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आठ वर्ष पहले व्लादिमीर पुतिन ने कहा था कि जो भी एआई में महारत हासिल करेगा, वही दुनिया पर राज करेगा। तब से इस तकनीक में निवेश विस्फोटक रूप से बढ़ा है। अकेले 2025 में ही माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, अमेजन और मेटा ने एआई पर 320 अरब डॉलर से अधिक खर्च किए। एआई में वर्चस्व की यह दौड़ तीखी प्रतिक्रिया भी पैदा कर रही है। आशंकाएं बढ़ रही हैं कि बुद्धिमान मशीनें सुरक्षा के नए जोखिम पैदा करेंगी- जैसे आतंकवादियों, हैकरों और अन्य बुरे तत्वों को सशक्त करना। और यदि एआई मानव नियंत्रण से पूरी तरह बाहर निकल जाए तो? तब क्या वह अपने वर्चस्व की तलाश में मनुष्यों को पराजित कर सकती है? लेकिन इससे भी अधिक तात्कालिक खतरा मौजूद है। लगातार अधिक शक्तिशाली लेकिन अपारदर्शी एआई एल्गोरिदम हमारी स्वतंत्रता के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। जितना अधिक हम सोचने का काम मशीनों को सौंपते जाएंगे, उतनी ही कम हमारी क्षमता चुनौतियों से निपटने की रह जाएगी। हमारी स्वतंत्रता पर यह खतरा दोहरा है। एक ओर रूस और चीन जैसे निरंकुश शासन पहले ही एआई का उपयोग व्यापक पैमाने पर लोगों की निगरानी और पहले से कहीं अधिक परिष्कृत तौर-तरीकों से उनके दमन के लिए कर रहे हैं। वे न केवल असहमति को कुचल रहे हैं, बल्कि सूचना के किसी भी ऐसे स्रोत को निशाना बना रहे हैं जो असंतोष को जन्म दे सकता है। दूसरी ओर, निजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां- जिनके पास अपार पूंजी और डेटा तक पहुंच है- अपने उत्पादों और प्रणालियों में एआई को एकीकृत करके मानवीय हस्तक्षेप को कमजोर कर रही हैं। उनका इकलौता मकसद अपने मुनाफे को अधिकतम करना है। सोशल मीडिया के गंभीर सामाजिक, राजनीतिक और मानसिक-स्वास्थ्य प्रभाव तो हम पहले ही देख चुके हैं। एआई उदार लोकतंत्रों के सामने भी अस्तित्वगत प्रश्न खड़ा करती है। यदि यह तकनीक निजी क्षेत्र के नियंत्रण में ही बनी रहती है तो जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिए सरकार कैसे बच सकेगी? लोगों को समझने की जरूरत है कि स्वतंत्रता का सार्थक प्रयोग इस बात पर निर्भर करता है कि मानवीय-प्रसंगों की रक्षा की जाए। उन्हें उन मशीनों के अतिक्रमण से बचाया जाए, जिन्हें सोचने और महसूस करने की हमारी प्रक्रियाओं को इस तरह ढालने के लिए बनाया गया है कि इसका लाभ कॉर्पोरेट हितों को हो। हालिया एक अध्ययन- जिसमें लगभग 77,000 लोगों ने राजनीतिक मुद्दों पर एआई मॉडलों के साथ संवाद किया- में पाया गया कि लोगों को किसी नैरेटिव की तरफ झुकाने के मकसद से डिजाइन किए गए चैटबॉट उन मॉडलों की तुलना में- जिन्हें इस तरह से प्रशिक्षित नहीं किया गया था- 51% तक अधिक प्रभावी थे। एक अन्य हालिया अध्ययन (कनाडा और पोलैंड में) में हर दस में से एक मतदाता ने शोधकर्ताओं को बताया कि एआई चैटबॉट्स के साथ हुई बातचीत ने उन्हें किसी विशेष उम्मीदवार का समर्थन न करने की स्थिति से समर्थन करने की ओर मोड़ दिया। फ्री-स्पीच का पारम्परिक सिद्धांत भी उस डिजिटल बाजार के लिए उपयुक्त नहीं रह गया है, जो सर्वव्यापी एल्गोरिदमों द्वारा आकार ले रहा है- एल्गोरिदम जो चुपचाप एआई इन्फ्लुएंसर की तरह काम करते हैं। ऑनलाइन सेवाओं के यूजर्स को लग सकता है कि उन्हें वही दिखाया जा रहा है जो वे चाहते हैं, लेकिन जिन व्यापक तरीकों से एल्गोरिदम यूजर्स को उस दिशा में मोड़ देते हैं, जहां कॉर्पोरेट प्लेटफॉर्म उन्हें ले जाना चाहता हैं, वे गोपनीय बने रहते हैं। फ्री-स्पीच सिद्धांत की ऐसी ही विकृति 1996 के कम्युनिकेशंस डिसेंसी एक्ट की धारा 230 में भी दिखती है, जो डिजिटल प्लेटफॉर्म मालिकों को ऑनलाइन सामग्री से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदारी से बचाती है। यह कॉर्पोरेट-फ्रेंडली नीति मानकर चलती है कि ऐसी सारी सामग्री यूजर-जनरेटेड होती है- यानी लोग इनके माध्यम से बस विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं और अपनी पसंद जाहिर कर रहे हैं। लेकिन मेटा, टिकटॉक, एक्स और अन्य प्लेटफॉर्म किसी तटस्थ मंच की तरह काम नहीं करते। उनका अस्तित्व ही इस धारणा पर टिका है कि यूजर्स के अटेंशन से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना ही फायदे का सौदा है। कॉर्पोरेट्स अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए एआई को इस तरह तैनात कर रहे हैं कि यूजर्स अधिक से अधिक ऑनलाइन समय बिताएं- ताकि वे टारगेटेड विज्ञापनों के ज्यादा संपर्क में रहें। इसके लिए खास तरह की जानकारी परोसने से भी उन्हें हर्ज नहीं। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)
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रिचर्ड के. शेरविन का कॉलम: नैरेटिव गढ़ने में एआई माहिर है, हमें सावधान रहना होगा

