एन. रघुरामन का कॉलम: इस गणतंत्र दिवस सफाई की सामूहिक जिम्मेदारी उठाने का संकल्प करें Politics & News

[ad_1]

  • Hindi News
  • Opinion
  • N Raghuraman Column This Republic Day, Let Us Resolve To Take Collective Responsibility For Cleanliness.

कुछ ही क्षण पहले

  • कॉपी लिंक

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

जब आप किसी पर्यटक के रूप में वहां जाते हैं तो आपको लोकल फूड चखने को कहा जाता है। जाहिर है आप उसे पसंद भी करेंगे। लेकिन डिश चखने के बाद यदि आप सड़क के उस पार रखे कचरा पात्र जैसे बड़े डिब्बे की तरफ बढ़ते हैं तो सबसे पहले एक चमकीला लाल संकेत आपको चेतावनी देगा कि ऐसा न करें, क्योंकि डिब्बा कचरे के लिए नहीं, बल्कि पार्सल के लिए है।

भूरे रंग के काले ढक्कन वाले डिब्बे पर स्थानीय भाषा और अंग्रेजी में लिखा होगा- ‘बॉक्स– सिर्फ पार्सल के लिए, कचरे के लिए नहीं’। कई पर्यटक वहां गलती करते हैं और फिर झुंझलाते हैं कि हाथ में पकड़े फूड कंटेनर, कांटे और टिश्यू को कहां फेंके। स्थानीय लोग उन्हें सलाह देते हैं कि इन्हें अपने बैग में रखें। ज्यादातर पर्यटकों को ऐसा करना पड़ता है।

होटल लौट कर जब वे अपना टोट बैग उलटते हैं तो उसमें से कई सारे स्नैक कवर, गम रैपर, मुड़े-तुड़े टिश्यू, घूमी हुई जगहों की रसीदें और पानी की खाली बोतलें निकलती देखी जा सकती हैं। इसीलिए उस देश में बहुत कम कचरे के डिब्बे हैं। यह बात अकसर उन पर्यटकों को थोड़ा परेशान करती है, जो पहले से तैयार नहीं होते। वहां पूरे रेलवे नेटवर्क में भी आपको शायद ही कोई डस्टबिन दिखे।

जापान टूरिज्म एजेंसी के एक सर्वे के मुताबिक हर पांच में से एक विदेशी पर्यटक भाषा की बाध्यता और भीड़भाड़ के अलावा डस्टबिन नहीं होने को सबसे बड़ी असुविधा बताता है। आपने सही अंदाजा लगाया। मैं जापान की बात कर रहा हूं। यह उन देशों में से एक है, जहां सार्वजनिक कचरा पात्रों की कमी है।

लेकिन मैं उन लोगों में से हूं, जो इसे किसी झंझट के बजाय साफ-सफाई और सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति जापान की प्रतिबद्धता मानते हैं। इससे यह एक यादगार अनुभव बन जाता है। बौद्ध मान्यताओं से उपजी जापानी संस्कृति में साफ-सफाई को जीने का तरीका माना जाता है। वहां तो वॉक करते या ट्रेन में चलते हुए खाना–पीना खराब शिष्टाचार तक माना जाता है। इसीलिए वहां सड़क पर फूड कंटेनर और रैपर फेंकने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

हमारे देश की तरह वहां शायद ही आप किसी को बड़े–से पेपर कप में कॉफी पीते या टिश्यू में लिपटा सैंडविच खाते हुए चलते देखें। टूरिज्म एथिक्स के नजरिए से एक यात्री के रूप में हमें यह समझने की जरूरत है कि हम ऐसे देश में प्रवेश कर रहे हैं, जहां स्वच्छ वातावरण बनाए रखना हर व्यक्ति की सामूहिक जिम्मेदारी है। यह महज स्थानीय निकाय या कचरा गाड़ियों की जिम्मेदारी नहीं।

हां, दुनिया भर में ट्रैशबिन्स को कचरा फेंकने की सुविधा के तौर पर देखा जाता है। लेकिन जापान में लोग इस सुविधा का त्याग कर साफ-सफाई और सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हैं। भारत में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक तौर पर घरों को साफ रखने पर जोर रहा है। हम अकसर देखते हैं कि लोग हर सुबह अपने दरवाजे के सामने अच्छे–से झाड़ू मारते हैं, लेकिन धूल सीधे सड़क पर फेंक देते हैं।

जापान में ‘घर’ और ‘सड़क’ को एक माना जाता है, जो साझा और पवित्र जगह है। भारत में सड़क को अकसर ‘नो मैन्स लैंड’ माना जाता है- ऐसी जगह, जहां घर की दहलीज पार करते ही आपकी जिम्मेदारी खत्म। जब नगर निकाय सार्वजनिक कचरा पात्रों की नियमित सफाई नहीं कर पाते तो वे ओवरफ्लो हो जाते हैं। इसी से यह धारणा बनती है कि ‘सड़क तो पहले ही गंदी है तो एक और रैपर फेंकने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।’

जापान में लोगों पर यह सामाजिक दबाव रहता है कि पड़ोसी गंदगी फैलाते देखेंगे तो क्या सोचेंगे, वहीं भारत ऐतिहासिक रूप से संस्थागत साफ–सफाई व्यवस्था पर निर्भर है।

फंडा यह है कि ऐसी उम्मीद करने के बजाय कि हमारे बाद सफाई कर्मचारी फिर से सफाई करे, यदि हम जापान की तरह गंदगी होने ही न दें तो यकीन मानिए कि हम जल्द ही दुनिया के स्वच्छतम देशों में से एक होंगे। क्या आज हम ऐसा संकल्प ले सकते हैं? गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं।

खबरें और भी हैं…

[ad_2]
एन. रघुरामन का कॉलम: इस गणतंत्र दिवस सफाई की सामूहिक जिम्मेदारी उठाने का संकल्प करें