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5 घंटे पहले
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नंदितेश निलय वक्ता, एथिक्स प्रशिक्षक एवं लेखक
आपने ध्यान दिया है कि एक तरफ जहां सारी दुनिया पूरी ऊर्जा के साथ स्क्रीन पर आलोकित होती रहती है; वहीं दूसरी तरफ हमारी युवा पीढ़ी पर एक कभी न खत्म होने वाली सुस्ती भी छाई रहती है। बेड शीट झाड़ना, दो कदम चलकर पानी का गिलास उठाना, किताबों को सहेजना, किसी का हालचाल पूछना, अपने कमरे से निकलकर दूसरे कमरे में जाना- ये सब उनके लिए बहुत दुरूह कार्य बन जाते हैं। बिस्तर पर पढ़ना, वहीं पर खाना और साथ-साथ लगातार फोन देखते रहना ही उन्हें सही और उपयोगी नजर आने लगता है। स्क्रीन टाइम के अलावा बाकी सारे कार्य अनिच्छा से भर जाते हैं।
इस पीढ़ी में जितनी ऊर्जा अनवरत फोन देखने और एक क्लिक पर सामान मंगाने के लिए है, वैसी घर से बाहर निकलकर टहलने या लाइब्रेरी तक पहुंचने के लिए क्यों नहीं नजर आती है? “टेक-ब्रोज़’ कहलाने वाली यह पीढ़ी हजार बातों में अपने माता-पिता से सहमत नहीं होती। तुरंत प्रतिक्रिया देना इनके लिए आम है। अपनी सोच को लेकर ये बहुत पजेसिव होते हैं और उन लोगों को बिलकुल पसंद नहीं करते, जो उनके कम्फर्ट जोन को तोड़ना या उन्हें कुछ सिखाना या समझाना चाहते हैं।
सिलिकॉन वैली में मशहूर ‘तेजी से आगे बढ़ो’ का मंत्र इस नई पीढ़ी को अकसर नैतिक गलतियों और अनचाहे नतीजों की ओर ले जाता है। इस पीढ़ी को इनोवेशन और विज़न के लिए सराहा जाता है, लेकिन जोखिम लेने को लेकर उनका लापरवाह रवैया समाज को नुकसान भी पहुंचा सकता है। यह डेटा-प्राइवेसी के उल्लंघन और एल्गोरिदम में भेदभाव के मामलों में देखा भी गया है।
अगर हम इस पीढ़ी को उनके माता-पिता की नजरों से देखें तो वे उन्हें लगातार गैजेट्स से दूर रखने की कोशिश करते पाए जाते हैं। उनके लिए अपने बच्चों का सर्वांगीण विकास मायने रखता है, जबकि “टेक-ब्रोज़’ के लिए, तकनीक, दक्षता और कम्फर्ट जोन ही लक्ष्य होता है। और शायद यही कारण है कि जिस बात पर वे सबसे ज्यादा असहमत होते हैं, या जिस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करते हैं; वह है मेहनत का महत्व।
उनके माता-पिता का मानना होता है कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए सभी को अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलना चाहिए। लेकिन “टेक-ब्रोज़’ के लिए तो पूरी दुनिया एक क्लिक पर मौजूद है, फिर मेहनत क्या करना! श्रम तो निम्न वर्ग के हिस्से गया है।
वो भला फोन छोड़ मेहनत का दामन क्यों थामें! तकनीक की दुनिया ने उन्हें एक ऐसा सपनीला संसार दिया है, जहां उनकी हर ‘असुविधा’ को खत्म कर दिया गया है। सबकुछ इंस्टैंट डिलीवर हो जाता है। अब तो सोचने का काम भी बुद्धिमान चैटबॉट्स को आउटसोर्स कर दिया गया है।
लेकिन इसी ने ‘फ्रिक्शन-मैक्सिंग’ (Friction- maxxing) के नए विचार को भी जन्म दिया है, जो हमारी दिनचर्या में ‘असुविधा’ की वापसी की वकालत करता है। यह शरीर को चलाने और प्रयत्नशीलता के महत्व के तर्क को सामने रखता है।
ये कहता है कि घर बैठकर खाना मंगवाने के बजाय घर से बाहर निकलना, ट्रैफिक का सामना करना और खाना ऑर्डर करने के बाद उसकी प्रतीक्षा करना हम में धैर्य और ऐसे माहौल में रहने की क्षमता को विकसित करता है, जिन पर हमारा नियंत्रण नहीं। क्योंकि खुद को मुश्किल स्थितियों में डालना हमारे व्यक्तित्व को निखारता है।
इससे हासिल होने वाली मानसिक मजबूती और आत्मविश्वास हमें बात-बात पर निराश होने से बचाता है और हमें बताता है कि जीवन कोई इंस्टा या मेटा का प्लेटफार्म नहीं, एक सघन वास्तविकता है। आखिर यह “फ्रिक्शन’ ही है, जो फिजिक्स की भाषा में व्यक्ति को गिरने से बचाता है और हर घड़ी सतर्क भी रखता है! (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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नंदितेश निलय का कॉलम: एक क्लिक पर ही सब मिल जाएगा तो व्यक्तित्व कैसे निखरेगा?


