अनारदाना से लेकर इमली तक.. 50 सालों से अंबाला की हर गली में स्वाद बिखेर रहे हैं अंबाला के ‘फायरमैन’ Haryana News & Updates

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अंबाला: बचपन इंसान की ज़िंदगी का वह सुनहरा दौर होता है जब न किसी तरह की चिंता होती है और न ही जिम्मेदारियों का बोझ. उस समय छोटी-छोटी चीज़ें भी बड़ी खुशी दे जाती थीं. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है ज़िंदगी की भागदौड़ में इंसान अपने बचपन की कई यादों को पीछे छोड़ देता है. इन्हीं भूली-बिसरी यादों में से एक है बचपन का चूर्ण जिसे कभी साइकिल पर बेचने वाले गली-मोहल्लों में आवाज़ लगाते फिरते थे. तब यह चूर्ण अठन्नी या एक रुपये में मिल जाया करता था और बच्चे-बड़े चाव से इसे खाते थे.

आज जहां चूर्ण बेचने वाले लोग गिने-चुने रह गए हैं, वहीं अंबाला के रहने वाले 69 वर्षीय सीताराम पिछले 50 सालों से इस परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं. अपनी पुरानी साइकिल पर चूर्ण बेचते हुए वे आज भी गली-गली घूमते हैं. सीताराम सिर्फ चूर्ण नहीं बेचते बल्कि लोगों को उनके बचपन की मीठी यादों से जोड़ने का काम कर रहे हैं. आज की नई पीढ़ी भले ही इस स्वाद से अनजान हो, लेकिन सीताराम का यह सफर आज भी लोगों के चेहरों पर मुस्कान ले आता है.

रुड़की में करते थे 50 रुपए की नौकरी

लोकल 18 को ज्यादा जानकारी देते हुए सीताराम ने बताया कि वह वैसे तो रुड़की (उत्तराखंड) के रहने वाले है, लेकिन पिछले 50 सालों से लोगों को अनारदाना व इमली से बने सतरंगी चूर्ण का स्वाद चखने का काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि आज से लगभग 50 साल पहले वह रुड़की में स्थित डीएवी स्कूल में चपरासी की नौकरी किया करते थे और उस समय उनकी तनख्वाह 50 रूपये थी. ऐसे में उस तनख्वाह में घर चलाना मुश्किल हो गया था और फिर उन्होंने अपने पिताजी के चूर्ण बेचने के काम की शुरुआत की थी.

उन्होंने बताया कि उसे जमाने में वह चूर्ण बेचकर ढाई सौ रूपये से तीन सौ रुपये कमा लिया करते थे. उन्होंने बताया कि वक्त बदलता गया और फिर वह हरिद्वार जाकर इस चूर्ण बेचने के काम को करने लगे, तब उस दौरान उनकी शादी हो गई और कुछ साल बाद उनके दो लड़के पैदा हो गए.

कैसे पहुंचे अंबाला

उन्होंने बताया कि उस जमाने में उनकी अंबाला में एक धर्म बहन थी जिसका नाम कमलेश था और उन्हीं के कहने पर वह अंबाला आकर चूर्ण बेचने का काम करने लगे. जिसके बाद वह लगभग 45 साल पहले अंबाला आ गए थे और उस बहन ने उन्हें अपना खुद का घर रहने के लिए दे दिया था. उन्होंने कहा कि तब से लेकर आज तक वह अंबाला में लोगों को इमली और अनार दाने से बने चूर्ण का स्वाद चखाने का काम कर रहे हैं और आज के समय में वह इस काम से हजार रुपए से लेकर पन्द्रह सौ रुपये तक कमा लेते हैं.

बच्चे कहते हैं फायरमैन

उन्होंने बताया कि बच्चे उन्हें फायरमैन के नाम से भी जानते हैं, क्योंकि वह चूर्ण के साथ ही कमल के फूल के जरिए चूर्ण में से कुछ चिंगारी निकाल कर दिखा देते हैं जिसे देखकर बच्चे हैरान हो जाते हैं और वह उनके फायर चूर्ण के स्वाद का आनंद उठाते हैं. उन्होंने बताया कि यह चूर्ण खासतौर पर अनार दाना और इमली की मदद से बनाया जाता है, जिसमें पांच अलग-अलग प्रकार के चूर्ण शामिल किए जाते हैं. उन्होंने कहा कि बच्चे 10 रुपये से लेकर 50 रूपये तक का चूर्ण उनसे खरीदने हैं और वह अंबाला के अलग-अलग स्कूल ओर मोहल्ले में जाकर इस चूर्ण को बेचने का काम करते हैं. उन्होंने बताया कि आजकल शादी ब्याह में भी इस चूर्ण के स्टॉल का अलग ट्रेंड चल रहा है और लोग खास तौर पर इसकी अलग से स्टॉल लगवाते हैं.

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