Chandigarh News: आयुष्मान–हिमकेयर–जेएसएसके घोटाले पर मंत्रालय सख्त, पीजीआई से रिपोर्ट तलब Chandigarh News Updates

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चंडीगढ़। पीजीआई के आयुष्मान भारत, हिमकेयर और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके) से जुड़े करोड़ों के घोटाले का मामला गृह मंत्रालय पहुंच गया है। विजिलेंस जांच रिपोर्ट में सामने आए चौंकाने वाले खुलासों के बाद गृह मंत्रालय ने पूरे मामले को संज्ञान में लेते हुए पीजीआई प्रशासन से दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ अब तक की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। इसके साथ सीबीआई जांच की तैयारी भी शुरू कर दी गई है।

सूत्रों के अनुसार मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद पीजीआई प्रशासन और सीधे तौर पर जांच के दायरे में आए अधिकारियों-कर्मचारियों में हड़कंप मचा हुआ है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि विजिलेंस रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मामला केवल दस्तावेज चोरी का नहीं बल्कि संस्थान के भीतर बैठे जिम्मेदार लोगों की मिलीभगत का नतीजा है।

364 बंडल, 15 करोड़ का रिकॉर्ड गायब

विवाद का केंद्र पीजीआई के सेंट्रल स्टोर से आयुष्मान भारत, हिमकेयर और जेएसएसके सहित सरकारी योजनाओं से जुड़े करीब 15 करोड़ रुपये के 364 बंडल बिल और इंडेंट दस्तावेजों का रहस्यमय ढंग से गायब होना है। 24 मार्च 2025 को दोपहर में इस गड़बड़ी का खुलासा हुआ था। विजिलेंस जांच ने इसे साधारण चोरी मानने से साफ इन्कार किया है। रिपोर्ट के मुताबिक जिन कमरों से दस्तावेज गायब हुए, वहां न तो ताले टूटे मिले, न खिड़कियों में कोई सेंध और न ही जबरन घुसपैठ के संकेत। यह तथ्य जांच एजेंसियों के लिए सबसे बड़ा रेड फ्लैग बन गया।

सीसीटीवी फुटेज ने खोली परतें

जांच का दायरा बढ़ने पर सीसीटीवी फुटेज ने मामले को और संदिग्ध बना दिया। 23 और 24 मार्च की रिकॉर्डिंग में एक व्यक्ति को बिल सेक्शन के पीछे से बोरेनुमा वस्तु दीवार के बाहर फेंकते और फिर खुद कूदते हुए देखा गया। मौके के पास ईंट और पेड़ का ठूंठ भी मिला जिससे दीवार पार करने की आशंका को बल मिला। इसके बावजूद विजिलेंस रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि बिना अंदरूनी जानकारी और पहुंच के इतनी बड़ी मात्रा में दस्तावेज हटाना संभव नहीं।

आउटसोर्स स्टाफ की भूमिका पर सवाल

सबसे गंभीर खुलासा यह हुआ कि 19 मार्च को अकाउंट्स ब्रांच से लौटने के बाद ये बिल दो दिन तक खुले में पड़े रहे। इस दौरान सेंट्रल स्टोर में फार्मासिस्ट, आउटसोर्स कर्मचारी और अधिकारी आते-जाते रहे लेकिन किसी ने भी सुरक्षित कस्टडी सुनिश्चित नहीं की। जांच में सामने आया कि बिल सेक्शन की चाबियों तक आउटसोर्स स्टाफ की पहुंच थी। यही नहीं, बिलों का सॉफ्ट डेटा और विवरण तैयार करने का काम भी आउटसोर्स फार्मासिस्ट और अमृत फार्मेसी से जुड़े कर्मचारियों से कराया जा रहा था। विजिलेंस रिपोर्ट में इस आशंका से इन्कार नहीं किया गया है कि जिन बिलों के आधार पर अमृत फार्मेसी को लगभग 15 करोड़ रुपये का एडवांस भुगतान किया गया, उन्हीं बिलों के गायब होने से डुप्लीकेट या बढ़े हुए क्लेम छिपाए जा सकते थे।

स्वतंत्र ऑडिट ने भी उठाए सवाल

डायरेक्टर की ओर से गठित स्वतंत्र ऑडिट कमेटी भी अपनी रिपोर्ट में मान चुकी है कि सभी मामलों की पूरी जांच संभव नहीं हो पाई। कई विभागों से मूल इंडेंट बुक उपलब्ध नहीं थीं जिससे केवल करीब 70 प्रतिशत मामलों का ही क्रॉस-वेरिफिकेशन हो सका। विजिलेंस सेल ने पूरे प्रकरण को संस्थान की संपत्ति और दस्तावेजों के जानबूझकर उन्मूलन की श्रेणी में रखते हुए कड़े कदम उठाने की सिफारिश की है। इसमें दोषी अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई, आउटसोर्स स्टाफ की भूमिका सीमित करने, सुरक्षा ऑडिट और पूरी तरह ऑनलाइन, टैंपर-प्रूफ बिलिंग सिस्टम लागू करने की बात शामिल है। मंत्रालय के रुख को देखते हुए अब आने वाले दिनों में पीजीआई पर कानूनी शिकंजा और कसना तय माना जा रहा है।

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Chandigarh News: आयुष्मान–हिमकेयर–जेएसएसके घोटाले पर मंत्रालय सख्त, पीजीआई से रिपोर्ट तलब