मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम: घुसपैठियों का मुद्दा जीत और हार का अंतर लाने वाला है Politics & News

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1 घंटे पहले

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मिन्हाज मर्चेंट, लेखक, प्रकाशक और सम्पादक

2026 के बंगाल चुनाव में कांग्रेस का वाम मोर्चे से एक दशक पुराना गठबंधन तोड़ने का फैसला क्या अनपेक्षित नतीजे ला सकता है? ‘हमने अकेले चलने का फैसला किया है,’ कांग्रेस महासचिव और बंगाल प्रभारी गुलाम अहमद मीर ने कहा, ‘यह शीर्ष नेतृत्व का सामूहिक निर्णय है।’

मीर ने यह घोषणा नई दिल्ली में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की बैठक के बाद की। इसका यह मतलब है कि कांग्रेस बंगाल की सभी 294 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। इसके साथ ही अब मुकाबला चतुष्कोणीय हो गया है। पर इससे भाजपा को ही फायदा होगा, क्योंकि कांग्रेस तृणमूल के पारंपरिक मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा अपनी ओर खींच सकती है।

2021 के बंगाल चुनाव में तृणमूल को 48% वोट मिले थे और उसने 215 सीटें जीती थीं। लेकिन भाजपा का वोट शेयर भी 2016 के 10.04% से बढ़कर 38% हो गया था। उसकी सीटें 3 से बढ़कर 77 तक पहुंच गई थीं।

हालांकि इसके बाद तृणमूल कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा कार्यकर्ताओं पर की गई हिंसा के बाद पार्टी का मनोबल गिरा। तृणमूल की आक्रामकता पर भाजपा की प्रतिक्रिया में देरी के चलते कई कार्यकर्ता अन्य दलों में चले गए। क्या इस बार हालात बदल सकते हैं?

तृणमूल अब भी राज्य के लगभग 35% अल्पसंख्यक वोट बैंक पर नियंत्रण बनाए हुए है। फिर भी, पार्टी में घबराहट के संकेत दिख रहे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इतनी चिंतित हैं कि उन्होंने पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर मुद्दे पर स्वयं ही अपने राज्य के लिए पैरवी की। एसआईआर के जरिए राज्य की मतदाता सूची से बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम हटाए जा सकते हैं।

चार-तरफा मुकाबला चुनावी गणित को कैसे बदलेगा? शायद इतना तो नहीं कि ममता को लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने से रोका जा सके। अतीत में भी वे संदेशखाली प्रकरण, आरजी कर अस्पताल से जुड़ा दुष्कर्म और हत्या का मामला, शिक्षक भर्ती घोटाला और चिट फंड से जुड़े भ्रष्टाचार कांडों जैसी राजनीतिक आंधियों को झेल चुकी हैं।

समय के साथ ममता ने अपनी छवि को एक सियासी स्ट्रीट फाइटर से बदलकर एक बिजनेस-फ्रेंडली नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की है। कोलकाता टेक हब के रूप में उभर रहा है, हालांकि बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली एनसीआर-गुरुग्राम और हैदराबाद से प्रतिस्पर्धा करने में अभी उसे लंबा रास्ता तय करना है।

तृणमूल के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि ममता को राहुल गांधी के स्थान पर विपक्षी गठबंधन के संभावित नेता के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि, चुनाव आयोग के खिलाफ बंगाल का पक्ष रखने के लिए एक नागरिक के रूप में सुप्रीम कोर्ट में उनकी मौजूदगी ने संकेत दिया कि बंगाल चुनाव में कुछ उठापटक हो सकती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल में घुसपैठ के मुद्दे पर लगातार अभियान चलाया है। यह मुद्दा राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील है। जैसा कि मोदी ने पिछले सप्ताह राज्यसभा में अपने भाषण में कहा कि दुनिया के सबसे समृद्ध देश भी आज अवैध घुसपैठियों को बाहर कर रहे हैं। लेकिन हमारे देश में घुसपैठियों को बचाने के लिए अदालतों पर दबाव डाला जा रहा है। देश के युवा ऐसे लोगों को कैसे माफ करेंगे?

अलबत्ता ममता इस बात को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं होंगी कि कांग्रेस ने वाम मोर्चे से अपना चुनावी गठबंधन तोड़ लिया है। उनके लिए दोनों ही दल अब राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक हो चुके हैं। पांच वर्ष पहले दोनों मिलकर भी 10% से थोड़े अधिक ही वोट पा सके थे। अलग-अलग चुनाव लड़ने पर तो उनका संयुक्त वोट शेयर इससे भी कम रह सकता है।

भाजपा बंगाल में तेजी से उभर रही है। लेकिन चुनावी गणित अभी इसके संकेत नहीं देते कि वह 294 सदस्यीय विधानसभा में 148 सीटों का आंकड़ा पार कर सत्ता तक पहुंच सकती है। बहुमत हासिल करने के लिए भाजपा को 2021 के अपने 38% वोट शेयर को बढ़ाकर लगभग 45% तक लाना होगा।

साथ ही यह भी उम्मीद करनी होगी कि तृणमूल का वोट शेयर 48 से घटकर 42% पर आ जाए। कांग्रेस और वाम मोर्चे के एकल अंक में सिमटने की संभावना को देखते हुए चतुष्कोणीय मुकाबला भी ममता को सत्ता से बाहर करने के लिए पर्याप्त नहीं दिखता।

ममता अब 71 की हो चुकी हैं, लेकिन घुसपैठ के मुद्दे पर कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं हैं। बांग्लादेश- जहां 12 फरवरी को चुनाव होने हैं- से आए घुसपैठिये और शरणार्थी उनके वोट बैंक का छोटा लेकिन निर्णायक हिस्सा हैं। यह समूह जीत और हार के बीच फर्क पैदा कर सकता है। इसको लेकर चिंता की झलक ही ममता की सुप्रीम कोर्ट में नाटकीय उपस्थिति में दिखाई दी थी।

यह भारत के इतिहास में पहली बार था, जब किसी मुख्यमंत्री ने व्यक्तिगत रूप से सुप्रीम कोर्ट में किसी मामले की पैरवी की हो। यह इस बात का संकेत है कि बंगाल की आगामी राजनीतिक लड़ाई में कितना कुछ दांव पर लगा हुआ है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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