पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: आश्रम किसी गतिविधि के नहीं, ऊर्जा के केंद्र होते हैं Politics & News

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29 मिनट पहले

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पं. विजयशंकर मेहता

हम मनुष्यों के जीवन में तीन जगहें ऐसी हैं, जहां हमारा आना-जाना-रहना बना ही रहता है। घर हमारा आसरा है, दफ्तर हमारा कार्यस्थल, और बाजार। लेकिन एक चौथी जगह भी तुलसीदास जी ने बताई है। पक्षीराज गरुड़ ने काकभुशुंडि जी के पास पहुंचकर कहा- यहां आते ही मेरे सब काम हो गए।

देखि परम पावन तव आश्रम, गयउ मोह संसय नाना भ्रम। आपका परम पवित्र आश्रम देखकर ही मेरा मोह, संदेह और अनेक प्रकार के भ्रम- सब जाते रहे। तो चौथी जगह आश्रम है, जिसमें मंदिर समाया हुआ रहता है। गरुड़ जी कहते हैं कि मेरा मोह, संदेह और भ्रम तीनों मिट गए।

घर में हमको मोह पैदा होता है, दफ्तर में हम संदेह से गुजरते हैं और बाजार तो भ्रम पैदा करते ही हैं। इन तीनों को मिटाने के लिए हमें प्रतिदिन किसी न किसी आश्रम, या कहें मंदिर आते-जाते रहना चाहिए। ये किसी गतिविधि के केंद्र नहीं होते, ये ऊर्जा के केंद्र होते हैं। आश्रम पद्धति भारतीय ऋषि-मुनियों की मौलिक गतिविधि है, जिससे हम आज भी जुड़े रहें तो हमें लाभ मिलेगा।

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