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Health News: दर्द, एक ऐसा अनुभव जो मनुष्य के जीवन का अविभाज्य हिस्सा है. शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसने अपने जीवन में कभी न कभी दर्द का सामना न किया हो. यह दर्द कभी क्षणिक होता है, तो कभी सालों तक हमारे शरीर और मन पर अपना प्रभाव बनाए रखता है. आधुनिक जीवनशैली, भागदौड़, तनाव, गलत खानपान और शारीरिक निष्क्रियता ने आज दर्द को एक सामान्य समस्या बना दिया है, लेकिन क्या वास्तव में दर्द “सामान्य” है, या यह हमारे शरीर का दिया गया एक गंभीर चेतावनी संकेत है, जिसे हम अनदेखा कर रहे हैं?
चिकित्सा विज्ञान के मुताबिक दर्द मुख्यत दो प्रकार का होता है. पहला वह दर्द जो अचानक उत्पन्न होता है, जैसे उंगली का दब जाना, गिर जाना, किसी भारी वस्तु का लग जाना या दुर्घटना हो जाना. इसे एक्यूट पेन कहा जाता है. यह तीव्र होता है, लेकिन आमतौर पर अल्पकालिक रहता है. दूसरा प्रकार वह दर्द है जो लंबे समय तक बना रहता है. यह धीरे-धीरे जीवन का हिस्सा बन जाता है और व्यक्ति इसे सहने का आदी हो जाता है. इसे क्रोनिक पेन कहा जाता है. यह दर्द किसी अंदरूनी समस्या का संकेत होता है, जैसे हड्डियों का घिसना, नसों का दबना, स्लिप डिस्क या जोड़ों से जुड़ी समस्याएं. आयुर्वेद में ऐसे दर्द को प्रायः वात दोष से संबंधित माना गया है.
शरीर का चेतावनी संकेत या दवाओं से दबाया गया अलार्म?
भारत जैसे विशाल देश में क्रोनिक पेन एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन चुका है. अनुमान के मुताबिक लगभग 18 करोड़ लोग किसी न किसी प्रकार के लंबे समय से चले आ रहे दर्द से पीड़ित हैं. आर्थराइटिस, कमर दर्द, घुटनों का दर्द, सर्वाइकल पेन, न्यूरोपैथिक पेन, ये सभी समस्याएं न केवल व्यक्ति की शारीरिक क्षमता को प्रभावित करती हैं, बल्कि उसके मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन को भी बाधित करती हैं.
दर्द की अनुभूति अपने आप में एक अत्यंत जटिल और अद्भुत जैविक प्रक्रिया है. हमारे शरीर में कुछ विशेष प्रकार के रिसेप्टर्स होते हैं जिन्हें नोसिसेप्टर्स कहा जाता है. ये रिसेप्टर्स यह पहचानते हैं कि शरीर के किस हिस्से में सूजन, दबाव या क्षति हो रही है. जब यह जानकारी स्नायु तंत्र के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुंचती है, तब हमें दर्द का अनुभव होता है. दूसरे शब्दों में कहें तो दर्द हमारे शरीर का एक अलार्म सिस्टम है, जो हमें यह बताता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब हम इस अलार्म को समझने के बजाय उसे बंद करने का प्रयास करने लगते हैं. आज दर्द से राहत पाने का सबसे आसान और प्रचलित तरीका है, दर्द निवारक दवाएं. सिर में हल्का दर्द हो, जोड़ों में जकड़न हो या पीठ में खिंचाव, हम तुरंत गोली का सहारा लेते हैं. ये दवाएं त्वरित राहत तो देती हैं, लेकिन क्या ये हमें वास्तव में स्वस्थ बनाती हैं?
पेनकिलर्स के फायदे और नुकसान
आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा में दर्द निवारक दवाओं को मुख्यतः तीन वर्गों में बांटा जाता है. इनमें सबसे ज्यादा प्रचलित हैं नॉन-स्टेरॉइडल एंटी-इन्फ्लेमेटरी ड्रग्स, जिन्हें आम भाषा में NSAIDs कहा जाता है. डाइक्लोफिनेक, आइबुप्रोफिन, एस्पिरिन, नेप्रोक्सिन जैसी दवाएं इसी श्रेणी में आती हैं. ये दवाएं सूजन को कम करके दर्द से राहत देती हैं, लेकिन लंबे समय तक इनके सेवन से पेट की समस्याएं, गैस्ट्रिक अल्सर, लीवर और किडनी को नुकसान, हृदय रोग और श्वसन तंत्र से जुड़ी जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं.
इसी श्रेणी में स्टेरॉइड्स भी आते हैं, जो अत्यंत प्रभावशाली होते हैं, लेकिन उतने ही खतरनाक भी. लंबे समय तक स्टेरॉइड्स का उपयोग करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है और हार्मोनल असंतुलन उत्पन्न हो सकता है. दर्द निवारक दवाओं का दूसरा बड़ा वर्ग एनालजेसिक्स का है, जिसमें ओपिऑइड्स शामिल हैं. ये दवाएं अफीम से बनी होती हैं और अत्यधिक दर्द में उपयोग की जाती हैं. इनसे दर्द में तीव्र राहत मिलती है, लेकिन ये अत्यंत लत लगाने वाली होती हैं. लंबे समय तक इनके उपयोग से न केवल शारीरिक निर्भरता बढ़ती है, बल्कि मानसिक संतुलन भी बिगड़ सकता है.
दर्द दबाने की नहीं, कारण मिटाने की जरूरत
तीसरा वर्ग एडजुवेंट ड्रग्स का है, जिनमें एंटी-कन्वल्सेंट्स और एंटी-डिप्रेसेंट्स शामिल हैं. गैबापेंटिन और प्रीगैबलिन जैसी दवाएं नसों के दर्द में दी जाती हैं. ये दवाएं दर्द के सिग्नल को मस्तिष्क तक पहुंचने से रोकती हैं, जिससे दर्द की अनुभूति कम हो जाती है. लेकिन दर्द का मूल कारण बना रहता है. इसके साथ ही अत्यधिक थकान, स्मृति ह्रास, चक्कर आना, सांस लेने में दिक्कत और मानसिक भ्रम जैसे दुष्प्रभाव भी सामने आते हैं. इन सभी दवाओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि ये दर्द को ठीक नहीं करतीं, बल्कि केवल उसकी अनुभूति को दबा देती हैं. जैसे ही दवा का प्रभाव समाप्त होता है, दर्द फिर लौट आता है. व्यक्ति को दोबारा दवा लेनी पड़ती है और धीरे-धीरे शरीर इन दवाओं का आदी हो जाता है. परिणामस्वरूप, दर्द, दवा, अस्थायी राहत और फिर दर्द का एक दुष्चक्र बन जाता है.
बाज़ार में उपलब्ध नकली और मिलावटी दवाओं का बढ़ते चलन ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है. कई बार दवाओं में सक्रिय तत्व की मात्रा कम होती है, जिससे अपेक्षित राहत नहीं मिलती और रोगी को खुराक बढ़ानी पड़ती है. इससे शरीर पर दुष्प्रभाव और भी बढ़ जाते हैं. जब आधुनिक चिकित्सा पद्यति की यह सीमाएं हमारे समक्ष स्पष्ट होती हैं, तब स्वाभाविक रूप से हमारा ध्यान आयुर्वेद की ओर जाता है. आयुर्वेद दर्द को केवल एक लक्षण नहीं मानता, बल्कि शरीर के दोषों के असंतुलन का परिणाम मानता है. इसलिए आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्यति का उद्देश्य दर्द को दबाना नहीं, बल्कि उसके मूल कारण को संतुलित करना होता है.
दर्द के मूल कारण पर आयुर्वेदिक समाधान
पतंजलि के वैज्ञानिकों नें इसी समग्र दृष्टिकोण से पीड़ानिल गोल्ड को विकसित किया. यह एक ऐसी औषधि है जो दर्द से जुड़े लगभग सभी जैविक पाथवे पर कार्य करती है. आधुनिक शोधों में यह पाया गया है कि यह औषधि उन ही प्रक्रियाओं को नियंत्रित करती है, जिन पर एलोपैथिक पेनकिलर्स प्रभाव डालती हैं, लेकिन बिना किसी गंभीर दुष्प्रभाव के. वैज्ञानिक अध्ययनों में यह स्पष्ट हुआ है कि सूजन दर्द का एक प्रमुख कारण है. जब शरीर में सूजन होती है, तो वह आसपास की नसों पर दबाव पड़ता है और दर्द के सिग्नल उत्पन्न होते हैं. पीड़ानिल गोल्ड सूजन से जुड़े इन प्रमुख जैविक मार्कर्स को संतुलित करता है. इसके प्रभाव स्टेरॉइड्स के समान पाए गए हैं, परन्तु बिना रोग प्रतिरोधक प्रणाली को नुकसान पहुंचाए.
आर्थराइटिस जैसे रोगों में, जहाँ हड्डियों के बीच का कार्टिलेज घिस जाता है, पीड़ानिल गोल्ड ने न केवल दर्द में राहत प्रदान करता है, साथ ही साथ कार्टिलेज के पुनर्निर्माण में भी सहायक भूमिका निभाता है. यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण शोध है, क्योंकि सामान्यतः माना जाता है कि एक बार कार्टिलेज नष्ट हो जाए तो वह वापस नहीं बन सकते हैं. नसों के दबने से होने वाले दर्द, जैसे स्लिप डिस्क या सायटिका, में भी इस औषधि का प्रभाव उल्लेखनीय पाया गया है. यह दर्द के सिग्नल को नियंत्रित करने के साथ-साथ नसों के स्वास्थ्य को भी प्रभावी रूप से ठीक करने में सहायता प्रदान करता है.
गोलियों से नहीं, संतुलन से राहत
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पीड़ानिल गोल्ड का प्रभाव केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह मस्तिष्क के स्तर पर भी काम करता है. लंबे समय तक पेनकिलर्स के उपयोग से मस्तिष्क की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, लेकिन इस पीड़ानिल गोल्ड ने दर्द से जुड़े जीन एक्सप्रेशन को संतुलित करने में भी सकारात्मक परिणाम दिखाए हैं.
दीर्घकालिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से किए गए अध्ययनों में यह पाया गया है कि निर्धारित मात्रा में, सही विधि और सही अनुपान के साथ लेने पर यह औषधि लीवर, किडनी, मस्तिष्क एवं किसी अन्य प्रमुख अंग पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं डालती. आज जब हम दर्द निवारक दवाओं के दुष्परिणामों को स्पष्ट रूप से देख रहे हैं, तब यह आवश्यक हो गया है कि हम अपनी चिकित्सा पद्धति पर पुनर्विचार करें. त्वरित राहत की बजाय दीर्घकालिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना ही बुद्धिमानी है. आयुर्वेद का शरीर, मन और जैविक तंत्र को एक समग्र इकाई के रूप में देखने का, होल पर्सन मेडिसिन दृष्टिकोण आज के समय की आवश्यकता बन चुका है.
दर्द से मुक्ति का मार्ग केवल गोलियों में नहीं, बल्कि समझ, संतुलन और समग्र उपचार में निहित है. जब चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेदिक ज्ञान एक साथ आते हैं, तब स्वास्थ्य केवल रोगमुक्ति नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता में सुधार का माध्यम बन जाता है.
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Health Tips: दर्द के मूल कारण पर पतंजलि का आयुर्वेदिक इलाज, पीड़ानिल गोल्ड से मिलेगी राहत!




