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ऑपरेशन सिंदूर के 88वें घंटे पर भारत ने युद्धविराम की पाकिस्तानी गुजारिश को स्वीकार करने में हड़बड़ी की थी या बुद्धिमानी दिखाई थी? क्या भारत को लड़ाई जारी रखनी चाहिए थी और कब तक? इस तरह के सवाल हाल ही में तब उभरे, जब इस ऑपरेशन पर स्विट्जरलैंड की एक संस्था ‘सेंटर फॉर मिलिट्री हिस्ट्री एंड पर्सपेक्टिव स्टडीज’ के लिए उच्च अधिकार संपन्न एक समूह की विस्तृत रिपोर्ट जारी हुई। रिपोर्ट के निष्कर्षों का भारत में स्वागत किया गया है। रिपोर्ट ने बताया है कि भारत को इस ऑपरेशन में हवाई सुरक्षा में पाकिस्तान के दावों के मुकाबले आधा ही नुकसान उठाना पड़ा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जब तक युद्धविराम हुआ, तब तक भारतीय वायुसेना दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम्स को अच्छा-खासा नुकसान पहुंचा चुकी थी और संघर्ष का समापन पाकिस्तानी वायुसेना के प्रमुख अड्डों पर लगातार कई जबरदस्त हमले करके किया गया। इस तरह, हवाई हमले में साफ बढ़त हासिल करके भारत ने पाकिस्तान को युद्धविराम के लिए गुजारिश करने पर मजबूर कर दिया। रिपोर्ट ने यह भी कहा है कि यह संकेत करने वाले पर्याप्त तथ्य उभरते हैं कि 10 मई 2025 की सुबह तक भारतीय वायुसेना पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र के बड़े हिस्से पर वर्चस्व हासिल करने में सफल हो चुकी थी। इसने उसे दुश्मन के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर लंबी दूरी से हमले करते रहने की स्थिति में ला दिया था। इस रिपोर्ट के निष्कर्ष पश्चिमी ‘थिंक टैंकों’ की ओर से आई रिपोर्टों के मुकाबले ज्यादा निष्पक्ष और स्पष्ट लगते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि 6/7 मई की रात पीएएफ बहावलपुर या मुरीदके पर भारत के हमलों में बाधा डालने या रोकने में सफल नहीं रही थी। ऐसे में दो सवाल तुरंत उभरते हैं। एक सवाल तो संदेहवादियों की ओर से आता है जो पूछते हैं कि क्या आप यह कह सकते हैं कि आईएएफ ने हवाई क्षेत्र में वर्चस्व कायम कर लिया था, जबकि वह अपने ही क्षेत्र में काफी अंदर से हमले कर रही थी? जबकि हकीकत यह है कि आज ज्यादातर युद्ध और खासकर हवाई युद्ध लंबी दूरी से लड़े जा रहे हैं और आपको दुश्मन के क्षेत्र के अंदर तो क्या उसके करीब भी जाने की जरूरत नहीं होती। दूसरा और बड़ा सवाल वह है, जिसे हमने पहले ही उठाया था कि क्या भारत ने युद्धविराम काफी पहले ही कबूल कर लिया? कई गंभीर किस्म के लोग भी युद्धविराम को हड़बड़ी में लिया गया फैसला बताते हैं और इस बात पर अफसोस जाहिर करते हैं कि पाकिस्तान को सबक सिखाने का जो मौका मिला था, उसे गंवा दिया गया। इसके जवाब में यह सवाल उठाया जा सकता है कि भारत अपनी जीत को किस तरह परिभाषित करता और वह जीत कब होती? क्या पीएएफ के संपूर्ण विनाश के साथ होती? या 1971 में ढाका में जो हुआ था वैसा कुछ होता तब जीत मानी जाती? 10 मई की शाम से भारत कहता रहा है कि उसके लक्ष्य पूरे हो गए थे, युद्ध में वर्चस्व उसे हासिल हो गया था और युद्ध कब रोकना है यह उसके हाथ में था। किसी भी युद्ध को उसे शुरू करने वाले पक्ष के लक्ष्यों से ही खास तौर से परिभाषित किया जाना चाहिए। यह सवाल अटल बिहारी वाजपेयी ने भी तब उठाया था, जब जनवरी 2002 में ऑपरेशन पराक्रम के तहत सीमाओं पर सेना की तैनाती अपने चरम पर थी। देश का मिजाज पूरी तरह गरम था और वह आर-पार की लड़ाई की मांग कर रहा था। युद्ध पूरी तरह से राजनीतिक विषय होता है। यह न तो भावनात्मक मामला होता है, और न ही शुद्ध रूप से सैन्य मामला। लक्ष्यों की स्पष्टता न होने के कारण भारत ऑपरेशन पराक्रम में उलझकर रह गया था; सेना को पूरी तरह तैनात कर दिया गया था और वह दस महीने तक डटी रही। अंततः, बिना कुछ किए, थककर वह छावनियों में लौट गई। क्या भारत ने तब एक मौका गंवा दिया था? 1999 और 1971 में हमने स्पष्ट लक्ष्य तय किए थे- कारगिल में पाकिस्तानी कब्जे वाले क्षेत्र को मुक्त कराना और बांग्लादेश को आजाद कराना। 1999 में लड़ाई को एलओसी से आगे बढ़ाने का सेना की ओर से जो दबाव था, उसके आगे वाजपेयी झुके नहीं। 1971 में पाकिस्तान ने पूर्व में आत्मसमर्पण कर दिया तो इंदिरा गांधी ने पश्चिमी सेक्टर में तुरंत युद्धविराम की पेशकश कर दी थी। कुछ हलकों में यह शाश्वत बहस और अफसोस जारी है कि इंदिरा ने पश्चिमी सेक्टर में ‘काम’ तमाम नहीं किया। लेकिन उनके सामने लक्ष्य स्पष्ट थे और उन्होंने 13 दिन की लड़ाई के बाद जीत का ऐलान कर दिया। युद्ध ऐसा गंभीर मामला है, जिसे फौजी जनरलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। यह फैसला राजनेताओं पर छोड़ देना चाहिए, जो बड़ी तस्वीर पर नजर रखते हैं। युद्ध कब शुरू करना है यह जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह जानना है कि उसे कब और किस तरह समाप्त करना है। युद्ध एक ऐसा गंभीर मामला है, जिसे महज फौजी जनरलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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शेखर गुप्ता का कॉलम: युद्ध में अपने लक्ष्यों का स्पष्ट होना सबसे जरूरी होता है

