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- Lt Gen Syed Ata Hasnain Column: Trumps Greenland Interest Has Strong Strategic Reasons
2 घंटे पहले
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर
स्कूल के दिनों में भूगोल मेरे सबसे कम पसंदीदा विषयों में शामिल था। ऐसे में आर्कटिक सर्कल के पास फैली उस विशाल, फीकी भू-आकृति ग्रीनलैंड पर मैंने शायद ही कभी ध्यान दिया था। ‘रेयर अर्थ्स’ उस समय हमारी शब्दावली का हिस्सा नहीं थे और न ही तब मुझमें कोई सैन्य या रणनीतिक चेतना थी, जो संघर्ष के क्षेत्र से दूर के किसी भूभाग के सामरिक मूल्य को समझ सके। यह कल्पना कि बर्फ से ढका कोई दूरस्थ भू-भाग किसी दिन वैश्विक रणनीतिक महत्व हासिल कर सकता है, उस समय तो मुझे अविश्वसनीय ही लगती। लेकिन हाल ही में ग्रीनलैंड बार-बार अंतरराष्ट्रीय विमर्श में उभरा है- मुख्यतः ट्रम्प के कारण।
इस पर शुरुआती वैश्विक प्रतिक्रिया अविश्वास की थी। भला अमेरिका एक ऐसे द्वीप में दिलचस्पी क्यों लेने लेगा, जहां मुश्किल से 57,000 लोग रहते हैं और जिसका अधिकांश हिस्सा बर्फ से ढका है? विश्लेषकीय टिप्पणियां रेयर अर्थ्स, खनिजों और भविष्य की व्यावसायिक संभावनाओं पर केंद्रित रहीं। यकीनन, ये तमाम पहलू महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ये मूल मुद्दा नहीं हैं। ग्रीनलैंड के पुनः उभार को समझने के लिए एक दूसरे आयाम को देखना होगा।
ग्रीनलैंड का महत्व उसकी लोकेशन में निहित है। यह यूरेशिया और उत्तरी अमेरिका के बीच सबसे छोटे हवाई और मिसाइल मार्गों पर स्थित है। शीत युद्ध के दौरान, ग्रीनलैंड-आइसलैंड-यूके गैप नाटो की समुद्री रणनीति का केंद्रीय तत्व था, जो अटलांटिक में प्रवेश करने वाली सोवियत पनडुब्बियों की निगरानी को संभव बनाता था। दशकों तक आर्कटिक एक जमे हुए बफर की तरह रहा- दूरस्थ, दुर्गम और लंबे समय तक चलने वाली प्रतिस्पर्धा से लगभग अप्रभावित।
लेकिन अब जलवायु परिवर्तन आर्कटिक को एक सक्रिय क्षेत्र में बदल रहा है। पिघलती बर्फ नए समुद्री मार्ग खोल रही है। साथ ही, हाइपरसोनिक हथियारों, लंबी दूरी के सटीक प्रहार, अंतरिक्ष-आधारित सेंसर, मिसाइल रक्षा और समुद्रगत प्रणालियों में प्रगति दूरी को लगातार समेट रही है। ऐसे में ग्रीनलैंड हाशिये से खिसककर अग्रिम रणनीतिक क्षेत्र में बदल जाता है। जो दूरी कभी सुरक्षा देती थी, वह सिमट रही है; प्रतिक्रिया का समय घट रहा है; और अमेरिकी मुख्यभूमि के लिए चेतावनी का अंतराल सिकुड़ता जा रहा है।
अमेरिका ने ऐतिहासिक रूप से बहुत कम प्रत्यक्ष खतरों का सामना किया है। पर्ल हार्बर ने उसके मेनलैंड को निशाना नहीं बनाया था और 9/11 एक अपवाद था। अमेरिका की पारम्परिक प्राथमिकता यही रही है कि वह खतरों को अपनी सीमाओं से दूर रखने के लिए विदेशों में संलग्न रहे। महाशक्तियों की होड़ अब नाटकीय आक्रमणों से कम और विरोधियों को रणनीतिक बढ़त हासिल करने से रोकने से अधिक जुड़ी है।
ऐसे रणनीतिक क्षेत्र जो कम आबादी वाले हों, राजनीतिक रूप से सीमित हों या पर्याप्त रूप से सुरक्षित न हों, स्वाभाविक रूप से आकर्षक बन जाते हैं- और केवल सैनिक तैनाती भर के लिए नहीं। ऐसे में ग्रीनलैंड को रणनीतिक रूप से कमजोर छोड़ देना अमेरिका के लिए जोखिम बढ़ाने वाला है। ग्रीनलैंड अमेरिका तक की दूरी घटाता है और यही उसकी चिंता का कारण है।
भारत के उदाहरण से समझें। सियाचिन ग्लेशियर का कोई विशेष आर्थिक मूल्य नहीं है, उस पर भारी लॉजिस्टिक लागत भी आती है और वह अनुभवी सैनिकों के लिए भी अत्यंत दुर्गम है। इसके बावजूद भारत दशकों से सियाचिन पर कायम है। क्योंकि उसे खाली करने का अर्थ होगा पाकिस्तान को ऐसे भू-भाग पर कब्जा करने देना, जो भले ही आज सीमांत लगे, लेकिन भविष्य में उपयोग में लाया जा सकता है।
एक बार ऐसा इलाका हाथ से निकल जाए तो उसे वापस हासिल करना कई गुना महंगा पड़ता है। इसलिए सियाचिन पर बने रहने का फैसला तात्कालिक सामरिक लाभ से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक दूरदृष्टि से उपजा है। अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड भी कुछ ऐसा ही है। रूस ने आर्कटिक के बड़े हिस्सों का दोबारा सैन्यीकरण कर लिया है। उसने पुराने ठिकानों को फिर से सक्रिय किया है और अपनी उत्तरी सैन्य क्षमताओं का विस्तार किया है।
चीन ने भी स्वयं को नियर-आर्कटिक राष्ट्र घोषित करते हुए शोध केंद्रों, निवेश और कूटनीति के जरिये इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ाई है। ऐसे में अगर अमेरिका कुछ ना करता तो यह हैरानी की बात होती। ट्रम्प की शैली चाहे जैसी हो, लेकिन डेनमार्क को लेकर उनकी रणनीतिक प्रेरणा तर्कहीन नहीं है। तेजी से सैन्यीकृत हो रहे आर्कटिक के मद्देनजर कोई भी अमेरिकी सरकार अंततः ग्रीनलैंड के महत्व का पुनर्मूल्यांकन करने को विवश ही होती।
आर्कटिक को अब हमें उभरते हुए रणनीतिक महत्व के नए रंगमंच के रूप में स्वीकार लेना चाहिए। भूगोल नहीं बदला है, लेकिन उसके मायने बदल गए हैं। मजबूत राष्ट्र अपनी कमजोरियां उजागर होने से पहले कार्रवाई करते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम: ग्रीनलैंड में ट्रम्प की दिलचस्पी के पुख्ता सामरिक कारण हैं

