बांग्लादेश में पाकिस्तान समर्थक इस्लामिक पार्टी सरकार बना सकती है: सर्वे में दूसरे नंबर पर पहुंची, इसने देश की आजादी का विरोध किया था Today World News

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ढाका12 मिनट पहले

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जमात का दावा है कि उसके करीब 2 करोड़ समर्थक और 2.5 लाख रजिस्टर्ड मेंबर हैं। यह तस्वीर 2023 की है, तब जमात नेताओं ने ढाका में रैली निकाली थी।

बांग्लादेश में अगले महीने होने वाले आम चुनाव में एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखने को मिल सकता है। लंबे समय तक राजनीति से बाहर रही पाकिस्तान समर्थक कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी पहली बार सरकार बनाने के बेहद करीब पहुंचती नजर आ रही है।

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक हाल ही में हुए दो अलग-अलग सर्वे में जमात देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। वह पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को कड़ी टक्कर दे रही है।

जमात-ए-इस्लामी वही पार्टी है जिसने 1971 में बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था और पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था। देश की आजादी के बाद 1972 में इस पर बैन लगा दिया गया था। यह बैन 1975 में हटाया गया और 1979 में जियाउर रहमान के शासन में पार्टी को चुनाव में भाग लेने की अनुमति मिली।

यह तस्वीर 18 दिसंबर 1971 की है। बांग्लादेशी गोरिल्ला लड़ाकों ने ढाका कुछ लोगों की पीट पीटकर हत्या कर दी थी। इन लोगों पर आरोप था कि इन्होंने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था।

यह तस्वीर 18 दिसंबर 1971 की है। बांग्लादेशी गोरिल्ला लड़ाकों ने ढाका कुछ लोगों की पीट पीटकर हत्या कर दी थी। इन लोगों पर आरोप था कि इन्होंने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था।

सर्वे में जमात और BNP में मामूली अंतर

अमेरिकी संस्था इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टीट्यूट (IRI) ने दिसंबर में कराए गए एक सर्वे में बताया था कि BNP को 33% और जमात को 29% लोगों का समर्थन मिला है।

वहीं जनवरी में किए गए एक जॉइंट सर्वे में BNP को 34.7% और जमात को 33.6% समर्थन मिला था। यह सर्वे नरेटिव, प्रोजेक्शन BD, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ एंड डिप्लोमेसी (IILD) और जगोरन फाउंडेशन ने मिलकर किया था।

बांग्लादेश में 12 फरवरी को 300 सीटों संसदीय पर आम चुनाव होंगे। बांग्लादेश की संसद में 350 सीटें, जिनमें से 50 सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होती हैं। चुनाव नतीजों के बाद रिजर्व सीटें पार्टियों को जीती हुई सीटों के अनुपात में दी जाती हैं।

जमात नेता बोले- हम टकराव वाली राजनीति नहीं कर रहे

जमात के प्रमुख शफीकुर रहमान का कहना है कि उनकी पार्टी अब विरोध और टकराव की राजनीति नहीं बल्कि लोगों के हितों की राजनीति कर रही है। उन्होंने मेडिकल कैंप लगाने, बाढ़ पीड़ितों की मदद करने और आंदोलन में मारे गए लोगों के परिवारों को सहायता देने की बात कही।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि लोगों में पिछली सरकार की नीतियों को लेकर गुस्सा है, जिसका फायदा जमात को मिला। पार्टी अब ‘इस्लाम ही समाधान है’ का नारा देकर खुद को एक नैतिक विकल्प के रूप में पेश कर रही है।

ढाका में नारियल पानी बेचने वाले मोहम्मद जलाल ने मीडिया से कहा कि लोग अब पुराने दलों से थक चुके हैं और उन्हें जमात एक नया और साफ विकल्प लगती है।

जमात ए इस्लामी के नेता शफीकुर रहमान का कहना है कि उनकी पार्टी अब टकराव की जगह जनकल्याण पर जोर दे रही है।

जमात ए इस्लामी के नेता शफीकुर रहमान का कहना है कि उनकी पार्टी अब टकराव की जगह जनकल्याण पर जोर दे रही है।

अवामी लीग पर बैन से जमात को फायदा संभव

अगस्त 2024 में हुए छात्र आंदोलन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार गिर गई थी, जिसके बाद उनकी पार्टी अवामी लीग पर बैन लगा दिया गया। इसके बाद से नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस देश की अंतरिम सरकार चल रहे हैं।

रॉयटर्स के मुताबिक, अवामी लीग पर बैन लगने के बाद बांग्लादेश की राजनीति में खाली जगह बनी, जिसका फायदा जमात-ए-इस्लामी को मिला। लंबे समय से हाशिए पर रही यह पार्टी अब सत्ता के करीब नजर आ रही है। जमात ने ऐलान किया है कि वह 179 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

दूसरी तरफ BNP की कमान अब खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान के हाथ में है। खालिदा जिया की हाल ही में मौत हो चुकी है।

बांग्लादेश में भारत के लोकसभा चुनाव जैसी ही चुनावी प्रक्रिया

बांग्लादेश में भी भारत के लोकसभा चुनाव जैसी ही चुनावी प्रक्रिया है। यहां संसद सदस्यों का चुनाव भारत की तरह ही फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली के जरिए होता है। यानी जिस उम्मीदवार को एक वोट भी ज्यादा मिलेगा, उसी की जीत होगी।

चुनाव परिणाम आने के बाद सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन के सांसद अपने नेता का चुनाव करते हैं और वही प्रधानमंत्री बनता है। राष्ट्रपति देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाते हैं।

यहां की संसद में कुल 350 सीटें हैं। इनमें से 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। आरक्षित सीटों पर चुनाव नहीं होता, जबकि 300 सीटों के लिए हर पांच साल में आम चुनाव होते हैं। भारत की संसद में लोकसभा के अलावा राज्यसभा भी होती है, लेकिन बांग्लादेश की संसद में सिर्फ एक ही सदन है।

बांग्लादेश में सरकार का मुखिया कौन होता है?

भारत की तरह ही बांग्लादेश में भी प्रधानमंत्री ही सरकार के मुखिया होते हैं। राष्ट्रपति देश का प्रमुख होता है, जिसका चुनाव राष्ट्रीय संसद द्वारा किया जाता है। बांग्लादेश में राष्ट्रपति सिर्फ एक औपचारिक पद है और सरकार पर उसका कोई वास्तविक नियंत्रण नहीं होता है।

1991 तक राष्ट्रपति का चुनाव यहां भी सीधे जनता करती थी, लेकिन बाद में संवैधानिक बदलाव किया गया। इसके जरिए राष्ट्रपति का चुनाव संसद द्वारा किया जाने लगा। शेख हसीना 20 साल तक बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं थीं।

जमात का अतीत बना सबसे बड़ी कमजोरी

जमात-ए-इस्लामी का इतिहास उसकी सबसे बड़ी कमजोरी माना जाता है। पार्टी ने 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था। उस समय उसके कई नेताओं पर पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर आजादी समर्थकों की हत्या में शामिल होने के आरोप लगे थे।

इसी वजह से आज भी बांग्लादेश के एक बड़े तबके में जमात के खिलाफ नाराजगी है। हालांकि पार्टी का दावा है कि उसके करीब 2 करोड़ समर्थक और 2.5 लाख रजिस्टर्ड मेंबर हैं।

इस्लामिक स्कॉलर सैयद अबुल आला मौदूदी ने 1941 के अविभाजित भारत में जमात-ए-इस्लामी की स्थापना की थी।

इस्लामिक स्कॉलर सैयद अबुल आला मौदूदी ने 1941 के अविभाजित भारत में जमात-ए-इस्लामी की स्थापना की थी।

गठबंधन करके छवि सुधार की कोशिश कर रही जमात

जमात ने NCP और अन्य इस्लामी दलों के साथ गठबंधन किया है। अल जजीरा के मुताबिक, इससे जमात की सख्त कट्टरपंथी छवि कुछ कमजोर पड़ सकती है और वह युवाओं तक पहुंच बना सकती है। अब पार्टी खुद को भ्रष्टाचार विरोधी और समाज सेवा करने वाली पार्टी के तौर पर पेश कर रही है।

शेख हसीना के जाने के बाद कट्टरपंथी हमले बढ़े हैं। पिछले एक महीने में 9 हिंदुओं की हत्या, मंदिरों और सूफी दरगाहों पर हमले हुए हैं। जमात का कहना है कि वह इन धार्मिक हिंसा में शामिल नहीं रही और पहली बार उसने एक हिंदू उम्मीदवार कृष्णा नंदी को टिकट दिया है।

जमात ने 300 सीटों पर एक भी महिला उम्मीदवार नहीं उतारा, हालांकि उसका कहना है कि रिजर्व 50 सीटों पर महिलाओं को प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है। महिला अधिकार संगठनों को डर है कि सत्ता में आने के बाद जमात महिलाओं के अधिकारों पर पाबंदी लगा सकती है।

शेख हसीना की सरकार ने जमात पर कई कार्रवाई हुई

शेख हसीना ने 2009 में सरकार बनाने का बाद जमात पर कड़ी कार्रवाई की थी। 1971 के युद्ध अपराधों की सजा सुनाने के लिए 2010 में इंटरनेशनल क्राइम्स ट्राइब्यूनल बनाया गया।

इस ट्रिब्यूनल ने तत्कालीन प्रमुख जमात प्रमुख मतिउर रहमान निजामी और महासचिव अली अहसान मोहम्मद मुजाहिद समेत कई नेताओं को फांसी की सजा सुनाई थी। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इन ट्रायल्स पर सवाल उठाए थे।

बांग्लादेश की एक अदालत ने 2013 में कहा था कि जमात की विचारधारा देश के सेक्युलर संविधान से मेल नहीं खाती। इसके बाद पार्टी पर चुनाव लड़ने का बैन लगा दिया गया और वह करीब 15 साल तक राजनीति से बाहर रही।

अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने जमात पर लगा बैन हटा दिया। इसके बाद पार्टी का संगठन तेजी से मजबूत हुआ।

भारत पर क्या असर पड़ेगा

राजनीतिक एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर जमात सत्ता में आई, तो बांग्लादेश पाकिस्तान के करीब जा सकता है, जिससे भारत की चिंता बढ़ सकती है। हालांकि जमात का दावा है कि वह सभी देशों से संतुलित रिश्ते चाहती है।

BNP प्रमुख तारिक रहमान 17 साल बाद बांग्लादेश लौटे हैं और चुनाव लड़ रहे हैं। सर्वे में BNP अभी भी थोड़ी आगे है, लेकिन दोनों के बीच सिर्फ 2-4% का फर्क है। इसी वजह से माना जा रहा है कि इस बार का चुनाव बांग्लादेश के इतिहास का सबसे दिलचस्प और निर्णायक मुकाबला हो सकता है।

भारत-बांग्लादेश के रिश्ते सबसे तनावपूर्ण दौर में

बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना अगस्त 2024 में भारत आ गईं थी, तबसे दोनों देशों के रिश्तों में तल्खी लगातार बढ़ रही है। हाल ही में दोनों देशों के रिश्ते सबसे तनावपूर्व दौरे में पहुंच चुके हैं।

भारत सरकार ने रविवार को बांग्लादेश को एक ऐसा देश माना है, जहां अफसर अपने परिवार के साथ नहीं रह सकते। BBC के मुताबिक इसका सीधा मतलब है कि जो भारतीय अफसर या राजनयिक बांग्लादेश में काम करेंगे वे अब अपने पति पत्नी और बच्चों को वहां नहीं ले जा पाएंगे।

पहले यह नियम सिर्फ कुछ ही देशों में लागू था जैसे पाकिस्तान, इराक, अफगानिस्तान और दक्षिण सूडान। अब बांग्लादेश का नाम भी इसी लिस्ट में शामिल कर दिया गया है और यह फैसला एक जनवरी से लागू हो चुका है।

बांग्लादेश में पहले से तैनात अफसरों को बताया गया कि उनके परिवार को आठ जनवरी तक भारत लौटना था। जिनके बच्चे स्कूल में पढ़ रहे थे उन्हें और 7 दिन का समय दिया गया था।

इस फैसले के बाद ढाका, चटगांव, खुलना, सिलहट और राजशाही में रह रहे भारतीय अफसरों के परिवारों को बहुत जल्दी में भारत वापस आना पड़ा।

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