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इस हफ्ते के अंत या अगले हफ्ते की शुरुआत तक बांग्लादेश में एक चुनी हुई सरकार सत्ता संभाल सकती है। अवामी लीग को चुनाव में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं दी गई है, इसलिए विश्वसनीयता पर सवाल बने रहेंगे। फिर भी लोकतंत्र के पैमाने पर इसे कुछ हद तक निष्पक्ष चुनाव कहा जा सकता है, क्योंकि पाकिस्तान की तरह बांग्लादेश की सेना चुनावी मैदान में नहीं उतरी है और न ही उसने किसी उम्मीदवार का समर्थन किया है। यूपीए-2 के दौरान भारत और बांग्लादेश ने सीमा से जुड़ी समस्याओं, खासकर सीमा के दोनों ओर बनी बस्तियों के मुद्दे को सुलझाने के लिए समझौता किया था। तब भाजपा में किसी ने इस समझौते का खुलकर विरोध नहीं किया था। तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने तो इसका समर्थन भी किया था। फिर भी पार्टी ने संसद में इसमें अड़चन डाली थी। यह तब पार्टी के अंदर चल रहे सत्ता संघर्ष का नतीजा था। तब बांग्लादेश के उच्चायुक्त ने अहमदाबाद जाकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करते हुए उनका समर्थन भी मांगा था। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के करीब एक साल बाद, 6 जून 2015 को भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौते को मंजूरी दी गई। इसके साथ ही दोनों देशों ने समुद्री सीमा को भी तय और स्वीकार किया। इसके लिए ममता बनर्जी से बातचीत करके उन्हें राजी करना पड़ा। असम और त्रिपुरा की भावनाओं को भी शांत करना पड़ा। इस तरह बांग्लादेश एकमात्र ऐसा बड़ा पड़ोसी देश बन गया, जिसके साथ भारत ने सभी सीमा विवाद सुलझा लिए। श्रीलंका के मामले में कच्चातिवु को लेकर विवाद औपचारिक रूप से सुलझ चुका है, लेकिन भाजपा चुनाव प्रचार में इसे अब भी उठाती रहती है। बांग्लादेश के साथ सीमा समझौता मोदी सरकार के 12 वर्षों के कार्यकाल की सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धियों में गिना जाता है। यह इसलिए भी अहम है क्योंकि यह समझौता उस समय हुआ, जब पड़ोसी देशों से रिश्ते तनावपूर्ण थे। कई मायनों में इसे मोदी की बड़ी सफलताओं में से एक माना जा सकता है। यह इस बात का भी सबूत है कि वे बड़ी तस्वीर देखने में कितने व्यावहारिक हो सकते हैं। इसके बावजूद, खासकर पूर्वी राज्यों में भाजपा की राजनीति लंबे समय से अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के मुद्दे पर केंद्रित रही है। यह मुद्दा पश्चिम बंगाल के दो विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों में काफी गरम रहा, लेकिन फिर भी मोदी इस समझौते पर डटे रहे। आज हम इतिहास के उसी तरह के एक मोड़ पर खड़े हैं। फर्क बस इतना है कि 2014 की तुलना में आज रणनीतिक असर और संभावनाएं कहीं ज्यादा बड़ी हैं। बांग्लादेश में चुनाव पश्चिम बंगाल और असम के चुनावों से कुछ महीने पहले हो रहे हैं। यह एक तरह से अच्छा मौका है, क्योंकि अभी ‘घुसपैठिया’ वाला नारा बहुत तेज नहीं हुआ है। हालांकि, प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में अपने भाषण में इसका जिक्र जरूर किया है। लेकिन सोशल मीडिया और कई टीवी चैनलों पर बांग्लादेश के खिलाफ काफी नकारात्मक बातें कही जा रही हैं। चूंकि बांग्लादेश के चुनाव पश्चिम बंगाल और असम के चुनावों के बाद नहीं हो रहे हैं, इसलिए सरकार के पास हालात को सामान्य बनाने और संतुलन की ओर लौटने का मौका है। हालांकि, शेख हसीना के दौर जैसा रिश्ता फिर से बन पाना अब संभव नहीं दिखता। यह समय ढाका में भारत की पसंद के नेता को नकारने या मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार द्वारा विदेश नीति में किए बड़े बदलावों को लेकर नाराजगी दिखाने का नहीं है। यूनुस पिछले डेढ़ साल से पाकिस्तान को खुश करने की कोशिश करते रहे हैं और इसके लिए उनके द्वारा कई उकसाऊ कदम उठाए गए हैं। उदाहरण के तौर पर, भारत को चिढ़ाने के लिए पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों को बुलाया गया। उनकी सरकार ने बड़े हथियार खरीदने की बात की और भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को लेकर भी भड़काऊ बयान दिए गए। उन्होंने शेख हसीना को भारत में शरण दिए जाने को समझौता तोड़ने वाला कदम बताया। लेकिन बांग्लादेश के नजरिए से यह दूरदर्शिता की कमी दिखाता है और भारत को उकसाने वाला है। अच्छी बात यह है कि यूनुस को एक हफ्ते के भीतर चुनी हुई सरकार को सत्ता सौंपनी होगी। खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए विदेश मंत्री एस. जयशंकर को भेजकर हमने एक व्यावहारिक कदम उठाया। उन्होंने उनके बेटे और बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) के अध्यक्ष तारिक रहमान से भी मुलाकात की। अब तक रहमान एक समझदार नेता के रूप में सामने आए हैं। सच्चाई यह है कि कोई नहीं जानता चुनाव कौन जीतेगा या किसी को साफ बहुमत मिलेगा या नहीं। अब तक के जनमत सर्वेक्षणों में तारिक रहमान और बीएनपी को बढ़त दिखाई गई है। प्रतिष्ठित अखबार ‘प्रोथोम आलो’ के सर्वे के मुताबिक 83 प्रतिशत बांग्लादेशी बेरोजगारी को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं, 77 प्रतिशत का कहना है कि कारोबार के लिए माहौल ठीक नहीं है और 35 प्रतिशत लोग देश की आर्थिक स्थिति से निराश हैं। इस्लामीकरण या कट्टर राष्ट्रवाद यानी भारत-विरोध के प्रति वहां के लोगों का खास झुकाव नहीं दिखता है। आम जनता का मूड भारत के खिलाफ जरूर है, खासकर हसीना के मुद्दे को लेकर, लेकिन सबसे अहम बात यह है कि 54 प्रतिशत लोगों को उम्मीद है कि नई सरकार सामाजिक-धार्मिक सहिष्णुता को बहाल करेगी। ‘पीपुल्स इलेक्शन सर्वे’ के अनुसार 47 प्रतिशत लोग तारिक रहमान को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं, जबकि सिर्फ 22.5 प्रतिशत लोग जमात-ए-इस्लामी के शफीकुर रहमान को प्रधानमंत्री के रूप में पसंद करते हैं। इससे जमात को मिलने वाले समर्थन का स्तर साफ होता है। कुछ ताकतें, जिनमें यूनुस भी शामिल हो सकते हैं, त्रिशंकु संसद चाहेंगी ताकि जमात को शामिल कर सरकार बनाई जा सके। ये चुनाव हमें बांग्लादेश के साथ रिश्तों को नए सिरे से शुरू करने का मौका देते हैं। बंगाल और असम के चुनावों को देखते हुए यह एक चुनौती भी है। ऐसे में क्या हम भारत के पूर्व में रणनीतिक स्थिरता वापस लाने के प्रयास करेंगे? इसका मतलब होगा कि इन राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान बांग्लादेश-विरोधी भाषा को नरम रखा जाए। या फिर क्या हम अपने पूर्व में एक बांग्ला-भाषी पाकिस्तान बनने देने को तैयार हैं?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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शेखर गुप्ता का कॉलम: हमें एक बांग्ला-भाषी ‘पाकिस्तान’ नहीं चाहिए

