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नई दिल्ली5 मिनट पहले
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EU, भारत के साथ आज होने वाली डील को मदर ऑफ ऑल डील्स’ बता चुका है।
भारत और यूरोपीय यूनियन (EU) के बीच आज फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को लेकर समझौते का ऐलान हो सकता है। EU ने इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ बताया है।
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा इसे लेकर केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से नई दिल्ली में बात करेंगे।
इस FTA का मकसद भारत और EU के बीच व्यापार को आसान बनाना है। इससे व्यापारिक दिक्कतें कम होंगी, स्मॉल-मीडियम रेंज कारोबारियों (MSME) को फायदा मिलेगा, दोनों के मार्केट खोले जाएंगे और GI टैग वाले प्रोडक्ट्स को सुरक्षा दी जाएगी। आसान भाषा में यह व्यापार के लिए टोल-फ्री रास्ता होगा।
जानिए क्यों कहा जा रहा मदर ऑफ आल डील?
- EU दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेड ब्लॉक है और भारत एक बड़ी अर्थव्यवस्था है। दोनों साथ आएंगे तो 200 करोड़ लोगों का बाजार बनेगा और यह डील दुनिया की 25% GDP को कवर करेगी।
- दुनिया अमेरिका और चीन के विकल्प ढूंढ रही है। ऐसे में यह डील भारत को चीन की जगह बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बना सकती है और यूरोप के साथ व्यापार तेजी से बढ़ेगा।
- पिछले साल भारत-EU का व्यापार 12.5 लाख करोड़ रुपए रहा। FTA के बाद दोनों देशों को एक-दूसरे के बाजारों में ज्यादा पहुंच मिलेगी और व्यापार के दोगुना होने की उम्मीद है।

समझौते से भारत को क्या फायदा?
- भारतीय कपड़े, जूते और लेदर प्रोडक्ट्स पर लगने वाली 10% ड्यूटी कम या खत्म हो सकती है। भारतीय गारमेंट, लेदर और फुटवियर सेक्टर को फायदा होगा।
- फ्रांस, जर्मनी जैसे EU देश भारत में डिफेंस फैक्ट्रियां लगा सकते हैं। इससे भारतीय हथियार कंपनियों को EU के डिफेंस फंड्स तक पहुंच मिल सकती है।
- फार्मा और केमिकल सेक्टर में भारत का व्यापार हर साल 20–30% तक बढ़ सकता है, क्योंकि दवाओं की मंजूरी और नियम आसान होंगे।
- यूरोप के कार्बन टैक्स से भारत को राहत मिलने की उम्मीद है, जिससे स्टील, एल्युमिनियम और हाइड्रोजन जैसे सेक्टर को फायदा होगा।
- भारत में यूरोप की शराब, कारें और इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स सस्ते मिल सकते हैं क्योंकि उन पर लगने वाला भारी टैक्स घटेगा।
समझौते से यूरोप को क्या फायदा?
- यूरोप से आने वाली शराब और वाइन पर टैक्स कम हो सकता है। इससे भारत में यूरोपियन शराब सस्ती मिलेगी।
- BMW, मर्सिडीज, पॉर्श जैसी यूरोपीय प्रीमियम कार कंपनियों के लिए भारत में बिक्री आसान होगी।
- अभी इन कारों पर 110% टैक्स लगता है, जो डील के बाद 40% और आगे चलकर 10% तक आ सकता है।
- भारत सरकार ने 15,000 यूरो से महंगी कुछ यूरोपीय कारों पर तुरंत टैक्स घटाने पर सहमति दी है।
- यूरोप की IT, इंजीनियरिंग, टेलिकॉम और बिजनेस सर्विस कंपनियों को भारत में ज्यादा काम मिलेगा।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार मार्केट
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार बाजार है, लेकिन अब तक विदेशी कार कंपनियों की हिस्सेदारी यहां 4% से भी कम रही है। ऊंचे टैक्स की वजह से कंपनियां सीमित मॉडल ही बेच पाती थीं। टैक्स कम होने से कंपनियां सस्ती कीमत पर ज्यादा मॉडल बेच सकेंगी और बाजार को परख सकेंगी, जिसके बाद वे भारत में और निवेश कर सकती हैं।
इस समझौते से भारत के कपड़ा, जेम्स और ज्वेलरी, फुटवियर, चमड़ा और हस्तशिल्प जैसे लेबर वेस्ट सेक्टर्स को भी बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है। भारत चाहता है कि इन प्रोडक्ट्स को यूरोपीय मार्केट में कम या जीरो टैक्स पर एंट्री मिले। यह मांग भारत ने अपने दूसरे व्यापार समझौतों में भी रखी थी और कई जगह सफल भी रही है।
यूरोपीय यूनियन की ओर से कारों और शराब जैसे वाइन और स्पिरिट्स पर टैक्स कम करने की मांग लंबे समय से की जा रही है। भारत पहले ही ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ ऐसे समझौतों में टैक्स घटाने पर सहमत हो चुका है।

इस डील की संभावित चुनौतियां
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत-EU की ट्रेड डील फायदेमंद है, लेकिन इससे दोनों पक्षों को कुछ चुनौतियां का भी सामना करना पड़ सकता है।
भारत के लिए चुनौतियां…
- शराब और लग्जरी कारों पर टैक्स कम हुआ तो घरेलू कंपनियों को विदेशी ब्रांड्स से कड़ी टक्कर मिलेगी।
- यूरोप के सख्त नियम (पर्यावरण, लेबर, कार्बन टैक्स) मानने से भारतीय कंपनियों का खर्च बढ़ सकता है।
- अगर दवाइयों के पेटेंट नियम सख्त हुए तो कुछ जरूरी दवाइयां महंगी हो सकती हैं।
- छोटे उद्योगों को बड़ी यूरोपीय कंपनियों से मुकाबला करना मुश्किल हो सकता है।
EU के लिए चुनौतियां…
- भारत में सस्ते और बड़े पैमाने पर बने प्रोडक्ट्स आने से यूरोप की कुछ लोकल इंडस्ट्री कमजोर पड़ सकती है।
- यूरोपीय कंपनियों को भारत के नियमों और लोकल शर्तों के हिसाब से ढलना पड़ेगा, जिससे लागत बढ़ेगी।
- अगर वीजा और सर्विस सेक्टर पर ज्यादा छूट देनी पड़ी तो घरेलू नौकरियों को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
- भारत के साथ व्यापार बढ़ने से EU की कुछ कंपनियों की चीन जैसे मार्केट पर निर्भरता घटेगी, जिससे अंदरूनी बदलाव करना पड़ेगा।
FTA से डेयरी सेक्टर को बाहर रखा गया
इस फ्री ट्रेड समझौते में कृषि और डेयरी जैसे सेक्टर को बाहर रखा गया है। भारत को डर है कि यूरोपीय कृषि प्रोडक्ट्स से उसके किसानों की इनकम पर असर पड़ सकता है। वहीं EU भी अपने किसानों को लेकर सतर्क है, इसलिए इन मुद्दों को समझौते में शामिल नहीं किया गया है।
व्यापार के अलावा भारत और यूरोपीय यूनियन निवेश सुरक्षा समझौते, GI टैग और रक्षा व सुरक्षा सहयोग पर भी बातचीत कर रहे हैं। इस दौरान लेबर्स की आवाजाही, डिफेंस इंडस्ट्री में साझेदारी और रणनीतिक सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनने की उम्मीद है।
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा है कि एक सफल भारत दुनिया को ज्यादा स्थिर, सुरक्षित और समृद्ध बनाता है। उन्होंने इस समझौते को ऐतिहासिक बताया है और कहा है कि इससे करीब दो अरब लोगों का साझा बाजार बनेगा, जो दुनिया की कुल GDP का लगभग एक चौथाई होगा।

19 साल से रुकी थी भारत-EU ट्रेड डील
भारत और EU के बीच ट्रेड डील पर बातचीत 2007 में शुरू हुई थी, लेकिन 2013 में रुक गई। वजह ये थी कि कई बड़े मुद्दों पर दोनों की सहमति नहीं बन पाई। EU चाहता था कि भारत खेती और डेयरी सेक्टर खोले, लेकिन भारत को डर था कि इससे किसानों को नुकसान होगा। शराब और कारों पर टैक्स घटाने की मांग पर भी भारत तैयार नहीं हुआ।
EU चाहता था कि उसके 95% से ज्यादा एक्सपोर्ट पर टैरिफ खत्म किया जाए, जबकि भारत सिर्फ 90% तक ही तैयार था। इसके अलावा इन 5 बड़ी वजहों से भी डील ठंडे बस्ते में चली गई…
इन 5 मुद्दों पर दो दशक से अटकी थी भारत-EU ट्रेड डील
- खेती और डेयरी का मुद्दा: EU चाहता था कि भारत अपना डेयरी मार्केट खोले, लेकिन भारत को डर था कि सस्ते यूरोपीय सामान से भारतीय किसानों को नुकसान होगा।
- शराब और कारों पर टैक्स: EU चाहता था कि भारत यूरोप की शराब और कारों पर टैक्स कम करे, लेकिन भारत इसके लिए तैयार नहीं था।
- दवाइयों की कीमत: EU सख्त पेटेंट कानून चाहता था, जिससे भारत में जरूरी दवाइयां महंगी हो सकती थीं। इसी वजह से भारत ने आपत्ति जताई।
- काम करने का वीजा: भारत चाहता था कि उसके प्रोफेशनल्स को यूरोप में काम करने और बिजनेस वीजा आसानी से मिले, लेकिन EU ने इस पर सहमति नहीं दी।
- घरेलू मामलों में दखल: EU व्यापार के साथ मानवाधिकार और पर्यावरण जैसे मुद्दे भी जोड़ना चाहता था, जिसे भारत ने अपने अंदरूनी मामलों में दखल माना।
2021 से दोबारा बातचीत शुरू, अब तक 14 मीटिंग हुईं
जून-जुलाई 2021 में भारत-EU के बीच FTA की बात दोबारा शुरू हुई। तब से लेकर अक्टूबर 2025 तक दोनों पक्षों के अधिकारियों ने 14 मीटिंग्स की। इन बैठकों में 2007 से 2013 तक तय हुए मुद्दों पर भी चर्चा हुई। ये तय हुआ कि…
- 90% से ज्यादा सामान पर टैरिफ खत्म करने की प्लानिंग होगी। ये सबकुछ 5 से 10 साल में स्टेप बाय स्टेप लागू होगा।
- कृषि, डेयरी, ऑटो, शराब जैसे सेक्टर्स पर कोटा या धीरे-धीरे टैरिफ में कटौती होगी। शुरुआती दौर में इन्हें काफी हद तक सुरक्षित रखा जाएगा। भारत पहले भी इस पर अड़ा था।
भारत के कॉमर्स सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने पिछले हफ्ते बताया कि भारत और EU के बीच डील के 24 में से 20 चैप्टरों पर बात पूरी हो चुकी है। रिपोर्ट्स हैं कि 27 जनवरी को दिल्ली में होने वाले 16वीं भारत-यूरोपीय यूनियन समिट दोनों पक्ष FTA साइन कर सकते हैं।
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