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- N. Raghuraman’s Column Maximize The Use Of AI For The Greater Good Of Society
27 मिनट पहले
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एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में मदारीहाट-नागराकाटा सेक्शन के बीच करीब 52 किलोमीटर में फैली एक जगह है– बिन्नागुड़ी। यह इलाका हाथियों की सघन आबादी के लिए जाना जाता है, जो चपरामारी और गोरुमारा के जंगलों के बीच घूमते हैं और अकसर सीजनल मूवमेंट और चाय बागानों तक जाने के लिए रेलवे ट्रैक पार करते हैं। यह इकलौता ऐसा इलाका नहीं, बल्कि पूर्वी भारत में ऐसी कई जगहें हैं।
असम के होजाई जिले में 20 दिसंबर 2025 को सरांग–नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस से टकराकर आठ हाथियों की मौत हो गई और इसी के साथ रेलवे ट्रैकों पर मारे गए हाथियों की संख्या 90 तक पहुंच गई। लोको पायलटों को इस बारे में पता है और वे ट्रेनों की गति 50 किमी प्रति घंटा ही रखते हैं, लेकिन यह हादसे रोकने के लिए पर्याप्त नहीं।
अब एआई की मदद से एक नई पहल ऐसे हादसे रोक सकती है। जिन चार रेलवे कॉरिडोरों में डिटेक्शन सिस्टम शुरू हुआ है, उनमें बजर के जरिए स्टेशन सुपरिंटेंडेंट को अलर्ट किया जाता है। वह तत्काल लोको पायलट को गति 25 किमी प्रति घंटा करने लिए सावचेत करता है। इतनी कम गति पर ट्रेन को कहीं जल्दी रोका जा सकता है। एआई महज हादसों से ही नहीं बचा रहा, बल्कि मानव और अन्य प्राणियों के जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर कर रहा है। कुछ उदाहरण यहां पेश हैं।
डायबिटीज स्क्रीनिंग बेहतर करने में एआई ने मदद की है। येनेपोया (डीम्ड-टू-बी) यूनिवर्सिटी, चेन्नई के मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन और अटलांटा की एमोरी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक एआई आधारित तरीका विकसित किया है। इसमें डायबिटीज से जुड़े रक्तवाहिकाओं के बदलाव को जानने के लिए रेटीना की हाई रेजोल्यूशन इमेजेज इस्तेमाल होती हैं। इसमें उंगली से खून लेने का झंझट नहीं होता और एक्यूरेसी भी अधिक होती है।
‘डायबिटीज टेक्नोलॉजी एंड थेरैप्युटिक्स’ में प्रकाशित इस शोध के नतीजे रेटीना की उस अनोखी क्षमता पर आधारित है, जिसके जरिए नॉन–इन्वेसिव तरीके से जिंदा रक्तवाहिकाओं को देखा जा सकता है। भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोगों को डायबिटीज है और हमें नहीं पता कि इनमें से कितने शुगर लेवल जांचने के लिए रोज खुद को सुई चुभोते हैं। एआई आधारित ऐसे आविष्कार यकीनन इस आबादी का जीवन बेहतर कर सकते हैं।
ट्रैफिक प्रबंधन का एक और उदाहरण देखिए। बढ़ते वाहनों और लगातार जारी हो रहे ड्राइविंग लाइसेंसों के कारण इस क्षेत्र के हालात बदतर होते जा रहे हैं। इस पर लगाम कसने और नए ड्राइवरों में यातायात संकेतकों और नियमों के प्रति जागरूकता परखने के लिए आईआईटी मद्रास के सेंटर फॉर एक्सीलेंस ऑन रोड सेफ्टी (सीओईआरएस) ने एआई आधारित लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम बनाया है।
‘थिन्नएआई’ नामक इस सिस्टम में वीडियो गेम जैसे मॉड्यूल के जरिए कई स्तरों के टेस्ट होंगे। यह अभी मूल्यांकन के चरण में है। मंजूरी मिलते ही इसे लर्नर लाइसेंस जारी करने में इस्तेमाल किया जा सकता है। एआई एक स्पेशलाइज्ड टूल से आगे बढ़ कर इंसानों के लिए बुनियादी ढांचे जैसा बन रहा है। विविध क्षेत्रों की जटिल समस्याओं के समाधान दे रहा है।
उम्मीद है कि 2026 के अंत तक एआई दिखावटी और नई-नई एप्लिकेशनों के बजाय रोजमर्रा की जिंदगी और उद्योगों में अधिक गहराई से जुड़ी, संरचनात्मक और ‘साइलेंट’ तकनीक बन जाएगा। हैल्थकेयर में इसके एल्गोरिदम मेडिकल स्कैन और डेटा का विश्लेषण इंसानी विशेषज्ञों से ज्यादा सटीक कर सकते हैं। इससे डायग्नोस्टिक तेज होता है। यह नई दवाओं की खोज तेज कर सकता है।
बढ़ते न्यूक्लियर परिवारों और रिश्तेदारों की कमी के दौर में एआई आधारित टेलीमेडिसिन, चैटबॉट और वियरेबल तकनीक दूरस्थ इलाकों में मरीजों को एक्सपर्ट केयर से जोड़ रहे हैं। कृषि, खाद्य सुरक्षा, फसल प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन से निपटने और टिकाऊ विकास भी ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें एआई इंसानी जीवन बेहतर कर सकता है।
एआई–ड्रिवन एडैप्टिव लर्निंग प्लेटफॉर्म विद्यार्थी विशेष की जरूरत के अनुसार कॉन्टेंट तैयार कर सकते हैं। सरकारी योजनाओं में प्रोसेसिंग समय घटा कर लोकसेवाओं की कार्यक्षमता बढ़ा सकता है। हैकिंग के प्रयासों से निपटने के लिए एआई विसंगतियों और खतरों को रियल–टाइम में डिटैक्ट कर सकता है, जिन्हें पारंपरिक सिस्टम पकड़ नहीं पाते।
फंडा यह है कि 2026 में समाज की व्यापक भलाई के लिए हम इंसानों को एआई का अधिकतम इस्तेमाल करना चाहिए।
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एन. रघुरामन का कॉलम: समाज की व्यापक भलाई के लिए एआई का अधिकतम इस्तेमाल करें

