लक्जरी-प्रीमियम नहीं ऐसे होंगे जेन-Z के घर, देश के 3 शहरों में उभर रहा नया ट्रेंड, तस्वीरों में देखें ग्रीन होम्स Haryana News & Updates

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Green homes in India: भारत के रियल एस्टेट बाजार में बड़ा बदलाव दिखाई देने जा रहा है. लग्जरी, प्रीमियम घर अब बीते दिनों की बात हो जाएगी. अब जेन की पहली पसंद बन चुके ग्रीन होम्स का जमाना आ गया है. ये घर सिर्फ रहने के लिए बेहतर माहौल ही नहीं देते बल्कि जलवायु और वातावरण को संतुलित रखने में भी सहयोग देते हैं. भारत में जेन-Z और मिलेनियल्स की मांग पर बेंगलुरू, पुणे, सूरत जैसे बड़े शहरों में ग्रीन होम्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, जो ऊर्जा और पानी बचत में अग्रणी हैं. आइए जानते हैं इनके बारे में…

लग्जरी, अल्ट्रा लग्जरी, प्रीमियम और सुपर लग्जरी घर अब रियल एस्टेट का पुराना ट्रेंड हो गया है. जेन-Z की सोच इससे भी कई कदम आगे पहुंच गई है. यह जमाना ग्रीन होम्स का है जो फ्यूचर होम्स के रूप में काफी पॉपुलर हो रहे हैं. फिलहाल इन घरों का निर्माण भारत के कुछ प्रमुख बड़े शहरों में ही हो रहा है. हालांकि इनको पसंद करने वाले भले ही नए जमाने के युवा हों, लेकिन आप भी इन घरों की की सुविधाएं जानें और तस्वीरें देखेंगे तो वाह कहे बिना नहीं रह पाएंगे.

जेन जी की खास बात है कि वे लोकेशन और कीमत से ज्यादा फ्यूचर रेडी और फ्यूचर सेवी घरों की डिमांड कर रहे हैं. यही वजह है कि बढ़ते जलवायु जोखिम, पानी की कमी और ऊर्जा लागत को ध्यान में रखकर ग्रीन डेवलपमेंट पर फोकस किया जा रहा है. रियल एस्टेट इंडस्ट्री डेटा के अनुसार, भारत में अब तक 9.7 बिलियन वर्ग फुट से अधिक ग्रीन बिल्डिंग स्पेस विकसित किया जा चुका है. आइए जानते हैं क्या होते हैं ये ग्रीन होम्स और इन्हें फ्यूचर होम्स क्यों कहा जा रहा है?

जेन जी की खास बात है कि वे लोकेशन और कीमत से ज्यादा फ्यूचर रेडी और फ्यूचर सेवी घरों की डिमांड कर रहे हैं. यही वजह है कि बढ़ते जलवायु जोखिम, पानी की कमी और ऊर्जा लागत को ध्यान में रखकर ग्रीन डेवलपमेंट पर फोकस किया जा रहा है. रियल एस्टेट इंडस्ट्री डेटा के अनुसार, भारत में अब तक 9.7 बिलियन वर्ग फुट से अधिक ग्रीन बिल्डिंग स्पेस विकसित किया जा चुका है. आइए जानते हैं क्या होते हैं ये ग्रीन होम्स और इन्हें फ्यूचर होम्स क्यों कहा जा रहा है?

हार्मनी इंफ्रा वेंचर्स के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर एचएस कंधारी बताते हैं कि ग्रीन होम्स को बनाने में पारंपरिक घरों के मुकाबले 40–50 फीसदी तक ऊर्जा की बचत और 30–35% तक पानी की खपत में कमी दर्ज की गई है. यह सस्टेनेबिलिटी न सिर्फ पर्यावरण के लिए, बल्कि ऑपरेशनल लागत और उपभोक्ता खर्च के लिहाज से भी व्यावहारिक है. ये ऐसे घर होते हैं जहां आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित, स्वस्थ और संतुलित जीवन जी सकें. बदलते मौसम, पानी की कमी और बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सके. ऐसे में ग्रीन ही नया कंक्रीट है.

हार्मनी इंफ्रा वेंचर्स के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर एचएस कंधारी बताते हैं कि ग्रीन होम्स को बनाने में पारंपरिक घरों के मुकाबले 40–50 फीसदी तक ऊर्जा की बचत और 30–35% तक पानी की खपत में कमी दर्ज की गई है. यह सस्टेनेबिलिटी न सिर्फ पर्यावरण के लिए, बल्कि ऑपरेशनल लागत और उपभोक्ता खर्च के लिहाज से भी व्यावहारिक है. ये ऐसे घर होते हैं जहां आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित, स्वस्थ और संतुलित जीवन जी सकें. बदलते मौसम, पानी की कमी और बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सके. ऐसे में ग्रीन ही नया कंक्रीट है.

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ग्रीन होम्स एक तरह का नेट जीरो कॉन्सेप्ट है जहां किसी प्रोजेक्ट की कुल ऊर्जा खपत को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन या संतुलन के माध्यम से बराबर किया जाता है. अब रेजिडेंशियल और कमर्शियल दोनों सेगमेंट में यह तेजी से अपनाया जा रहा है. इसमें सोलर रूफटॉप, ऊर्जा-सेवी डिजाइन, स्मार्ट लाइटिंग और प्राकृतिक वेंटिलेशन जैसी सुविधाएं बनाई जाती हैं ताकि कार्बन फुटप्रिंट घटाया जा सके. साथ ही घर खरीदने वालों के मासिक बिजली खर्च में भी 25–40 फीसदी तक की कमी लाई जा सके.

ग्रीन होम्स एक तरह का नेट जीरो कॉन्सेप्ट है जहां किसी प्रोजेक्ट की कुल ऊर्जा खपत को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन या संतुलन के माध्यम से बराबर किया जाता है. अब रेजिडेंशियल और कमर्शियल दोनों सेगमेंट में यह तेजी से अपनाया जा रहा है. इसमें सोलर रूफटॉप, ऊर्जा-सेवी डिजाइन, स्मार्ट लाइटिंग और प्राकृतिक वेंटिलेशन जैसी सुविधाएं बनाई जाती हैं ताकि कार्बन फुटप्रिंट घटाया जा सके. साथ ही घर खरीदने वालों के मासिक बिजली खर्च में भी 25–40 फीसदी तक की कमी लाई जा सके.

लोहिया वर्ल्डस्पेस के डायरेक्टर पीयूष लोहिया बताते हैं कि ग्रीन होम्स पानी की बढ़ती कमी के समाधान के रूप में आगे बढ़ रहे हैं. हालिया आंकड़ों के अनुसार, ग्रीन बिल्डिंग्स के माध्यम से देशभर में सालाना करीब 199 अरब लीटर पानी की बचत हो रही है. वहीं ग्रीन होम्स में अगर पानी की बचत के समाधानों और रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को प्रभावी बना दिया जाए तो न केवल एक घर के तौर पर बल्कि शहरी जल संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.हालांकि देखा गया है कि सस्टेनिबिलिटी सिर्फ डिजाइन नहीं बल्कि निरंतर प्रबंधन की भी मांग करती है और ग्रीन होम्स इसका विकल्प हो सकते हैं.

लोहिया वर्ल्डस्पेस के डायरेक्टर पीयूष लोहिया बताते हैं कि ग्रीन होम्स पानी की बढ़ती कमी के समाधान के रूप में आगे बढ़ रहे हैं. हालिया आंकड़ों के अनुसार, ग्रीन बिल्डिंग्स के माध्यम से देशभर में सालाना करीब 199 अरब लीटर पानी की बचत हो रही है. वहीं ग्रीन होम्स में अगर पानी की बचत के समाधानों और रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को प्रभावी बना दिया जाए तो न केवल एक घर के तौर पर बल्कि शहरी जल संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.हालांकि देखा गया है कि सस्टेनिबिलिटी सिर्फ डिजाइन नहीं बल्कि निरंतर प्रबंधन की भी मांग करती है और ग्रीन होम्स इसका विकल्प हो सकते हैं.

आरटीसीपीएल के सीआओ प्रभाकर कुमार कहते हैं कि इंडस्ट्री में लंबे समय से यह धारणा रही है कि ग्रीन फीचर्स परियोजनाओं की लागत बढ़ाते हैं लेकिन व्यवहारिक आंकड़े इसके विपरीत तस्वीर पेश कर रहे हैं. ऊर्जा-कुशल सिस्टम और जल प्रबंधन के लिए किया गया शुरुआती निवेश 5–7 वर्षों में लागत की भरपाई कर देता है. इसके बाद उपयोगकर्ताओं को शुद्ध बचत मिलती है. यही वजह है कि सस्टेनेबल और नेट-जीरो प्रोजेक्ट्स को बाजार में बेहतर रिस्पॉन्स और प्रीमियम वैल्यू मिल रही है.

आरटीसीपीएल के सीआओ प्रभाकर कुमार कहते हैं कि इंडस्ट्री में लंबे समय से यह धारणा रही है कि ग्रीन फीचर्स परियोजनाओं की लागत बढ़ाते हैं लेकिन व्यवहारिक आंकड़े इसके विपरीत तस्वीर पेश कर रहे हैं. ऊर्जा-कुशल सिस्टम और जल प्रबंधन के लिए किया गया शुरुआती निवेश 5–7 वर्षों में लागत की भरपाई कर देता है. इसके बाद उपयोगकर्ताओं को शुद्ध बचत मिलती है. यही वजह है कि सस्टेनेबल और नेट-जीरो प्रोजेक्ट्स को बाजार में बेहतर रिस्पॉन्स और प्रीमियम वैल्यू मिल रही है.

साल 2025 में भारतीय रियल एस्टेट सेक्टर में ग्रीन होम्स के निवेश में करीब 29% की वृद्धि दर्ज की गई है. विश्लेषकों की मानें तो इनका बड़ा हिस्सा ग्रीन सर्टिफिकेशन, ऊर्जा दक्षता और भविष्य-सुरक्षित डिजाइन की ओर जा रहा है. मिलेनियल्स और जेन जी को समझ आ चुका है कि टिकाऊ निर्माण ही असली विकास है जो प्रोजेक्ट आज ऊर्जा और पानी बचाते हैं, वही कल मूल्य, स्थिरता और विश्वास पैदा करेंगे. ऐसे में ग्रीन कंक्रीट का वर्चस्व अब तेजी से बढ़ने लगा है.

साल 2025 में भारतीय रियल एस्टेट सेक्टर में ग्रीन होम्स के निवेश में करीब 29% की वृद्धि दर्ज की गई है. विश्लेषकों की मानें तो इनका बड़ा हिस्सा ग्रीन सर्टिफिकेशन, ऊर्जा दक्षता और भविष्य-सुरक्षित डिजाइन की ओर जा रहा है. मिलेनियल्स और जेन जी को समझ आ चुका है कि टिकाऊ निर्माण ही असली विकास है जो प्रोजेक्ट आज ऊर्जा और पानी बचाते हैं, वही कल मूल्य, स्थिरता और विश्वास पैदा करेंगे. ऐसे में ग्रीन कंक्रीट का वर्चस्व अब तेजी से बढ़ने लगा है.

रियल एस्टेट डेटा बताता है कि भारत के 3 बड़े शहर आज ग्रीन होम्स में काफी बेहतर काम कर रहे हैं. इनमें कर्नाटक राज्य में बेंगलुरू, महाराष्ट में पुणे और गुजरात में सूरत शामिल हैं. जैसा ट्रेंड चल रहा है उस हिसाब से जल्द ही इसके दिल्ली-एनसीआर सहित देश के अन्य हिस्सों में भी पहुंचने की संभावना है. ये ग्रीन होम्स सिर्फ देखने में ग्रीन नहीं होते बल्कि ग्रीनरी से भरपूर और इको-सिस्टम के अनुकूल होते हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.

रियल एस्टेट डेटा बताता है कि भारत के 3 बड़े शहर आज ग्रीन होम्स में काफी बेहतर काम कर रहे हैं. इनमें कर्नाटक राज्य में बेंगलुरू, महाराष्ट में पुणे और गुजरात में सूरत शामिल हैं. जैसा ट्रेंड चल रहा है उस हिसाब से जल्द ही इसके दिल्ली-एनसीआर सहित देश के अन्य हिस्सों में भी पहुंचने की संभावना है. ये ग्रीन होम्स सिर्फ देखने में ग्रीन नहीं होते बल्कि ग्रीनरी से भरपूर और इको-सिस्टम के अनुकूल होते हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.

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