अर्घ्य सेनगुप्ता और स्वप्निल त्रिपाठी का कॉलम: 76 साल बाद भी अंग्रेजी ही राजकाज की भाषा क्यों है? Politics & News

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जब संविधान सभा के सदस्य संविधान के आधिकारिक अंग्रेजी पाठ पर हस्ताक्षर कर रहे थे, तब राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सदन के समक्ष उसका एक हिंदी अनुवाद भी प्रस्तुत किया और सदस्यों से उस पर भी हस्ताक्षर करने का अनुरोध किया। यह कदम संविधान सभा के भीतर उठी उस सशक्त मांग से प्रेरित था कि संविधान किसी औपनिवेशिक भाषा में नहीं, बल्कि जनता की भाषा में होना चाहिए। ​​यह क्षण एक व्यापक संवैधानिक महत्वाकांक्षा को दर्शाता था- जो भारत की अनेक क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान करती थी, विविधता को स्वीकार करती थी, और अंग्रेजी पर औपनिवेशिक भाषाई निर्भरता से धीरे-धीरे आगे बढ़ने की परिकल्पना करती थी। हिंदी को इस दिशा में एक आरंभ माना गया था, न कि इस लक्ष्य की एकमात्र अभिव्यक्ति। हिंदी को राजभाषा के रूप में परिकल्पित किया गया था, लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं के निरंतर उपयोग और विकास के लिए स्पष्ट सुरक्षा उपाय भी किए गए थे। आठवीं अनुसूची ने चौदह क्षेत्रीय भाषाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की; अनुच्छेद 345 ने राज्यों को अधिकार दिया कि वे अपने राजकीय कार्यों के लिए राज्य में बोली जाने वाली एक या अधिक भाषाओं को अपनाएं; और अनुच्छेद 347 ने राष्ट्रपति को यह शक्ति दी कि वे राज्य की एक महत्वपूर्ण जनसंख्या द्वारा बोली जाने वाली भाषा को आधिकारिक मान्यता प्रदान कर सकें। राज्य विधानसभाओं की कार्यवाही राज्य की राजभाषा में होनी थी और संसद में भी सदस्यों को अपनी मातृभाषा में बोलने की अनुमति दी गई थी। इसी के साथ, अंग्रेजी को अनेक संवैधानिक कार्यों के लिए एक कार्यकारी भाषा के रूप में बनाए रखा गया। यह केंद्र सरकार की आधिकारिक भाषा बनी रही, हिंदी के साथ संसद की एक डिफॉल्ट भाषा रही और सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की कार्यवाही, संसद में प्रस्तुत विधेयकों और अन्य विधायी दस्तावेजों की भाषा भी रही। स्वयं संविधान अंततः अंग्रेजी में ही अपनाया गया- एक ऐसा निर्णय, जिसे लेकर कई सदस्यों ने खेद व्यक्त किया। उन्हें इस आश्वासन से शांत किया गया कि अंग्रेजी केवल 15 वर्षों की अवधि के लिए ही बनी रहेगी, जिसके बाद वह राजभाषा नहीं रहेगी। 76 वर्ष बाद भी यह संवैधानिक वादा केवल आंशिक रूप से ही पूरा हो पाया है। अंग्रेजी से आगे बढ़ने का हर गंभीर प्रयास या तो ठहर गया या कमजोर पड़ गया या टाल दिया गया। समय के साथ अंग्रेजी केवल एक कार्यकारी भाषा ही नहीं रही, बल्कि संवैधानिक सत्ता की भाषा बन गई। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय मुख्यतः अंग्रेजी में कार्य करते हैं; विधेयक और कानून अधिकतर अंग्रेजी में ही तैयार किए जाते हैं; और उच्चस्तरीय आधिकारिक कार्य लगभग पूरी तरह उसी भाषा में संचालित होते हैं।
यह स्थिति किसी एक निर्णय या सुनियोजित योजना का परिणाम नहीं थी। यह संस्थागत जड़ता और राजनीतिक सतर्कता से उत्पन्न हुई है। भाषाई बहुसंख्यकवाद को लेकर गहरी आशंकाएं- विशेष रूप से हिंदी के प्रभुत्व का भय- सुधार के प्रयासों को रोक देती रहीं। अंग्रेजी को एक तटस्थ समझौता-भाषा के रूप में देखा जाने लगा, जो किसी एक भारतीय भाषा को विशेषाधिकार नहीं देती थी। जब प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाने का प्रयास किया तो विशेषकर मद्रास में व्यापक विरोध हुआ। दो लोगों ने आत्मदाह किया, एक ने विषपान किया और हिंदी के पुतले जलाए गए। आज अंग्रेजी ने संवैधानिक सत्ता को भाषाई बहुसंख्यकों से अलग-थलग कर दिया है और साथ ही एक सीमित, शिक्षित अभिजात वर्ग की पहुंच को मजबूत किया है। भाषा ही तय करती है कि कानून कौन पढ़ सकता है, कौन उसे समझ सकता है और कौन संवैधानिक संस्थाओं से सार्थक रूप से जुड़ सकता है। न्याय की प्राप्ति केवल अदालतों तक पहुंचने के अधिकार तक सीमित नहीं है; इसमें कार्यवाही, तर्क और निर्णय को समझ पाने की क्षमता भी शामिल है। ऐसा संविधान, जिसे अधिकांश नागरिक पढ़ नहीं सकते या उपयोग में नहीं ला सकते, भागीदारी का माध्यम बनने के बजाय केवल एक दस्तावेज बनकर रह जाता है। जब तक संवैधानिक संस्थाएं उन भाषाओं में नहीं बोलेंगी, जिनमें नागरिक अपना जीवन जीते हैं, तब तक भाषाई लोकतंत्र एक अधूरा संवैधानिक वादा ही बना रहेगा। न्यायालयों के निर्णय आज भी मुख्यत: अंग्रेजी में ही दिए जाते हैं।
(ये लेखकों के अपने विचार हैं)

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