लेता है कि अमेरिका-रूस संबंधों के जरा भी सामान्य होने से रूस और चीन के रिश्ते स्वत: ही कमजोर हो जाएंगे। ट्रम्प की इस तथाकथित रिवर्स-निक्सन रणनीति के चलते यह मायने नहीं रखता कि मुख्य मुद्दा वैचारिक री-अलाइनमेंट का नहीं है; रूस को किसी न किसी रूप में पश्चिम से जुड़े बुनियादी ढांचों में वापस खींच लाना ही चीन के साथ उसके गठजोड़ को कमजोर करने के लिए पर्याप्त होगा।

यूक्रेन के साथ लगभग चार वर्षों से जारी युद्ध, कड़े प्रतिबंधों और संपत्तियों के पुनर्वितरण ने रूस की उस हुकूमत को और अधिक सुदृढ़ कर दिया है, जो पहले से ही अत्यधिक व्यक्ति-केंद्रित थी। सरकार का ऐसा पर्सनलाइजेशन समझौते की आंतरिक राजनीतिक कीमत को बढ़ाता है और टिकाऊ सौदेबाजी की गुंजाइश को सीमित कर देता है।

लेकिन ट्रम्प इस बात को समझ नहीं पाते कि जो बात बैलेंस शीट पर आकर्षक दिखती है, वह क्रेमलिन में राजनीतिक रूप से अस्वीकार्य हो सकती है- खासकर तब, जब उसे उस आबादी का सामना करना हो, जिसने यूक्रेन युद्ध में लगभग दस लाख हताहतों को झेला है!

जहां ट्रम्प त्वरित जीत घोषित करने के बहाने तलाशते दिखते हैं, वहीं चीन लंबी दूरी का खेल खेल रहा है। इससे अमेरिका के नेतृत्व वाली विश्व-व्यवस्था के विघटन से लाभ उठाने की स्थिति में चीन स्वयं को मजबूत स्थिति में पाएगा। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

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