रश्मि बंसल का कॉलम: थोड़ा खट्टा, थोड़ा नमकीन भी चलेगा, बस कड़वाहट से दूर रहें… Politics & News

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1 घंटे पहले

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रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर

मेरे साथ आईआईएम में पढ़ी एक सहेली अचानक चल बसी। 31 दिसंबर को वॉट्सएप पर मैसेज आया था कि सांस लेने में कुछ दिक्कत है, हॉस्पिटल में भर्ती हूं। 17 जनवरी को उनके निधन का समाचार मिला।

किसी को यकीन नहीं हुआ। इस हंसती-खेलती, हेल्दी इंसान से एक महीने पहले ही तो हम मिले थे। अब उनकी फोटो पर फूलमाला लगी है और हम बैठे हैं शोकसभा में। इतनी भी क्या जल्दी थी, शारदा, 54 साल कोई उमर नहीं होती।

हम इकट्ठे हुए थे दिवंगत आत्मा की याद में, लेकिन हर किसी के मन में सवाल एक ही था- मेरा नंबर कब आएगा? बीस साल बाद, या कल सुबह? इसका जवाब किसी के पास नहीं। जाना सबका निश्चित है, लेकिन हम इस तरह जीते हैं जैसे हमारे पास टाइम ही टाइम है।

शारदा ने छोटी उम्र में बड़ी नौकरी पाई थी, टाटा ग्रुप में। लेकिन शोक सभा में उनके करियर का खास जिक्र नहीं हुआ। जिक्र हुआ उनके प्यार और अपनेपन का। सरल स्वभाव का। सास बोलीं बाहर बड़ी अफसर रही होंगी, मगर घर में कभी हमें महसूस नहीं हुआ।

सब के साथ घुल-मिल कर रहती थीं। यह बात नोट करने वाली है, क्योंकि आजकल नौजवान पीढ़ी को काफी गुरूर है अपनी पढ़ाई का, अपने पद, अपनी आमदनी का। ऐसे में सास-बहू क्या, पति-पत्नी की भी नहीं बनती।

खैर, दूसरी बात यह कि कोई भी मदद मांगता तो शारदा कभी नहीं टालतीं। और तो और, आप मदद न मांगो तो भी उन्हें एहसास हो जाता कि इस बंदे को शायद मेरी जरूरत है। तो मैं खुद ही पूछ लूं। यह एक ऐसा संस्कार है, जो किसी स्कूल-कॉलेज में नहीं सिखाया जाता।

आप टॉप स्टूडेंट हो, आपसे किसी ने नोट्स मांग लिए- क्या आप दोगे? पहले तो आप सोचेंगे, दूसरा कितना नालायक है, खुद क्लास अटेंड क्यों नहीं करता। फिर मन में ख्याल आएगा, अगर मेरे नोट्स से पढ़ाई करके उसने मुझसे ज्यादा नंबर प्राप्त कर लिए तो? वैसे कॉलेज छोड़ने के कुछ साल बाद आपकी मार्कशीट कोई मायने नहीं रखती।

हो सकता है कि जो क्लास में टॉपर था, बाहर की दुनिया में स्ट्रगल करे। एक ऐसा दिन आता है जब आप नौकरी की तलाश में होते हैं और वही क्लासमेट, जिसके साथ नोट्स शेयर किए थे, किसी बड़ी कंपनी का मालिक। शायद आप भूल गए, पर उसे अब भी याद है।

आप कहेंगे यह तो कैलकुलेशन वाली बात हुई। मैंने किसी की मदद की, शायद किसी दिन मुझे उसका रिटर्न मिलेगा। यह तो एक उदाहरण था, इसकी कोई गारंटी नहीं। मैंने तो बस यह देखा है कि दिल खोलकर जो जीता है, वह सोमरस पीता है। कर्मों के लेन-देन में, रहता है गेन-गेन में।

मुझे पुनर्जन्म में विश्वास है। शायद मेरा बही-खाता अभी कुछ भारी है, बैलेंस करने का काम जारी है। जिस दिन पूरा हो जाएगा, मेरी शोक सभा में कोई आएगा। चाहती हूं मुझे भी इसी तरह याद किया जाए, लोगों के दिल में एक मिठास रह जाए। थोड़ा खट्टा, थोड़ा नमकीन भी चलेगा, बस कड़वाहट से दूर रहें, जीवन फलेगा।

दो हफ्ते पहले मैंने आपको ‘कुर्सी’ पर एक कहानी लिखने का न्योता दिया था। आश्चर्य की बात है, 70-75 पाठकों ने मुझे ईमेल किया। कई खूबसूरत कृतियां मुझे पढ़ने को मिलीं। मगर सबसे प्रेरणादायक कहानी भेजी थी देवेंद्र सिंह सुथार ने, जो रहते हैं बागरा में, जिला जालोर, राजस्थान। इनाम के रूप में आपको मैं भेजूंगी अपनी एक किताब, हस्ताक्षर के साथ।

चूंकि आप सब में इतना टैलेंट है, मैं आपको कहानी लिखने का एक और मौका दे रही हूं। इस बार का शीर्षक है- ‘जीना इसी का नाम है’। कहानी में होने चाहिए किरदार, डायलॉग, कुछ टेंशन, कुछ उतार-चढ़ाव। निबंध न लिखकर भेजिएगा। ​तो शुरू कीजिए, कल्पना की बहार। मुझे आपकी कहानियों का इंतजार। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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