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अंबाला: कहते हैं कि इतिहास वह होता है जो कई सालों तक लोगों के दिलों में बसता है और आने वाली पीढ़ी में प्रेम और सेवा की भावना को बनाए रखता है. कुछ ऐसा ही इतिहास अंबाला छावनी का किरची-मिर्ची प्याऊ अपने अंदर समेटे हुए है. बदलते दौर के साथ समय और तकनीक बदल गई है, लेकिन नहीं बदली है सेवा की वह मिठास जो पिछले 100 वर्षों से अंबाला वासियों के गले को तर कर रही है. बता दें कि अंबाला छावनी के कच्चा बाजार में स्थित यह ऐतिहासिक प्याऊ आगामी 25 जनवरी को अपने निर्माण के 100 वर्ष पूरे कर रहा है.
100 साल पुराना प्याऊ
यह 100 वर्ष पुराना प्याऊ आज भी इतिहास की कारीगरी को दर्शाता है, जिसमें चूना, सुरखी और मोटी ईंटों का अद्भुत संगम और पुरानी कलाकृति लोगों को पसंद आती है. दरअसल, इस प्याऊ के ऊपर लगी प्लेट पर साफ लिखा है कि इसका निर्माण साल 1926 में हुआ था और अंग्रेजी हुकूमत के समय इसे बनवाने वाले गणेशा मल नाथू मल थे. उस समय प्याऊ का निर्माण खासतौर पर चूना, सुरखी और छोटी ईंटों से किया गया था, जिसके कारण यह आज भी मजबूती के साथ खड़ा है.
इंसानों के साथ जानवरों को भी मिलता था पानी
लोकल 18 को जानकारी देते हुए स्थानीय निवासी नवल शर्मा ने बताया कि प्याऊ की वास्तुकला ऐसी थी कि भीषण गर्मी में भी इसके गुंबद के नीचे ठंडक का अहसास होता था. प्याऊ के अंदर एक पानी की होदी बनी थी और एक महिला को ड्यूटी पर रखा जाता था, जो गुजरने वाले लोगों को दीवार में बने पुराने छेद से पानी पिलाती थी. इसके साथ ही बाहर एक होदी भी थी, जहां जानवर भी पानी पीते थे.
प्याऊ की दीवारों पर भगवान गणेश और भोलेनाथ की प्रतिमाएं
उन्होंने बताया कि प्याऊ की दीवारों पर भगवान गणेश और भोलेनाथ की हाथ से उकेरी गई प्रतिमाएं और गुंबद आज भी इतिहासिक शिल्प कला को दर्शा रहे हैं. पुराने समय में अंबाला में चार से पांच प्याऊ बने थे, लेकिन अब केवल दो ही बचे हैं. कुछ समय के लिए प्याऊ बंद भी रहा, जिसके बाद ट्रस्ट और मोहल्लेवासियों के सहयोग से इसे फिर से शुरू किया गया. पहले दीवार में लगे नल से होदी भरकर पानी दिया जाता था, और समय के साथ 8–10 घड़े रखे जाने लगे. अब आधुनिक युग में यहां आरओ सिस्टम और वाटर कूलर लगा दिए गए हैं.
अंबाला छावनी का एक प्रमुख सीमा चिह्न
स्थानीय निवासी देवेंद्र शर्मा ने बताया कि किरची-मिर्ची प्याऊ सिर्फ पानी पीने का स्थान नहीं है, बल्कि यह अंबाला छावनी का एक प्रमुख सीमा चिह्न बन चुका है. आजादी के पहले से यह स्थान प्रेमियों की प्रतीक्षा, दोस्तों की ठहाके और पारिवारिक मिलन का पवित्र बिंदु रहा है. उन्होंने कहा कि प्याऊ का स्ट्रक्चर पुराने जमाने का है, लेकिन पानी पिलाने के साधन अब आधुनिक हो गए हैं.
किरची-मिर्ची प्याऊ के 100 वर्ष पूरे होने पर 25 जनवरी को सर्व धर्म सभा का आयोजन किया जाएगा, जिसमें सभी धर्म के लोग शामिल होंगे.
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