कंवल रेखी का कॉलम: युवाओं को डॉक्टर-इंजीनियर बनने से आगे का सोचना होगा Politics & News

[ad_1]


मेरे पिता आर्मी में थे। द्वितीय विश्व युद्ध में उन्होंने शिरकत की थी। आज के पाकिस्तान के रावलपिंडी स्थित गांव सुखो से बंटवारे के बाद ‘दारजी’ यानी मेरे पिता अलग-अलग पोस्टिंग्स से होते हुए कानपुर पहुंचे, जहां मेरा बचपन बीता। आर्मी से होने के कारण ‘दारजी’ की नजर में सफलता के पैमाने मिलिट्री के ही थे। लेकिन मैं शारीरिक तौर पर कमजोर था, कंधे झुके थे, शर्मीला और एक स्पीच-डिफेक्ट से जूझने वाला बच्चा था। मैं उनकी नजरों में एक निराशा ही था। बचपन में उनके रिजेक्शन ने मुझे झकझोर दिया था, लेकिन फिर मैंने इस बात का पॉजिटिव पहलू देखा और मानने लगा कि उनकी नजरअंदाजी मेरे लिए अच्छी है। मुझ पर अपने दोनों भाइयों की तरह आर्मी जॉइन करने का दबाव नहीं था। उनकी उपेक्षा ने मुझे अपना रास्ता चुनने की आजादी दी। मां को जरूर मुझ पर और गणित के प्रति मेरे रुझान पर भरोसा था। जब पिता पोस्टिंग पर होते तो घर के बजट का जिम्मा वो मुझे सौंप देतीं। 13 साल की उम्र में मैंने हिंदी मीडियम स्कूल से पढ़ाई की और गणित और विज्ञान में माहिर हो गया। मेरी जिज्ञासाओं ने मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया। अच्छी बात यह थी कि उस समय देश में नॉलेज-इकोनॉमी कदम रख रही थी। घर के पास एक वेलफेयर लाइब्रेरी थी, जहां मुझे इतिहास की किताबों से लेकर अमेरिकी पत्रिकाएं पढ़ने की जगह मिली। लाइफ मैगजीन के नए अंक पढ़ता तो एक नई दुनिया में पहुंच जाता, जो मेरे हालात से बिलकुल विपरीत थी- लग्जरी कारें, हवाई जहाज, आलीशान घरों और जुनूनी एस्ट्रॉनॉट्स के कारनामे। ये तस्वीरें आने वाले कल की उम्मीद की नई खिड़कियां थीं, जहां मुझे मेरा सपना दिख रहा था। स्कूलिंग के बाद मेरा सिलेक्शन आईआईटी बॉम्बे में हो गया। लेकिन पिता को लगा मैं एक और बेवकूफी कर रहा हूं। तब उनके कमांडिंग ऑफिसर ने उन्हें बताया कि आईआईटी में सिलेक्शन कितनी बड़ी बात है। उस दिन पहली बार घर लौटकर उन्होंने मुझे शाबाशी दी। मेरा यकीन पक्का हो गया कि तमाम नकारात्मक चुनौतियों, लगातार रिजेक्शन से सामना और ऐसे कई अंधेरों में छिपा एक जादुई, चमकीला सपना जरूर होता है, जिसे आपको खुद खोजना पड़ता है। आईआईटी में मैंने जो सीखा, वो आज तक कायम है- सवाल पूछो, बेसिक्स मजबूत करो और समाधान निकालो। फंडामेंटल्स यानी बेसिक्स पर बार-बार सवाल पूछते रहने की वजह से मेरा निक-नेम फंडा सिंह पड़ गया था। भारतीय मध्यमवर्ग की सोच बहुत साफ है। घर-घर में यही आवाज गूंजती है- डॉक्टर बनो, इंजीनियर बनो। लेकिन कभी कोई माता-पिता यह नहीं कहते- बेटा, उद्यमी बनो। इसके बाद सलाह मिलती है- अच्छी नौकरी पकड़ो, शादी करो, जिम्मेदार बनो। यानी एक लकीर पर चलते रहने को अनुशासन मान लिया जाता है। अनुशासन का मतलब है वही करना जो समाज आपसे उम्मीद करता है। मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी और परिवार द्वारा चुनी गई लड़की से शादी को समझदारी माना जाता है। यही सलाह आपको अपने दिल की आवाज सुनने से रोकती है। उद्यमी बनना इन सब अपेक्षाओं के खिलाफ जाना है। यह रास्ता कठिन है, अकेला है और इसमें किसी से सहानुभूति की उम्मीद मत रखिए। लोग आपको पागल कहेंगे, हंसेंगे। आन्त्रप्रेन्योर को खुद को साबित करना होता है। यह आग भीतर से जलनी चाहिए। बाहर से कोई आपको प्रेरित नहीं करेगा कि आप कठिनाइयों से गुजरें। अगर आप उद्यमी बनना चाहते हैं, तो यह समाज की तय की हुई राह से अलग है। यह कठिन है, लेकिन असली संतोष वहीं पर मिलेगा, जब आप अपनी आवाज सुनेंगे। अनुशासन का मतलब सिर्फ दूसरों की उम्मीदें पूरी करना नहीं, बल्कि अपने सपनों को जीना भी है। आइडिया ऐसा होना चाहिए कि हर शख्स सोचे- यह मेरे दिमाग में क्यों नहीं आया। जिंदगी ने एक बात सिखाई है कि जो कोई नहीं कर रहा, वो मुझे करना है और अपनी शर्तों पर अपने तरीके से करना है। आज हिंदुस्तान में जिस तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर और आत्मविश्वास का विकास हो रहा है, युवाओं के लिए यहीं पर भरपूर मौके हैं। मेरा मानना है कि आने वाले समय में देश में रिवर्स ब्रेन-ड्रेन का ट्रेंड लगातार बढ़ेगा। आपके पास कोई ऐसा आइडिया होना चाहिए कि हर शख्स सोचे- यह मेरे दिमाग में क्यों नहीं आया। जिंदगी ने मुझे एक बात सिखाई है कि जो कोई नहीं कर रहा, वो मुझे करना है और अपनी शर्तों पर, अपने ढंग से करना है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

[ad_2]
कंवल रेखी का कॉलम: युवाओं को डॉक्टर-इंजीनियर बनने से आगे का सोचना होगा