लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम: पाक खुद ही आतंक की जड़ को खत्म नहीं करना चाहता Politics & News

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पाकिस्तान एक बार फिर अंदरूनी उथलपुथल के दौर में प्रवेश करता दिख रहा है। यों यह अतीत के परिचित पैटर्न को ही दोहराता है, लेकिन इस बार यह हमारे लिए कहीं कठिन क्षेत्रीय व आर्थिक परिस्थितियों के दौरान सामने आ रहा है। बीते दिनों बलूच विद्रोहियों और इस्लामवादी उग्रवादियों से जुड़े टकरावों में बड़ी संख्या में मौतें हुई हैं और सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचा है। इस तरह की घटनाएं अलग-थलग नहीं हैं। एक ओर, बलूच लिबरेशन आर्मी ने बलूचिस्तान में पाकिस्तान सेना के साथ सीधे संघर्षों के जरिये अपने विद्रोही अभियान को फिर से तेज किया है। दूसरी ओर, हरनाई और पंजगुर में हालिया सैन्य छापे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के नेटवर्क के खिलाफ प्रतीत होते हैं। दोहरे मोर्चे की यह आंतरिक चुनौती- अलगाववादी विद्रोह और वैचारिक आतंकवाद- वैसी ही है, जिसने अतीत में भी पाकिस्तान को मुश्किल में डाला है। पाकिस्तान सेना की तैनाती अभी ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब जैसे स्तर तक नहीं पहुंची है, लेकिन अतीत का अनुभव बताता है कि लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष अकसर उसी दिशा में धकेल देता है। बड़े पैमाने पर फौजों की आंतरिक तैनाती अपने साथ जोखिम भी लाती है- जैसे नागरिक क्षेत्रों का सैन्यीकरण, राजनीतिक अस्थिरता और बाहरी मोर्चों से सेनाओं को हटाना। 16 दिसंबर 2014 को पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए हमले की स्मृति आज भी पाकिस्तान की रणनीतिक चेतना में गहराई से अंकित है। जिन परिस्थितियों ने उसे जन्म दिया था, उन्हें मूल रूप से आज तक समाप्त नहीं किया गया है। यहीं पाकिस्तान का स्थायी विरोधाभास स्पष्ट होता है। इस्लामवादी आतंकवाद को अब भी एक सुरक्षागत समस्या के रूप में देखा जाता है, न कि एक वैचारिक समस्या के रूप में। कट्टरपंथीकरण के नेटवर्क को तोड़ने, धार्मिक विमर्श में सुधार लाने या समाज के भीतर चरमपंथी नैरेटिव को चुनौती देने के लिए कोई सतत प्रयास नहीं किया गया है। वहीं बलूच विद्रोह का सामना लगभग पूरी तरह बल प्रयोग के जरिये ही किया जा रहा है। ये दो बिलकुल अलग प्रकार के संघर्ष हैं, लेकिन पाकिस्तान दोनों से एक ही घिसे-पिटे तरीके से निपट रहा है। क्षेत्रीय आयाम इस समस्या को और जटिल बना देता है। आज का अफगानिस्तान केवल पाकिस्तान का पड़ोसी नहीं, बल्कि ऐसा क्षेत्र है जहां से पाकिस्तान को कमजोर करने वाली गतिविधिया संभव हैं। काबुल पर पाकिस्तान का प्रभाव अपेक्षा से कहीं कमजोर साबित हुआ है। अमेरिका- जो अब फिर से पाकिस्तान का सहयोगी बन गया है- ने दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई। सऊदी अरब, तुर्किये और अन्य प्रभावशाली इस्लामी देशों ने भी पाकिस्तान में कट्टरपंथ का मुकाबला करने के लिए धार्मिक या वैचारिक पहल करने में बहुत कम रुचि दिखाई है। पाकिस्तान आतंकवाद से इसलिए प्रभावित नहीं है कि उसके पास सैन्य क्षमता की कमी है, बल्कि इसलिए है क्योंकि उसने उन वैचारिक, राजनीतिक और क्षेत्रीय विरोधाभासों को कभी सुलझाया ही नहीं, जो हिंसा को बनाए रखते हैं। लेकिन यह हम जैसे पड़ोसियों के लिए चिंता की बात होनी चाहिए। क्योंकि इतिहास बताता है कि जब-जब पाकिस्तान का आंतरिक सुरक्षा चक्र हिंसक मोड़ ले लेता है, तो उसके परिणाम उसकी सीमाओं के बाहर तक फैल जाते हैं। जैसा कि अकसर होता आया है, पाकिस्तान हिंसा की इस लहर के लिए किसी बाहरी साजिश को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करेगा, और हमेशा की तरह वह भारत की ओर अंगुली उठाएगा। लेकिन इस तरह के आरोपों से वह सच्चाई से मुंह नहीं फेर सकता। दशकों तक आतंकी गुटों को जम्मू-कश्मीर में इस्तेमाल करने के लिए पालना-पोसना उसके लिए अपने ही पैरों पर​ कुल्हाड़ी मारना साबित हो सकता है। आतंकी इको-सिस्टम अपने लिए तय सीमाओं तक सीमित नहीं रहते। एक नीतिगत औजार के रूप में हिंसा को सामान्य बना देने की प्रक्रिया से समाज भी प्रभावित होता है, जिसमें धार्मिक, जातीय या राजनीतिक- हर तरह के कारणों के लिए बल प्रयोग को जायज ठहराया जाने लगता है। जब तक इसके खिलाफ संगठित सामाजिक प्रतिरोध नहीं होता, तब तक सार्थक बदलाव की संभावना कम है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम: पाक खुद ही आतंक की जड़ को खत्म नहीं करना चाहता