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फरीदाबाद: बच्चों के लिए उनके मां-बाप ही सब कुछ होते हैं. छोटे से जख्म पर रात भर जागने वाले अपनी हर मुश्किल खुद झेलने वाले अपने हिस्से की रोटी तक बच्चों को खिला देने वाले… वही मां-बाप जब बूढ़े हो जाते हैं, तो कई बार वही बच्चे उन्हें बोझ मानने लगते हैं. बूढ़ी उम्र में तो इंसान को सबसे ज्यादा सहारे, प्यार और अपनेपन की जरूरत होती है, लेकिन कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि अपने ही बच्चे पराए लगने लगते हैं.
मुश्किल हालात में बेटियों ने भी छोड़ा हाथ
बसंती देवी बताती हैं कि पति के जाने के टाइम तीनों बेटियां छोटी थीं. सिर्फ एक बेटी की शादी उनके पति देख पाए. हालात ऐसे हो गए कि जिस घर में कभी नौकर काम करते थे वहां बसंती देवी खुद दूसरों के घरों में बर्तन-मांझा, झाड़ू-पोछा और खाना बनाने लगीं. दिन-रात मेहनत की अपनी बेटियों को पाला, पढ़ाया, और दो बेटियों की शादी खुद कराई वो भी बेहद मुश्किल हालात में. वो कहती हैं इन्हीं हाथों से बेटियों को बड़ा किया पढ़ाया-लिखाया शादी कराई. लेकिन जब बेटियों की शादी हो गई तो उन्होंने भी मुझे अपने पास रखने से मना कर दिया.
उनकी आवाज़ कांपती है जब वो कहती हैं पिछले 5 से 6 साल से अपने परिवार से दूर हूं. तीनों बेटियां कभी फोन तक नहीं करतीं. पहले मैं ही फोन कर लेती थी अब वो भी छोड़ दिया… क्योंकि हर बार उनकी आवाज़ में अजनबीपन सा लगता था.
मेरी उम्र 80 साल हो गई है मेरा कोई नहीं बचा
बसंती देवी ने बताया कि वो 3 से 4 साल से फरीदाबाद में अपनी बहन के यहां रह रही थीं. पर समय के साथ बहन ने भी साफ कह दिया…अब तू जहां चाहे रह… मैं नहीं रख सकती. मजबूरी में बसंती देवी वृद्धाश्रम आईं. अब दो महीने से वहीं रह रही हैं. कहती हैं अब मेरी उम्र 80 साल हो गई है मेरा कोई नहीं बचा. यही मेरा घर है. खाना-पीना टाइम से मिल जाता है कोई तकलीफ नहीं… बस कोई अपना नहीं है.
बसंती देवी की कहानी समाज की उस सच्चाई को सामने लाती है जिससे लोग अक्सर मुंह मोड़ लेते हैं. जिस मां ने बच्चों के लिए अपनी इज्जत तक दांव पर लगा दी वही मां आज बुढ़ापे में अकेली रह गई. कोई हाल तक पूछने नहीं आया. उनके चेहरे पर दर्द साफ दिखता है, लेकिन आंखों में अब भी एक छोटी सी उम्मीद चमकती है शायद कभी कोई दरवाजा फिर से खुल जाए.
आखिर कहां गलती हो रही है
ये कहानी सिर्फ बसंती देवी की नहीं है उन सब मां-बाप की कहानी है जो अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के लिए कुर्बान कर देते हैं, लेकिन आखिरी टाइम में बस तन्हाई मिलती है. हमें सोचना चाहिए… आखिर गलती कहां हो रही है? मां-बाप बोझ नहीं होते उन्हीं की वजह से तो हम हैं.
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