[ad_1]
- Hindi News
- Lifestyle
- Ghaziabad Sisters Korean Lover Game Suicide Case; Parental Control | Mobile Addiction
1 मिनट पहले
- कॉपी लिंक
गाजियाबाद में तीन सगी बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। उनकी उम्र करीब 12, 14 और 16 साल थी। तीनों लड़कियों को टास्क-बेस्ड ‘कोरियन लव गेम’ की लत थी। वे हर वक्त एकसाथ रहती थीं। तीनों बहनों को इस कदर गेम की लत थी कि उन्होंने स्कूल जाना भी छोड़ दिया था।
जब पिता ने गेम खेलने से मना किया तो उन्होंने ये कदम उठा लिया। उन्होंने 18 पन्नों का सुसाइड नोट लिखा था। इसमें लिखा है- “मम्मी-पापा सॉरी… गेम नहीं छोड़ पा रही हूं। अब आपको एहसास होगा कि हम गेम से कितना प्यार करते थे, जिसको आप छुड़वाना चाहते थे।”
मशहूर अमेरिकी साइकोलॉजिस्ट जीन एम. ट्वेंग की किताब ‘आईजेन’ (iGen) के मुताबिक, साल 2011 के बाद से किशोरों में ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया एडिक्शन के कारण डिप्रेशन और आत्महत्या की दर तेजी से बढ़ी है।
आजकल लगभग हर टीनएज बच्चे के पास स्मार्टफोन होता है। ऐसे में इस घटना ने पेरेंट्स की चिंता बढ़ा दी है।
इसलिए, जरूरत की खबर में आज उन ऑनलाइन गेम्स की बात करेंगे, जिनसे सुसाइडल टेंडेंसी (आत्महत्या की प्रवृत्ति) बढ़ती है। साथ ही जानेंगे कि-
- बच्चों की किन आदतों पर अलर्ट होने की जरूरत है?
- पेरेंट्स बच्चों के फोन में कैसे ‘पेरेंटल कंट्रोल’ लगाएं?
एक्सपर्ट: डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी, वरिष्ठ मनोचिकित्सक, भोपाल
सवाल- कोरियन लव गेम क्या है, जिसने तीन सगी बहनों की जान ली?
जवाब- यह एक ऑनलाइन गेम है, जिसमें एक अनजान व्यक्ति सोशल मीडिया पर यूजर से बात करता है। वह खुद को कोरियन बताता है। यूजर का भरोसा जीतने के लिए वह दोस्ती और प्यार भरी बातें करता है।
भरोसा जीतने के बाद वह यूजर को छोटे-छोटे टास्क देने लगता है। शुरूआत में टास्क आसान होते हैं। कुछ दिनों बाद टास्क मुश्किल होने लगते हैं। अगर यूजर टास्क करने से मना करे, तो वह व्यक्ति डराता है और धमकी देता है। इसमें 50 टास्क होते हैं, जो लगभग 50 दिनों तक चलते हैं।
सवाल- कौन से मोबाइल गेम और चैलेंज सुसाइड की वजह बन रहे हैं?
जवाब- वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं कि कुछ गेम और चैलेंज बच्चों-किशोरों को एडिक्टेड बनाने के लिए तैयार किए जाते हैं, ताकि वे हमेशा उनके यूजर बने रहें। बच्चों और किशोरों का ब्रेन इतना डेवलप नहीं हुआ होता है कि वे तार्किक निर्णय ले सकें।
इसका असर ये होता है कि उनमें खुद को नुकसान पहुंचाने और आत्महत्या करने की टेंडेंसी बढ़ जाती है। ग्राफिक में उन गेम्स और चैलेंज की लिस्ट देखिए, जो मौत की वजह बन रहे हैं।

सवाल- मोबाइल गेम में ऐसा क्या होता है कि बच्चे व किशोर सुसाइड जैसे कदम उठा लेते हैं?
जवाब- डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी के मुताबिक, इस तरह के गेम्स में मिले चैलेंज और टास्क को पूरा करते समय बच्चे अपना मानसिक नियंत्रण खो देते हैं। वे गेम के कैरेक्टर और चैलेंज को ही असली दुनिया समझ बैठते हैं। वे इसमें मिल रहे टास्क और निर्देशों से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं। डर, दबाव और गेम हारने के भय से उनके निर्णय लेने की क्षमता और कमजोर हो जाती है। इसलिए टास्क पूरा करने के लिए सुसाइड या सेल्फ हार्म जैसे खतरनाक निर्णय ले लेते हैं।

सवाल- पेरेंट्स कैसे समझें कि बच्चे को ऑनलाइन गेम की लत है, इसके क्या संकेत हैं?
जवाब- अगर बच्चा हर समय गेम के बारे में सोचता रहता है, रोकने पर गुस्सा करता है या चिड़चिड़ा होता है तो ये एडिक्शन के संकेत हो सकते हैं। इसके सभी संकेतों को नीचे दिए ग्राफिक से समझिए-

याद रखें, अगर इनमें से 4–5 संकेत लगातार दिखें तो यह एडिक्शन की शुरुआत हो सकती है। इसके लिए समय रहते बातचीत करना, स्क्रीन लिमिट और पेरेंटल कंट्रोल जरूरी है।
सवाल- बच्चों-किशोरों को मोबाइल देते समय किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है?
जवाब- डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं कि बच्चों और किशोरों को मोबाइल देना पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन उनकी निगरानी और मार्गदर्शन बेहद जरूरी है। कम उम्र में डिजिटल कंटेंट बच्चों के व्यवहार, भावनाओं और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

सवाल- स्मार्टफोन में पेरेंटल कंट्रोल कैसे एक्टिव करें, यह क्यों जरूरी है?
जवाब- स्मार्टफोन में पेरेंटल कंट्रोल ऑन करके बच्चों के एप्स, गेम्स और ऑनलाइन कंटेंट को सीमित कर सकते हैं। नीचे दिए ग्राफिक से इसे एक्टिव करने का सही तरीका समझिए-

सवाल- ऑनलाइन गेम्स बच्चों के ब्रेन को कैसे प्रभावित करते हैं?
जवाब- ऑनलाइन गेमिंग की लत ब्रेन के रिवॉर्ड और इमोशन कंट्रोल सिस्टम को असंतुलित कर सकती है। लगातार वर्चुअल दुनिया में रहने से बच्चे रियल लाइफ की समस्याओं से निपटने की क्षमता खो देते हैं। जब गेम से मिलने वाला उत्साह या पहचान खत्म होती है, तो खालीपन, निराशा और असफलता की भावना बढ़ सकती है।
कुछ खतरनाक गेम्स में दबाव, डर या चैलेंज पूरा करने की मजबूरी बच्चों को मानसिक रूप से कमजोर बना देती है। इसके कारण उनके ब्रेन में जोखिम भरे या आत्मघाती विचार आने लगते हैं।
सवाल- क्या ऑनलाइन गेम्स सिर्फ बच्चों या किशोरों के ही दिमाग पर असर डालते हैं?
जवाब- नहीं, इससे वयस्कों के दिमाग पर भी बुरा असर पड़ सकता है। लगातार गेम खेलने से डोपामिन (हैप्पी हॉर्मोन) का स्तर प्रभावित होता है, जिससे गेमिंग पर निर्भरता बढ़ने लगती है। इससे फोकस, भावनात्मक संतुलन और निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो सकती है।
ज्यादा गेमिंग से तनाव, चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या हो सकती है। यूजर सोशल लाइफ से दूरी बना सकता है। लंबे समय तक लत रहने पर मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
……………… ये खबर भी पढ़िए गाजियाबाद-मोबाइल गेम की लत, 3 बहनें 9वीं मंजिल से कूदीं: उम्र 12-14-16 साल; सुसाइड नोट में लिखा- सॉरी मम्मी-पापा, गेम नहीं छोड़ पाएंगे

सुसाइड नोट में लिखा है- “मम्मी-पापा सॉरी… गेम नहीं छोड़ पा रही हूं। अब आपको एहसास होगा कि हम गेम से कितना प्यार करते थे, जिसको आप छुड़वाना चाहते थे।” आगे पढ़िए…
[ad_2]
जरूरत की खबर- ऑनलाइन गेम ने ली 3 बहनों की: एक्सपर्ट्स से जानें कब बरतें सतर्कता, फोन में ऐसे लगाएं पेरेंटल कंट्रोल




