क्या सच में हमारे इमोशंस हमें कर सकते हैं बीमार, जानें क्या कहते हैं डॉक्टर? Health Updates

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How Thoughts Affect Physical Health: क्या हमारे विचार और भावनाएं हमारी सेहत को प्रभावित कर सकती हैं? इस सवाल पर मेडिकल और साइकोलॉजी की दुनिया में लंबे समय से चर्चा होती रही है. इसी सवाल को एबीपी के यूथ कॉनक्लेव में डॉ. अमोद सचान निदेशक, हिंद कैंसर संस्थान से भी पूछा गया.

उन्होंने कहा कि मैं पिछले चालीस वर्षों से मरीजों का इलाज कर रहा हूं. इसके अलावा हमने डॉक्टरों को पढ़ाया भी है. जब इस पूरे अनुभव को विस्तार से देखा गया तो यह सामने आया कि जो इलाज हम कर रहे हैं, वह कई मामलों में अधूरा है और यह स्थिति पूरी दुनिया में देखी जा रही है. अब लोग धीरे-धीरे जागरूक हो रहे हैं और सवाल उठा रहे हैं कि बीमारी पैदा कैसे होती है. इसके पीछे एक बड़ा कारण हमारे विचार और इमोशन माने जा रहे हैं. जब हमारे विचार और भावनाएं लंबे समय तक नहीं बदलतीं, तो हम उसी मानसिक ट्रैप में फंसे रहते हैं.

कैसे काम करते हैं हमारे विचार और इमोशन, इन्हें कैसे बदला जाए?

डॉ. अमोद सचान बताते हैं कि हमारा मन दो हिस्सों में काम करता है. पहला है चेतन मन ( जो कुल मिलाकर लगभग 5 प्रतिशत होता है. दूसरा है अवचेतन मन जो करीब 95 प्रतिशत तक सक्रिय रहता है. इसकी खासियत यह है कि हमारे पूरे जीवनकाल की यादें इसमें स्टोर रहती हैं. इसे एक तरह का डेटा सेंटर समझा जा सकता है, जहां हमारे विचारों और अनुभवों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग जमा रहती है.

कई बार ऐसे सपने भी आते हैं, जिनका हमारे वर्तमान जीवन से सीधा संबंध नहीं होता. ये अवचेतन मन में मौजूद पुरानी रिकॉर्डिंग का ही प्रभाव हो सकता है, जो दोबारा रिप्ले होती है. यही रिकॉर्डिंग आगे चलकर हमारे चेतन मन में नए विचार भी पैदा करती है. इसी वजह से इंसान चाहकर भी खुद को आसानी से बदल नहीं पाता.

पॉजिटिव और निगेटिव विचारों का प्रभाव

डॉ. अमोद बताते हैं कि हमारे विचार दो तरह के होते हैं पॉजिटिव और निगेटिव. पॉजिटिव विचारों में प्रेम, करुणा, दया और सद्भावना जैसे भाव आते हैं, जिनसे सुख, शांति और आनंद की अनुभूति होती है. वहीं निगेटिव विचारों में ईर्ष्या, गुस्सा, अहंकार और वासना जैसे भाव शामिल हैं, जो लगातार सक्रिय रहते हैं. पॉजिटिव विचार शरीर के अंदर हीलिंग प्रक्रिया को सपोर्ट करते हैं और ऐसे हार्मोन के बनने में मदद करते हैं, जो बीमारी को कम करते हैं. वहीं लंबे समय तक बने रहने वाले निगेटिव विचार शरीर में तनाव बढ़ा सकते हैं.  डॉ. अमोद  के अनुसार, निगेटिव सोच की जड़ अक्सर अत्यधिक लालसा या असंतोष होता है. काम करना गलत नहीं है, लेकिन जब काम केवल लालच के भाव से किया जाता है, तो मानसिक तनाव बढ़ता है. बेहतर यह है कि काम को कर्तव्य मानकर किया जाए.

विचार बदलना क्यों है मुश्किल?

डॉ. अमोद कहते हैं कि जब हम यह तय कर लेते हैं कि मन में निगेटिव विचार नहीं आने चाहिए, तब भी काम करते समय वही विचार उभर आते हैं. इसकी वजह हमारे न्यूरॉन्स के बीच होने वाला तेज संदेश संचार है. यह संदेश एक मिलीसेकेंड से भी कम समय में एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुंच जाता है. इसके अलावा हमारा दिमाग लोअर ब्रेन  से भी संचालित होता है, जो भावनात्मक प्रतिक्रिया के लिए जिम्मेदार होता है. वहीं हमारे शरीर का मुख्य प्रोसेसर प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स  है, जो सोच-समझकर निर्णय लेने में मदद करता है. चूंकि लोअर ब्रेन पहले एक्टिव हो जाता है, इसलिए हम अक्सर तुरंत रिएक्ट कर देते हैं, जबकि सही रिस्पॉन्स देने में 1 से 2 सेकेंड का समय लगता है. बाद में हमें एहसास होता है कि हमने ऐसा क्यों कर दिया.

समाधान क्या है?

डॉ. अमोद के मुताबिक, जिन विचारों के साथ हम पैदा होते हैं, वे अपने आप नहीं बदलते. इन्हें बदलने के लिए एक्टिव प्रोसेस जरूरी है. इसके लिए ध्यान यानी मेडिटेशन को एक प्रभावी तरीका माना जाता है. ध्यान के दौरान हम अपने विचारों को बहने देने के बजाय उन्हें देखना सीखते हैं. जब हम बार-बार ध्यान करते हैं या अपने नए विचार लिखते हैं, तो धीरे-धीरे अवचेतन मन के पुराने पैटर्न बदलने लगते हैं. डॉक्टर बताते हैं कि हमारा दिमाग वास्तविक अनुभव और कल्पना में फर्क नहीं कर पाता. यानी जो हम बार-बार सोचते हैं, दिमाग उसे सच मानने लगता है. इसी वजह से सकारात्मक सोच और कल्पना का असर हमारे व्यवहार और भावनाओं पर पड़ता है.

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