फिजिकल हेल्थ- रोज एक ही समय पर सोएं–जागें: अनियमित नींद से बढ़ता 172 बीमारियों का रिस्क, नींद पर अब तक की सबसे बड़ी स्टडी Health Updates

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कुछ ही क्षण पहले

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साइंस जर्नल ‘हेल्थ डेटा साइंस’ में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, रोज अलग-अलग समय पर सोना शरीर के लिए उतना ही नुकसानदायक है, जितना कम नींद लेना. करीब 7 साल तक चली इस स्टडी में नींद और बीमारियों के बीच गहरा संबंध सामने आया है।

88,461 लोगों पर की गई इस स्टडी में वियरेबल डिवाइस की मदद से सबकी नींद के पैटर्न को ट्रैक किया गया. वियरेबल डिवाइस स्मार्ट वॉच जैसा एक इलेक्ट्रॉनिक गैजेट है, जो टोटल स्लीप टाइम, सोने-जागने का समय, हार्ट रेट और बॉडी की अन्य एक्टिविटीज को ट्रैक करता है.

हेल्थ स्टडी में पता चला कि रोज अलग-अलग समय पर सोने, देर रात तक जागने और इररेगुलर बॉडी क्लॉक से 172 बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है.

इसलिए फिजिकल हेल्थ में आज हम इस स्लीप स्टडी के बारे में बात करेंगे. साथ ही जानेंगे कि-

  • स्लीप पैटर्न बिगड़ने से किन बीमारियों का रिस्क बढ़ता है?
  • स्लीप साइकल कैसे ठीक करें?

एक्सपर्ट: डॉ. नवनीत सूद, सीनियर कंसल्टेंट, पल्मोनोलॉजी, धर्मशिला नारायणा सुपरस्पेशिलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली

सवाल- ‘हेल्थ डेटा साइंस’ में पब्लिश नई ‘स्लीप स्टडी’ क्या कहती है? इसे अब तक की सबसे ऑथेंटिक स्लीप स्टडी क्यों कहा जा रहा है?

जवाब- इस स्टडी से पता चला कि नींद के पैटर्न और बीमारियों के बीच सीधा संबंध है।

ये स्टडी अब तक की सबसे ऑथेंटिक इसलिए मानी जा रही है क्योंकि पहले की ज्यादातर स्टडीज सब्जेक्टिव स्लीप मेजरमेंट पर आधारित थीं, मतलब लोग खुद बताते थे कि वे कितना सोते हैं।

यहां ऑब्जेक्टिव मेजरमेंट से डेटा लिया गया, जो ज्यादा सटीक है. यानी वियरेबल डिवाइस से डेटा ट्रैक किया गया।

साथ ही ये स्टडी यूके बायोबैंक जैसे बड़े डेटाबेस पर आधारित है और नेशनल हेल्थ एंड न्यूट्रिशनल एग्जामिनेशन सर्वे (NHANES) डेटा से भी वैलिडेट की गई है।

सवाल- अनियमित, कम और खराब क्वालिटी की नींद से किन बीमारियों का खतरा कितने गुना बढ़ता है?

जवाब- स्टडी में पाया गया कि अनियमित नींद (रोज अलग-अलग समय पर सोने), 6 घंटे से कम नींद और खराब क्वालिटी की नींद (रात में बार-बार आंख खुलना) या कम एफिशिएंट नींद से कई बीमारियों का खतरा बढ़ता है।

  • कुल 172 बीमारियों का रिस्क बढ़ता है और इनमें से 92 बीमारियां तो सीधे नींद से प्रभावित होती हैं।
  • कम नींद से हार्ट डिजीज, डायबिटीज और ओबेसिटी का रिस्क 1.5 से 2 गुना बढ़ जाता है।
  • पूअर स्लीप से इंफ्लेमेशन बढ़ता है, जो लिवर सिरोसिस का रिस्क 2.57 गुना तक बढ़ा सकता है.

नीचे दिए ग्राफिक से समझिए कि अनियमित नींद से किन बीमारियों का रिस्क कितना गुना बढ़ता है.

सवाल- लिवर, किडनी और हार्ट बॉडी के वाइटल ऑर्गन हैं. पूअर क्वालिटी स्लीप इन्हें डैमेज करती है. क्या इसका अर्थ ये है कि नींद खराब होना एक लाइफ थ्रेटनिंग स्थिति है?

जवाब- हां, पूअर क्वालिटी स्लीप वाकई लाइफ थ्रेटनिंग हो सकती है. स्टडी से पता चला कि खराब नींद से इंफ्लेमेशन बढ़ता है, जो इन ऑर्गन्स की फिल्टरिंग और फंक्शनिंग को बिगाड़ता है।

ये कंडीशन लाइफ थ्रेटनिंग इसलिए है क्योंकि इससे समस्याएं धीरे-धीरे बढ़ती जाती हैं. शुरू में थकान लगती है, लेकिन लंबे समय में ये ऑर्गन फेलियर का कारण बन सकती है. याद रखिए, नींद सिर्फ आराम की चीज नहीं, बल्कि बॉडी की रिपेयर प्रोसेस है. इसे नजरअंदाज करना मतलब खुद की जिंदगी को खतरे में डालने जैसा है।

सवाल- इस स्टडी में अनियमित नींद से क्या आशय है, यह कम नींद से कैसे अलग है?

जवाब- स्टडी में अनियमित नींद का मतलब है स्लीप रिदम का बिगड़ना. मतलब, रोज अलग-अलग समय पर सोने-जागने से बॉडी क्लॉक डिस्टर्ब हो जाती है. बॉडी क्लॉक 24 घंटे की सर्केडियन रिदम पर चलती है. अगर आज 10 बजे सोए, कल 1 बजे तो बॉडी को पता नहीं चलता कि कब रेस्ट मोड में जाना है।

कम नींद सिर्फ नींद के घंटों की कमी है, जैसे रोज 5 घंटे सो रहे हैं. लेकिन अनियमित नींद में नींद के घंटे तो पूरे हो सकते हैं, लेकिन टाइमिंग गड़बड़ होती है.

कम नींद से डायबिटीज या ओबेसिटी बढ़ती है, लेकिन अनियमित से इंफ्लेमेशन और न्यूरोलॉजिकल इश्यूज ज्यादा होते हैं. दोनों ही खराब हैं, लेकिन अनियमित नींद बॉडी के इंटरनल सिस्टम को ज्यादा प्रभावित करती है।

सवाल- क्या अनियमित नींद की आदत कम नींद से ज्यादा खतरनाक है?

जवाब- हां, स्टडी के मुताबिक अनियमित नींद कम नींद से ज्यादा खतरनाक हो सकती है, क्योंकि ये बॉडी के सर्केडियन रिद्म को सीधे प्रभावित करती है. अगर नींद कम मिले तो बॉडी थक जाती है. लेकिन अगले दिन ज्यादा सोकर उस थकान को रिकवर किया जा सकता है।

वहीं अनियमित नींद से हॉर्मोन्स, इम्यूनिटी और मेटाबॉलिज्म का असंतुलन बना रहता है. स्टडी में 172 में से 83 बीमारियां ‘स्लीप रिद्म स्पेसिफिक’ हैं, मतलब सीधे अनियमित नींद से जुड़ी हैं. लिवर सिरोसिस या गैंग्रीन का रिस्क अनियमित स्लीप टाइमिंग से ज्यादा बढ़ता है. कम नींद से रिस्क 1.5-2 गुना होता है, लेकिन अनियमित नींद से 2.5-3.36 गुना तक हो सकता है. इसलिए रोज एक ही समय पर सोना ज्यादा जरूरी है।

सवाल- सोने का समय 30-60 मिनट लेट होने से शरीर पर क्या असर पड़ता है?

जवाब- अगर सोने का समय रोज 30-60 मिनट लेट होता है, तो बॉडी क्लॉक शिफ्ट हो जाती है. स्टडी में पाया गया कि सोने का समय 00:30 के बाद होने से लिवर फाइब्रोसिस का रिस्क 2.57 गुना बढ़ जाता है. इससे मेलाटोनिन हॉर्मोन का प्रोडक्शन गड़बड़ होता है, जो नींद और इम्यूनिटी कंट्रोल करता है।

शरीर में इंफ्लेमेशन बढ़ता है, हार्ट रेट अनस्टेबल होती है और अगले दिन थकान महसूस होती है. लंबे समय में ये डायबिटीज, ओबेसिटी और मेंटल स्ट्रेस बढ़ा सकता है.

सवाल- क्या अनियमित नींद का असर मेंटल हेल्थ पर भी पड़ता है?

जवाब- बिल्कुल, अनियमित नींद मेंटल हेल्थ पर गहरा असर डालती है. स्टडी में पाया गया कि अनियमित नींद से एंग्जाइटी, स्ट्रेस और न्यूरोलॉजिकल इश्यूज बढ़ते हैं।

पार्किंसंस डिजीज का जोखिम 37% तक बढ़ सकता है. खराब नींद से सेरोटोनिन जैसे ब्रेन केमिकल्स असंतुलित होते हैं, जिससे मूड बिगड़ जाता है. रोज अलग समय पर सोने से फोकस कम होता है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है और डिप्रेशन का रिस्क भी बढ़ जाता है. ये फिजिकल और मेंटल हेल्थ दोनों को प्रभावित करती है।

सवाल- क्या रोज एक ही समय पर सोने से बीमारियों का रिस्क कम हो सकता है?

जवाब- हां, इससे सर्केडियन रिद्म मजबूत होता है, जो 172 बीमारियों के रिस्क को काफी कम कर सकता है।

स्टडी में पता चला कि नींद का समय फिक्स होने से से गैंग्रीन का रिस्क कम होता है और रेगुलर स्लीप से लिवर प्रॉब्लम्स कम होती हैं. इससे इंफ्लेमेशन कंट्रोल होता है, इम्यूनिटी बढ़ती है और ऑर्गन्स हेल्दी रहते हैं. ये आसान बदलाव हैं, जो लंबे समय में फायदेमंद साबित होते हैं।

सवाल- स्लीप पैटर्न सुधारने के लिए क्या करें? स्लीप साइकिल कैसे ठीक कर सकते हैं?

जवाब- स्लीप पैटर्न सुधारना आसान है, इसके लिए बस थोड़ा डिसिप्लिन चाहिए. सबसे पहले, रोज एक ही समय पर सोने और जागने का रूटीन बनाएं, जैसे रात 10 बजे सोना और सुबह 6 बजे उठना।

दिन में ज्यादा न सोएं, सिर्फ 20-30 मिनट की नैप लें, वो भी अगर जरूरी हो तो ही लें. शाम को कैफीन या हैवी मील अवॉइड करें. स्क्रीन टाइम कम करें, क्योंकि ब्लू लाइट मेलाटोनिन (नींद के लिए जरूरी हॉर्मोन) ब्लॉक करती है।

अच्छी नींद के लिए ध्यान रखें ये बातें

  • बेडरूम को डार्क, कूल और शांत रखें।
  • रोज एक्सरसाइज करें।
  • अगर नींद न आए तो डीप ब्रीदिंग या मेडिटेशन ट्राई करें।
  • वियरेबल डिवाइस से अपने स्लीप रुटीन को ट्रैक करें।
  • अगर समस्या ज्यादा है तो डॉक्टर से कंसल्ट करें।
  • जरूरत पर CBT (कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी) की हेल्प ले सकते हैं.
  • धीरे-धीरे ये आदत बन जाएगी और बॉडी क्लॉक खुद सेट हो जाएगी।

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