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कटे होंठ और तालु के साथ जन्म लेने वाले बच्चों के इलाज को लेकर पीजीआई का नया शोध आम लोगों के लिए राहत की खबर है। शोध में सामने आया कि ऐसे बच्चों का इलाज सिर्फ ऑपरेशन से नहीं बल्कि ऑपरेशन से पहले की सही तैयारी से ज्यादा बेहतर हो सकता है। अगर सर्जरी से पहले ही बच्चे के जबड़े और नाक की बनावट को धीरे-धीरे सही दिशा में लाया जाए तो ऑपरेशन आसान हो जाता है और बच्चे का चेहरा ज्यादा प्राकृतिक दिखता है। इससे आगे चलकर दोबारा ऑपरेशन की जरूरत भी कम पड़ सकती है।
पीजीआई के ओरल हेल्थ साइंसेज सेंटर में हुए इस शोध में बताया गया है कि सर्जरी से पहले की जाने वाली विशेष तैयारी, जिसे डॉक्टर प्री-सर्जिकल ऑर्थोपेडिक इलाज कहते हैं, इलाज की मजबूत नींव बनती है। अब डॉक्टर भी कहने लगे हैं कि ऑपरेशन से पहले की यह प्रक्रिया उतनी ही जरूरी है, जितनी खुद सर्जरी।
पीजीआई के विशेषज्ञ डॉ. मृदुला देसाले, डॉ. अदिति कपूर, डॉ. मनोज जायसवाल और डॉ. अनिल चौहान की ओर से किया गया यह शोध अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल क्लेफ्ट पैलेट-क्रैनियोफेशियल में प्रकाशित हुआ है। इसमें मार्च 2025 तक दुनिया के अलग-अलग देशों में हुए 21 शोधों का विश्लेषण किया गया। इन शोधों में यह देखा गया कि ऑपरेशन से पहले दिए जाने वाले इलाज से बच्चों के होंठ, तालु और नाक की बनावट में कितना सुधार आता है। नतीजों से पता चला कि सर्जरी से पहले की तैयारी से बच्चों को साफ फायदा हुआ। कुछ तरीकों से जबड़े के बीच का फासला कम हुआ, तो कुछ से नाक की बनावट और संतुलन बेहतर हुआ।
सीधे ऑपरेशन से क्यों होती है दिक्कत
डॉक्टर बताते हैं कि कटे होंठ-तालु वाले बच्चों में जबड़े के हिस्से अलग-अलग दिशा में होते हैं और नाक भी ठीक से बनी नहीं होती। अगर बिना किसी तैयारी के सीधे ऑपरेशन किया जाए तो टांकों पर ज्यादा खिंचाव पड़ता है और सर्जरी मुश्किल हो जाती है। कई बार नतीजे भी उतने अच्छे नहीं मिलते। इसके उलट, अगर ऑपरेशन से पहले ही चेहरे की बनावट को थोड़ा-थोड़ा सुधार लिया जाए तो डॉक्टरों के लिए सर्जरी करना आसान हो जाता है और बच्चे को भी कम परेशानी होती है।
कैसे होती है सर्जरी से पहले तैयारी
पीजीआई जैसे बड़े अस्पतालों में सर्जरी से पहले बच्चों को खास उपकरण लगाए जाते हैं। ये उपकरण धीरे-धीरे होंठ और तालु के बीच की दूरी कम करते हैं, जबड़े के हिस्सों को पास लाते हैं और नाक की बनावट को बेहतर करते हैं। इससे ऑपरेशन से पहले ही बच्चे का चेहरा काफी हद तक संतुलित हो जाता है। पीजीआई के डॉक्टरों का अनुभव है कि जिन बच्चों में सर्जरी से पहले यह इलाज किया जाता है, उनकी सर्जरी कम समय में हो जाती है, घाव जल्दी भरते हैं और दर्द भी कम होता है। अगर जन्म के शुरुआती हफ्तों में ही यह इलाज शुरू कर दिया जाए, तो इसके नतीजे सबसे अच्छे मिलते हैं। इससे बच्चे की मुस्कान, आत्मविश्वास और आगे का जीवन भी बेहतर होता है।
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PGI Chandigarh: सीधे सर्जरी नहीं! पीजीआई का शोध बदलेगा बच्चों के कटे होंठ-तालु के इलाज की दिशा

