मोहम्मद जमशेद का कॉलम: विकास पटरी पर रहे, इसका दारोमदार रेल के पहियों पर Politics & News

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रेल बजट को केंद्रीय बजट के साथ मिलाकर पेश करने का यह दसवां वर्ष होगा। इस कालखंड में देश में हुए विकास ने न सिर्फ जीडीपी में बढ़ोतरी की, बल्कि तमाम आर्थिक गतिविधियों में इसका असर दिखा। उद्योग, व्यापार और कृषि की जरूरतों को पूरी करने के लिए रेलवे को भी तेज गति से बढ़ना होगा। 2016 तक हर वर्ष रेल बजट के बाद अखबारों में ‘सौगातों’ को लेकर विशेष परिशिष्ट छपते थे। रेल बजट में रेल मंत्रालय की मौजूदा वर्ष की कार्य योजनाओं, प्रतिबद्धताओं और उसके प्रदर्शन का लेखा-जोखा होता था। 25 फरवरी 2016 को रेल मंत्री द्वारा अंतिम स्वतंत्र रेल बजट पेश किया गया था। इसके अगले वर्ष पहले संयुक्त बजट भाषण में वित्त मंत्री ने कहा कि ‘हमने 1924 से चली आ रही औपनिवेशिक परंपरा समाप्त कर दी है। यह निर्णय रेलवे को सरकार की वित्तीय नीति के केंद्र में लाता है।’ अब ‘रेल बजट’ की जगह ‘बजट में रेलवे’ ने ले ली थी। रेल बजट का केंद्रीय बजट में विलय सरकार के सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक माना जा सकता है। इसने रेलवे के वित्त और बुनियादी ढांचा प्रबंधन का तरीका बदला। लोक-लुभावन घोषणाओं के बजाय रेल बजट बुनियादी ढांचा विकास, वित्त प्रबंधन और समन्वित व्यवसाय के दृष्टिकोण की ओर आगे बढ़ा। 2014-2024 के दशक में कई अन्य सुधारों के साथ ही वर्षों से उपेक्षित रेलवे बुनियादी ढांचे में सरकारी खजाने से बहुतायत में पैसा दिया गया। 2004-2014 के दशक से 2014-2024 के दशक की तुलना करें तो कोविड के बावजूद रेलवे का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा। 2014-24 तक कुल माल ढुलाई लगभग 12600 मिलियन टन रही, जबकि इससे पहले के दशक में यह 8400 मिलियन टन थी। सकल बजटीय सहायता (जीबीएस) लगभग 8 लाख करोड़ रुपए तक पहुंची, जबकि पहले 1.56 लाख करोड़ रुपए थी। रेलवे का राजस्व 18.5 लाख करोड़ रुपए हुआ, जो पहले 8.6 लाख करोड़ रुपए था। पूंजीगत खर्च में बढ़ोतरी से नई लाइनों, विद्युतीकरण, नए रोलिंग स्टॉक शामिल करने और सुरक्षा कार्यों में उपलब्धियां हासिल हुईं। 2024-25 के बजट में बुनियादी ढांचा विकास के लिए आवंटित 11.11 लाख करोड़ रुपए में से रेलवे को 2.52 लाख करोड़ मिले। 2025-26 के बजट में भी इतनी ही राशि मिली। अब भविष्य के आवंटन महज सेक्टर की जरूरतों ही नहीं, आवंटित राशि के उपयोग पर भी निर्भर करेंगे। यात्री सेवाओं से रेलवे को अपने राजस्व की महज एक-तिहाई आय ही होती है। दो-तिहाई राजस्व माल ढुलाई से आता है। कम दरों पर यात्री सेवा देने से रेलवे को सालाना 60 हजार करोड़ से अधिक का नुकसान होता है। इसकी भरपाई माल ढुलाई से की जाती है, जिसे क्रॉस सब्सिडाइजेशन कहते हैं। 2024-25 में यात्री सेवाओं से आय के 80 हजार करोड़ रुपए के बजटीय अनुमानों की तुलना में वास्तविक आय 75 हजार करोड़ रुपए ही हुई। माल ढुलाई से भी 1.80 लाख करोड़ रुपए की तुलना में लगभग 1.71 लाख करोड़ रुपए ही मिले। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए यात्री सेवाओं से आय का लक्ष्य 92800 करोड़ रुपए रखा गया है। नवंबर के अंत तक लगभग 52 हजार करोड़ रुपए कमाई हो चुकी। लक्ष्य पाने के लिए रेलवे को दो बार किराया भी बढ़ाना पड़ा, लेकिन रुझान बताते हैं कि अब भी शायद इतनी कमाई न हो पाए। इसे पाने के लिए पिछले वर्ष की वास्तविक आय से करीब 17 हजार करोड़ रुपए अधिक चाहिए। रेल बजट के मर्जर के बाद आ रहे इस दसवें बजट में रेलवे के भविष्य की स्पष्ट दिशा तय होनी चाहिए। किराए-भाड़े के ढांचे को तर्कसंगत बनाने और वेतन-पेंशन की देनदारियों से निपटने के लिए रेल टैरिफ रेगुलेटरी अथॉरिटी स्थापित करना जरूरी है। भारतीय रेलवे आज भी देश की जीवनरेखा है। यह देश को एक करती है। समय आ गया है कि इसे न केवल विश्वस्तरीय रेलवे, बल्कि सुरक्षित, किफायती और दक्षतापूर्ण परिवहन प्रणाली में बदला जाना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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